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चंद्रबाबू नायडू, मोदी-शाह की जोड़ी को वाजपेयी-आडवाणी जैसा समझकर गलती कर रहे हैं

चंद्रबाबू नायडू एक बार फिर खतरे की सीमा तक जा कर खेल रहे हैं, लेकिन शायद वह मोदी-शाह की जोड़ी को वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी जैसा समझ कर गलती कर रहे हैं

Updated On: Mar 09, 2018 12:05 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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चंद्रबाबू नायडू, मोदी-शाह की जोड़ी को वाजपेयी-आडवाणी जैसा समझकर गलती कर रहे हैं

साल 2004 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले बीजेपी ने भविष्य की तैयारियों पर चर्चा के लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हैदराबाद में रखी थी. चंद्रबाबू नायडू उस समय आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. उस समय वह “साइबर सीएम” के रूप में अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे और काफी तड़क-भड़क वाले थे, जिसके कारण दुश्मनों के साथ ही दोस्त भी उनसे भयभीत रहते थे.

नायडू किसी भी मौके का अपने जनसंपर्क के लिए इस्तेमाल करने के लिए मशहूर थे और उनकी छाया बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर भी दिख रही थी. वह इस हकीकत से पूरी तरह वाकिफ थे कि पूरा राष्ट्रीय मीडिया बीजेपी के कार्यक्रम को कवर करने के लिए हैदराबाद में मौजूद होगा. नायडू ने संदेश भेजा कि वह मीडिया को संबोधित करने आएंगे. यह बताने की जरूरत नहीं कि नायडू ने बीजेपी को किनारे लगाकर पूरी लाइम लाइट बटोर ली और बीजेपी हाथ मलती रह गई.

नायडू का यह जलवा और उनकी लोकप्रियता दोनों दलों के बीच गठबंधन की कसौटी थी. 1998 में चंद्रबाबू के गठबंधन में शामिल होने के बाद से ही उनका बीजेपी नेतृत्व के साथ करीबी रिश्ता रहा. खासकर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के साथ. दोनों ही उनके प्रति काफी झुकाव रखते थे. उनका मानना था कि बीजेपी का अपनी वैचारिक सीमाओं के कारण विंध्य को पार करना मुश्किल है और नायडू की मदद से ही उन्हें दक्षिण भारत में दाखिला मिला है. इसके अलावा, उस समय बीजेपी के अध्यक्ष एम. वेंकैया नायडू भी नायडू से बहुत ज्यादा प्रभावित थे.

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चंद्रबाबू नायडू ने बीजेपी की कमजोरी को जानते हुए हालात को हमेशा अपने पक्ष में इस्तेमाल किया. याद कीजिए कि चंद्रबाबू ने किस तरह वेंकैया नायडू की बांह मरोड़ कर दूसरे राज्यों की कीमत पर आंध्र प्रदेश के लिए अनाज का अधिकतम हिस्सा हासिल कर लिया था. एनडीए गठबंधन सरकार में रहते हुए इसी तरह सत्ता के गलियारों से अधिकतम हासिल कर लेना उनका खास तरीका था.

New Delhi: **FILE** In this file photo Prime Minister Narendra Modi is seen with TDP President and Andhra Pradesh Chief Minister N Chandrababu Naidu in New Delhi on Sunday, May 25, 2014. Two Telugu Desam Party (TDP ) ministers on Thursday resigned from the Central government over the party's demand of special category status to the state of Andhra Pradesh. PTI Photo (PTI3_8_2018_000203B)

उस समय नरेंद्र मोदी कोई बड़े नेता नहीं थे. उन्होंने 2001 में अभी-अभी गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला था और गोधरा बाद के दंगों को लेकर कई तबकों में उनकी छवि कलंकित थी. मोदी ने खामोशी से देखा कि नायडू किस तरह गठबंधन धर्म के नाम पर बार-बार बीजेपी नेतृत्व को अपनी बात मानने पर मजबूर करते थे और यहां तक कि इससे राज्य में बीजेपी को अपना आधार बनाने की कोशिशों को भी नुकसान हुआ. मोदी चूंकि नेतृत्वकारी भूमिका में नहीं थे, इसलिए उन्होंने राज्य की राजनीति में पार्टी नेतृत्व के आत्म-संयम की सोच का विरोध नहीं किया.

चंद्रबाबू नायडू मोदी-शाह की जोड़ी को समझ नहीं पा रहे हैं

चंद्रबाबू नायडू एक बार फिर खतरे की सीमा तक जा कर खेल रहे हैं, लेकिन शायद वह मोदी-शाह की जोड़ी को वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी जैसा समझ कर गलती कर रहे हैं. तब से अब तक हालात बहुत ज्यादा बदल चुके हैं. वाजपेयी आडवाणी के उलट, जिनको लगता था कि उनकी पार्टी का दक्षिण में पांव जमाना मुश्किल होने के कारण क्षेत्रीय गुटों से गठबंधन जरूरी है, मोदी और शाह बीजेपी के लिए इस तरह के किसी भी कमजोरी के विचार को सिरे से नकार देते हैं. बल्कि ये तो कुछ राज्यों में पार्टी के अपने बल पर दीर्घकालीन विकास में यकीन रखते हैं, जिसे गठबंधन साझीदारों की बैसाखी की जरूरत ना हो. यही कारण है कि बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी शिवसेना महाराष्ट्र में मुश्किल का सामना कर रही है.

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मोदी-शाह जानते हैं कि गलत गठबंधन साझीदारों का चुनाव कई बार बीजेपी के विकास को नुकसान पहुंचाता है, जैसा कि पंजाब में हुआ. पार्टी नेतृत्व ने यह रणनीति बनाई है कि अब साझीदार की अक्षमताओं से पार्टी को नुकसान नहीं पहुंचने देना है. मोदी-शाह की गठबंधन धर्म की परिभाषा वाजपेयी-आडवाणी के बीत चुके जमाने से अलग है.

इसके साथ ही पुरानी यादें नए एनडीए गठबंधन के रिश्तों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. चुनाव की घड़ी नजदीक आने पर चंद्रबाबू नायडू के अल्पसंख्यक वोट बैंक की तरफ भागने की आदत रही है. जब एनडीए 2004 में चुनाव हार गया और आंध्र प्रदेश में नायडू भी चुनाव हार गए तो उन्होंने इसके लिए भी बीजेपी संग गठबंधन को जिम्मेदार ठहराया था. हालांकि हकीकत काफी जुदा थी.

narendra modi chandra babu naidu

वह अपनी बहुत ज्यादा तड़क-भड़क के कारण हारे, जिसके बारे में उनका अपना मानना था कि नफासत और साइबर रुझान वाले मुख्यमंत्री की छवि के कारण वह कभी चुनाव हार ही नहीं सकते. उनकी पार्टी टीडीपी ग्रामीण आंध्र प्रदेश में बुरी तरह हारी जबकि कांग्रेस के वाईएस राजशेखर रेड्डी नए हीरो के तौर पर उभरे, जिन्होंने 2009 में हेलिकॉप्टर क्रैश में मौत होने तक करीब एक दशक नायडू को उभरने नहीं दिया.

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जाहिर तौर नायडू की पहलकदमी उनकी अपनी असुरक्षाओं से उपजी है. देश भर में क्षेत्रीय पार्टियों के घटते प्रभाव को देखते हुए. वह जानते हैं कि शक्तिशाली बीजेपी उन्हें एकदम किनारे लगा देगी, जो कि उनके राजनीतिक तड़क-भड़क वाले तेवर से मेल नहीं खाता. अगर वह चुनाव हारते हैं, तो उनके इतिहास के गर्त में चले जाने की संभावना है और नई राजनीतिक पीढ़ी आंध्र प्रदेश में उनकी जगह ले लेगी. मोदी-शाह की जोड़ी ने इस बार उनकी गीदड़भभकी ताड़ ली है. उनके उनकी मांगों के आगे झुकने से दृढ़ता से इनकार से जाहिर है कि उनके मन में आंध्र प्रदेश के बारे में नायडू के बिना कोई योजना है.

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