live
S M L

सरदार पटेल की सुनते बापू तो रोकी जा सकती थी गोडसे की गोली

गांधी की हत्या को लेकर उस वक्त की सरकार पर सवाल उठाने जायज हैं?

Updated On: Apr 12, 2017 09:53 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

0
सरदार पटेल की सुनते बापू तो रोकी जा सकती थी गोडसे की गोली

पटना में आयोजित चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह में सोमवार को एक बुजुर्ग गांधीवादी ने कहा, ‘महात्मा गांधी पर बढ़ते खतरे की उस समय की सरकार ने अनदेखी कर दी. हत्या से कुछ ही दिन पहले उनकी प्रार्थना सभा में बम विस्फोट हुआ था लेकिन किसी ने सुुरक्षा का पुख्ता इंतजाम नहीं किया. जबकि दिल्ली की गद्दी पर तमाम गांधीवादी बैठे हुए थे.’

क्या उस बुजुर्ग गांधीवादी का कथन ऐतिहासिक दस्तावेजों की कसौटी पर खरा उतरता है? महात्मा गांधी की हत्या से ठीक पहले की घटनाएं इस बात की पुष्टि नहीं करतीं.

हालांकि गांधी की हत्या को लेकर जयप्रकाश नारायण और डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे समाजवादियों ने सरदार पटेल की सख्त आलोचना की थी. यानी वे भी यह कह रहे थे कि यदि सरकार चाहती तो बापू को बचाया जा सकता था.

बापू ने अपनी सुरक्षा से इनकार कर दिया था 

अब उस समय की घटनाओं पर एक नजर डाल लेना मौजू होगा. दरअसल सरदार पटेल गांधी के लिए पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था करना चाहते थे. लेकिन महात्मा गांधी ने तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को धमकी दे दी थी कि यदि प्रार्थना सभा में आने वाले किसी भी व्यक्ति की तलाशी ली गई तो मैं उसी क्षण से आमरण अनशन शुरू कर दूंगा.

ऐसे में पटेल सहित पूरी सरकार सहम गई थी. सरकार जानती थी कि बापू जो कहते हैं, वह कर गुजरते हैं. उस उम्र में अनशन गांधी जी के लिए खतरनाक साबित हो सकता था. इसलिए उनकी इच्छा के खिलाफ जाकर गांधी की सुरक्षा की कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई.

गांधी की हत्या के ठीक पहले भी बम विस्फोट हुए थे

Mahatma_Gandhi_at_railway_station

याद रहे कि 20 जनवरी को बिड़ला हाउस के पास बम विस्फोट हो चुका था और 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने प्रार्थना सभा में गोली मार कर गांधीजी की हत्या कर दी थी.

दिल्ली के बिड़ला हाउस स्थित प्रार्थना सभा में सरकारी सुरक्षा की पहल को गांधी ने इसलिए भी ठुकरा दिया था क्योंकि वह निजी सुरक्षा पर सरकारी साधनों के उपयोग के खिलाफ थे. उधर सरदार पटेल ने गांधीजी से कई बार विनती की थी कि वह बिड़ला भवन के आसपास थोड़ी सुरक्षा व्यवस्था भी मंजूर कर लें.

सरदार पटेल ने कहा था, '20 जनवरी को हुई बम विस्फोट की घटना के पहले बिड़ला हाउस की सशस्त्र सैनिकों द्वारा घेराबंदी की गई थी. बम विस्फोट के बाद प्रत्येक कमरे में एक पुलिस अधिकारी तैनात था. मैं जानता था कि महात्मा को यह पसंद नहीं था और उन्होंने इस संबंध में कई बार मुझसे बहस की थी. अंत में गांधीजी झुके. लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी परिस्थिति में प्रार्थना में शामिल होने वाले लोगों की तलाशी न ली जाए.’

सरदार पटेल की कोशिश के बावजूद उन्हें आलोचना झेलनी पड़ी 

गांधी की हत्या के बाद समाजवादियों ने सरदार पटेल के खिलाफ जो लंबा निंदापूर्ण भाषण दिया, उससे सरदार पटेल को गहरा आघात लगा था. सरदार पटेल ने 4 फरवरी 1948 को आयोजित कांग्रेस विधायक दल की बैठक में उसका जवाब दिया. भाषण के बीच में ही वे इतना भावुक हो गए कि वे अपना भाषण पूरा किए बिना ही बैठक से अचानक घर चले गए.

बाद में पटेल ने कहा, 'महात्मा गांधी को लगभग पूर्वाभास हो गया था. क्योंकि उन्होंने कहा था कि यदि कोई मेरी हत्या करना चाहे तो प्रार्थना सभा में कर सकता है. ईश्वर की इच्छा पूरी हो गई. अतः पुलिस द्वारा प्रार्थना सभा में आने वाली भीड़ की तलाशी लेने का प्रश्न ही नहीं था.'

उन्होंने कहा, 'फिर भी 30 पुलिस अधिकारी सादे कपड़ों में तैनात थे. जो गांधीजी की हत्या के दिन प्रार्थना सभा की भीड़ में सम्मिलित थे. हत्यारा महात्मा गांधी के सामने झुका, उसने उन पर पिस्तौल तान दी और इससे पहले कि कोई उसे पकड़े उसने गोलियां चला दीं. यह दुर्भाग्य था जिसे नियंत्रित नहीं किया जा सका.’

5 फरवरी 1948 को संविधान सभा में सरदार पटेल ने कहा कि 'हत्यारे ने उसी स्थिति का फायदा उठाया जिस पर गांधीजी के आग्रह के कारण सरकारी स्तर पर कार्रवाई नहीं की जा सकी. पटेल ने उन अफसरों, पुलिसकर्मियों और सेना के जवानों का विवरण संविधान सभा में पेश किया जो बापू की प्रार्थना सभा के पास तैनात थे. बापू की सुरक्षा के लिए ये बेहद जरूरी था कि वहां आने वाले लोगों की तलाशी ली जाए.'

बापू के अनेक प्रशंसक उनकी इस बात से असहमत थे और यह चाहते थे कि वे अपनी जिद छोड़ कर तलाशी की व्यवस्था स्वीकार कर लेंं.

सरदार पटेल भी ऐसा ही चाहते थे लेकिन उनकी गांधी के सामने एक न चली. जबकि उनकी हत्या के बाद पटेल को पूरे देश में बेवजह आलोचना जरूर सहनी पड़ी.

कोशिशों के बाद भी गांधी को नहीं बचाने का रहा अफसोस

नई दिल्ली के पुलिस अधीक्षक ने गांधीजी के स्टाफ के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था लेकिन उन्हें बताया गया कि गांधीजी इससे असहमत हैं. उप-महानिरीक्षक ने भी गांधीजी के स्टाफ से संपर्क किया था.

तब डीआईजी स्वयं व्यक्तिगत रूप से गांधीजी से मिले और उन्हें समझाया कि उनके जीवन पर खतरा है. उन्हें सुरक्षा प्रबंध करने की अनुमति दी जानी चाहिए. अन्यथा कोई अप्रिय घटना होने पर उनकी बदनामी होगी.

गांधीजी सहमत नहीं हुए. उन्होंने कहा, 'उनका जीवन ईश्वर के हाथ में है. यदि उनकी मृत्यु आ गई है तो कोई सावधानी उन्हें नहीं बचा पाएगी.’

सरदार पटेल का नेहरू से अनुग्रह

Nehru Gandhi 

गांधीजी की हत्या के बाद सरदार पटेल को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सुरक्षा की चिंता हुई. तब तक जवाहरलाल जी चार कमरे के एक छोटे सरकारी बंगले में रहते थे. नेहरू बड़े मकान में जाने को तैयार नहीं थे.

सरदार पटेल ने मिलकर प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि आप बड़े मकान में जाएं. लेकिन जवाहर लाल नेहरू जिद पर अड़े थे. संभवतः लोकलाज का सवाल था. बाद के वर्षों में प्रतिपक्ष ने उनकी तीन मूर्ति भवन जैसे आलीशान मकान में रहने की भारी आलोचना भी की थी.

पटेल की जिद दूसरे कारण से थी. गृह मंत्री ने नेहरूजी से कहा, 'गांधीजी को हम लोग नहीं बचा सके. इसकी पीड़ा से अभी हम उबरे नहीं हैं. यदि आपको कुछ हो गया तो हम कहीं के नहीं रहेंगे. आप बड़े मकान में जाना स्वीकार नहीं करेंगे तो मैं गृह मंत्री पद से इस्तीफा दे दूंगा.'

इस धमकी पर जवाहर लाल नेहरू मान गए.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi