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देश को एक चंपारण जैसा सत्याग्रह फिर चाहिए....

सौ साल पहले भी समस्या गरीबों और किसानों की थी, आज भी वही समस्या सामने है. बस इतने फर्क के साथ कि तब हुकूमत गोरों की थी, अब कालों की है

Nazim Naqvi Updated On: Apr 10, 2018 08:23 AM IST

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देश को एक चंपारण जैसा सत्याग्रह फिर चाहिए....

सौ साल पहले आज के दिन जो कुछ चंपारण की जमीन से शुरू हुआ था, आज फिर उसी जैसी शुरुआत की जरूरत है. बस फर्क इतना है कि अब इसके लिए किसी गांधी की ज़रुरत नहीं है. सौ साल पहले बस एक गांधी था, आज सवा सौ करोड़ लोगों में गांधी बसते हैं.

सौ साल पहले भी समस्या गरीबों और किसानों की थी, आज भी वही समस्या सामने है. बस इतने फर्क के साथ कि तब हुकूमत गोरों की थी, अब कालों की है. उस समय भी बेगारी कराई जा रही थी, शोषण किया जा रहा था, इस शोषण में हुक्मरानों के साथ जमींदार और बड़े तबके वाले मिले हुए थे. क्या आज भी ऐसा नहीं है?

एक आंदोलन दलितों के लिए

सौ साल पहले गांधी ने जिनके हुकूक के लिए एक अंतहीन लड़ाई की शुरुआत की थी वह भूमिहीन मजदूर और शोषित किसान थे. आज उस वर्ग का नाम दलित और आदिवासी है, उसे अनुसूचित जाति और जनजाति कहा जाता है.

सौ साल बाद आज ये तबका फिर उबाल पर है. गांधी होते तो अपनी ही सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठ जाते, यही तो बीजेपी के चार सांसदों ने किया. बीते बीस दिनों में दलितों के चार चेहरे, इटावा के अशोक दोहरे, राबर्ट्सगंज के छोटेलाल खरवार, नगीना के यशवंत सिंह और बहराइच की सावित्री बाई फूले, अपनी ही सरकार के विरोध में उतर आए.

यह वह नाम हैं जो खुलकर सरकार की आलोचना कर रहे हैं. इन सबका कहना है कि सरकार ने उनके समुदाय की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं. ये सब केंद्र और उत्तर-प्रदेश की राज्य सरकार पर दलितों के खिलाफ भेदभाव करने का इल्जाम लगा रहे हैं.

यह सब पहली बार सांसद बने हैं. इनको तो बीजेपी और मोदी का शुक्रगुजार होना चाहिए. इनकी कोई दुश्मनी न बीजेपी से है न मोदी से मगर जिस समाज का यह प्रतिनिधित्व करते हैं उसके दबाव में इन्हें इस विरोध में उतरना पड़ रहा है. उदाहरण के लिए, यशवंत सिंह का पत्र देखिए जो बहुत कुछ कहने की कोशिश करता है. वह लिखते हैं कि 'एक दलित होने के नाते, मेरी क्षमताओं का उपयोग नहीं किया गया है, मैं सिर्फ आरक्षण के कारण सांसद बन गया हूं.'

बराबरी के लिए एकसाथ आए दलित

सौ साल बाद सामाजिक बराबरी के लिए उठ खड़े हुए दलित और आदिवासी नौजवान की पीठ पर अब पीढ़ियों का बोझ नहीं है. उसे कोई इतिहास नहीं ढोना है और न ही उसमें उसकी दिलचस्पी है. वह 21वीं सदी में 12वीं और 13वीं सदी का बनकर नहीं रहना चाहता. यह नौजवान अपडेट भी है और टेक्नोलॉजी ने उसे सूचनाओं से भी जोड़ दिया है.

दरअसल गांधी ने इसी जागरूकता को फैलाने के लिए चंपारण का वह आंदोलन शुरू किया था. तब तक यह देश न आंदोलन शब्द से परिचित था, न ही सत्याग्रह के मायने जानता था. गांधी के सामने चैलेंज बड़ा था लेकिन इसके लिए उन्हें डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. अनुग्रह नारायण सिंह, आचार्य कृपलानी, बृजकिशोर, महादेव देसाई और नरहरी पारिख जैसे अनुयायी मिल गए थे. आज की समस्या यह है कि नेताओं ने अपना कद खो दिया है.

Mahatma_Gandhi_at_railway_station

चंपारण में अपने साथ चलने वालों के सामने उनकी पहली शर्त थी- डर से अजादी, क्योंकि वह जानते थे कि अंग्रेजों से आजादी इतनी मुश्किल नहीं है, जिनती अज्ञानता से. उन्होंने ने इस अज्ञानता से लड़ने के लिए अपने साथियों को जगह-जगह ग्रामीण-विद्यालय खुलवाने के लिए भेजा ताकि गरीबों और किसानों के बच्चे पढ़ सकें और आजादी का मतलब समझने लायक बन सकें. उनमें बेहतर रहन-सहन की और साफ-सफाई की समझ पैदा करने के प्रयास किए गए. उनके प्रभाव में राजेन्द्र बाबू और अनुग्रह बाबू जैसों ने खुद भोजन बनाना, मैला ढोना, झाड़ू लगाना सीखा.

गांधी ने दिया सोचने का साहस

गरीब किसान और मजदूर तबके में, साफ-सफाई करने वाले और मैला ढोने वाले तबके में गांधी के इन परिवर्तनों से ही यह सोचने का साहस आया कि उनमें और गांधी में कोई फर्क नहीं है. यही वो आत्मसम्मान था जो गांधी अपने देश के दबले और कुचले तबके में पैदा करना चाहते थे.

दुनिया के जितने भी सुधारक हुए हैं, जिन्होंने अपने-अपने देशों में दबे-कुचले समाज को खड़ा करने की कोशिशें कीं, उनमें एक बात सामान्य तौर पर पाई जाती है कि वे सब उसी समाज का हिस्सा बन गए थे. गांधी ने भी दरिद्र-नारायण का चोला इसी लिए पहना था.

बात सच भी है, दूसरे की तकलीफ तभी समझ में आती है जब उस तकलीफ से आप खुद गुजरें. गांधी के पीछे चलने वाला जन-समूह भाड़े का नहीं था. इसीलिए अंग्रेजों को जाना पड़ा. लेकिन गांधी इस आजादी से या ऐसी आजादी से खुश नहीं थे, इसके अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं.

पर क्या किया जाए कि सत्ता की मदमस्ती में हमारे अपने अंग्रेजों... काले अंग्रेजों ने गांधी की व्यथा को पढ़ने की कोशिश भी नहीं की थी और न ही उन्हें उस दलित और शोषित समाज की परवाह रही. संविधान की भाषा में उस व्यथा को शब्द देकर उसने इति-श्री कर ली. थोडा बहुत जो सरोकार रह गया वह भाषणों में सिमट गया.

क्या चाहता है आज का युवा?

लेकिन आज सवा सौ करोड़ के इस देश में पैंसठ प्रतिशत आबादी की उम्र 35 वर्ष के आस-पास है. यह युवा चाहता है कि जो इतिहास उसने पढ़ा है या जिस वर्तमान में वह रह रहा है, उससे बेहतर भविष्य की कल्पना वह करे. इस 65 प्रतिशत में उन युवाओं का प्रतिशत सबसे ज्यादा है जो दलित और आदिवासी हैं, जिनका एक तबका शिक्षित भी है और जागरूक भी.

उसे अपने इतिहास का चेहरा कुरूप दिखाई देता है और वर्तमान में जब वह, अनुसूचित-जाति जनजाति अत्याचार निवारण कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट जैसे फैसलों को देखता है तो क्रोध से फट पड़ता है. उसी की बानगी है यह वर्तमान विरोध.

दूसरी तरफ ऊंची-जाति की मानसिकता आज भी वही है. आजाद भारत में एक गुलाम भारत पल रहा है. अब वह मुठभेड़ कर रहा है, अपने ही हुक्मरानों से. इसे जितनी जल्दी समझा जाए उतना अच्छा ही होगा.

क्या मिल रहा है दलितों को?

आखिर 21वीं सदी में यह दलित और आदिवासी 12वीं और 13वीं सदी का बनकर कैसे रहेगा? लेकिन समाज का एक तबका चाहता है कि वह वैसा ही रहे, उस पर चुटकुले हों, उसको गालियां दी जाएं, अपने हिसाब से उससे मजदूरी करवाई जाए, उसको पैसे दें या न दें, क्या यह सबकुछ आज संभव है? क्योंकि अब यह नौजवान भी अपडेट है. टेक्नोलॉजी ने उसे भी सूचनाओं से जोड़ दिया है. अब वो भी ऊंच-नीच समझता है.

अब अंबेडकर का नाम जप कर, या गांधी-समाधि पर भूख हड़ताल करके इसे संतोष नहीं दिलाया जा सकता. देश की सियासत जो एक चीज़ नहीं समझ रही है वह है इतने बड़े पैमाने का सामुदायिक असंतोष. इस असंतोष को समझना होगा. क्योंकि यह असंतोष 30-32 करोड़ दलितों और आदिवासियों के बीच का असंतोष है. जो समाज के ताने-बाने को धाराशायी करने की कुव्वत रखते हैं.

नेताओं की क्या है हैसियत?

आज इस समुदाय के सामने न तो मायावती की कोई हैसियत है, न राहुल गांधी की और न ही मोदी या बीजेपी की. अब यह अपनी अस्मिता के लिए नहीं, अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है. दिल्ली के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले 20 साल से इक्विपमेंट सप्लाई करने वाले गौतम का सवाल है कि ‘यह मुद्दा इस देश के दलित के न्याय, अधिकारों और संविधान में किए गए वादों की गारंटी का मुद्दा है’. वो आगे कहते हैं, 'कहा तो ये गया था कि छुआ-छूत खत्म होगा, तो क्या वह खत्म हो गया? इसमें क्या बीजेपी और क्या कांग्रेस और क्या एसपी या बीएसपी. हर पार्टी उच्च-वर्ग की शह पर चलने के लिए मजबूर है. इसमें हमारे लिए कहां कोई गुंजाइश है? अब हम किसी पार्टी के लिए अपनी जान नहीं देंगे बल्कि उसकी गद्दी छीन लेंगे जो हमारी नहीं सुनेगा.’

क्या देश की राजनीतिक पार्टियों तक ये आवाज पहुंच रही है? क्योंकि सौ साल बाद एक चंपारण जैसा आंदोलन फिर से पनप रहा है.

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