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चंद्रबाबू नायडू भूल रहे हैं कि ये साल 2004 की नहीं बल्कि साल 2018 की NDA है

दूसरे क्षेत्रीय पार्टियों की ही तरह क्या नायडू भी बीजेपी की बढ़ती ताकत से खुद को कहीं असुरक्षित तो महसूस नहीं कर रहे

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Mar 08, 2018 11:13 PM IST

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चंद्रबाबू नायडू भूल रहे हैं कि ये साल 2004 की नहीं बल्कि साल 2018 की NDA है

एनडीए से नाता तोड़ने का ऐलान कर आंध्रप्रदेश की सत्ताधारी तेलुगु देशम पार्टी ने अचानक देश की सियासत में हलचल तेज कर दी थी. लेकिन पीएम मोदी से आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की बातचीत के बाद सियासी हालात भी बदले. टीडीपी ने एनडीए में बने रहने का फैसला तो सुनाया लेकिन अपने मंत्रियों के इस्तीफे भी सौंप दिए.टीडीपी ने कहा 'हम एनडीए का हिस्सा बने रहेंगे लेकिन कोई मंत्रीपद नहीं लेंगे.’

ये चंद्रबाबू नायडू की राजनीति का सोचा-समझा जोखिम और स्टाइल है. यानी 'हम साथ-साथ हैं' लेकिन 'आसपास' नहीं हैं. उनके मुताबिक दूरियों की वजह वो शिकायतें हैं जो पीएम मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली सुन नहीं रहे हैं.

नायडू की शिकायत है कि केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष राज्य के दर्जे का वादा पूरा नहीं किया. जबकि केंद्र की दलील है कि तेलंगाना राज्य के निर्माण के वक्त तक विशेष राज्य के दर्जे का विचार मौजूद था लेकिन 14वें वित्त आयोग के तहत यह दर्जा अब सिर्फ पूर्वोत्तर और तीन पहाड़ी राज्यों तक सीमित हो गया है.

KV RAMCHANDRA RAO

राजनीति में भविष्य अनिश्चितताओं से भरा होता है. ये अनिश्चितता तब और गहरा जाती है जबकि गठबंधन का मामला हो. गठबंधन में हर घटक दल अपनी प्राथमिकताओं का चयन करते हुए अपनी ही पार्टी के प्रमुख हितों को महत्व देते हैं. क्षेत्रीय पार्टियां अपने स्थानीय मुद्दों को ही तरजीह देती हैं और उसके हिसाब से सौदेबाजी करती हैं. चंद्रबाबू नायडू भी उसी सियासी मोलभाव के माहिर माने जाते हैं.

चंद्रबाबू नायडू एनडीए के संयोजक भी रहे हैं. उन्होंने 24 घटक दलों वाली केंद्र की वाजपेयी सरकार भी देखी है. शायद अभी भी उनके जेहन में उसी एनडीए की छाप बरकरार है जिसकी सरकार चलाने के लिए तत्कालीन पीएम वाजपेयी के 'उदारवाद' का क्षेत्रीय दल फायदा उठाने की कोशिश करते थे. लेकिन वो ये भूल रहे हैं कि इस बार केंद्र में बीजेपी अपने पूर्ण बहुमत के साथ है तभी वो टीडीपी की धमकियों के आगे झुकी नहीं है. पूर्ण बहुमत के बावजूद बीजेपी ने गठबंधन के धर्म को निभाया है. मंत्रीमंडल के विस्तार में सहयोगी दलों की अनदेखी नहीं की.

केंद्र सरकार ये साफ कर चुकी है कि वो विशेष राज्य के दर्जे की बजाए विशेष पैकेज देने को तैयार है. लेकिन चंद्रबाबू नायडू 'स्पेशल स्टेटस' में ही अपनी सियासत का मास्टर स्ट्रोक देखने की भूल कर रहे हैं.

naidu and modi

नायडू ये भी भूल रहे हैं कि उनके राज्य में इस मुद्दे को हथियाने के लिए वाइएसआर कांग्रेस भी बराबरी के मुकाबले में हैं. ऐसे में चंद्रबाबू नायडू की जल्दबाजी उनकी अधीरता को दर्शाती है.

दरअसल अगले साल आंध्र प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में  चंद्रबाबू नायडू एक तीर से दो शिकार करना चाहते हैं.  इसीलिए वो विशेष राज्य के दर्जे की मांग के मुद्दे पर दूसरी पार्टियों से दो कदम आगे चलने की तेजी दिखा रहे हैं और एनडीए को पीछे छोड़ने की रणनीति बना रहे हैं.

टीडीपी ने भले ही एनडीए में बने रहने का ऐलान कर सियासी भूचाल की तीव्रता को कम किया हो लेकिन उसके मंत्रियों के इस्तीफे के बाद उनकी भविष्य की रणनीति को समझा जा सकता है. फिलहाल उन्होंने मंत्रियों के इस्तीफे का पहला कदम उठाकर विशेष राज्य के मुद्दे को अपनी जेब में रखने का काम किया है. लोकसभा चुनाव से पहले वो जनभावना और सियासी माहौल देखते हुए एनडीए से नाता तोड़ने का ऐलान करने में देर भी नहीं करेंगे.

MODI-CHANDRABABU

आंध्रप्रदेश में लोकसभा की 25 सीटें हैं. सभी दलों को इस मुद्दे के दम पर अगले साल के चुनावों में सियासी फायदा दिखाई दे रहा है. वाईएसआर कांग्रेस आंध्र के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग पूरा न होने पर अपने सांसदों के इस्तीफे की धमकी दे रही है. वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी विशेष राज्य का दर्जा दिलाने का आश्वासन दे रहे हैं. जबकि केंद्र सरकार इस मुद्दे को चुनाव तक टालने के मूड में थी.

सवाल उठता है कि विशेष राज्य के मुद्दे की वजह से बीजेपी को कितना नुकसान हो सकता है?

बीजेपी के पास इस समय आंध्र प्रदेश में केवल 2 ही लोकसभा की सीटें हैं. टीडीपी ने जिस तरह से वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया है उससे बीजेपी के लिए चुनाव में दिक्कतें जरूर पेश आएंगी. वहीं वाईएसआर कांग्रेस और कांग्रेस भी केंद्र सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. ऐसे में नुकसान सीधे तौर पर बीजेपी का ही हो सकता है.उसके लिए आंध्रप्रदेश की जनता को ये समझा पाना आसान नहीं होगा कि आखिर क्यों विशेष राज्य के दर्जे की मांग को पूरा नहीं किया?  जबकि पिछले एक दशक में आंध्र प्रदेश में बीजेपी ने जनाधार बढ़ाने में कामयाबी पाई है.

bjp narendra modi

गठबंधन में राजनीतिक विवशताएं ही राजनीतिक गठबंधन को तोड़ने और बनाने में काम आती हैं. गठबंधन का कोई राष्ट्रीय चरित्र नहीं होता है. लेकिन मजबूरी ये है कि ऐसे गठबंधन को नकारा भी नहीं जा सकता है. इसी मजबूरी के चलते तनाव के बावजूद एनडीए में टीडीपी बनी हुई है क्योंकि सियासी अनुमान ये भी कहता है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव आते-आते वक्त और हालात साल 2014 के लोकसभा चुनाव से बेहद जुदा हो सकते हैं.

फिलहाल सवाल उठता है कि दूसरे क्षेत्रीय पार्टियों की ही तरह क्या नायडू भी बीजेपी की बढ़ती ताकत से असुरक्षित तो नहीं महसूस कर रहे क्योंकि ये खबर उन्हें भी है कि आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस भविष्य में उनका ही विकल्प बीजेपी के लिए बन सकती है.

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