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कश्मीर में तुष्टीकरण की राजनीति के खात्मे के लिए केंद्र को कदम उठाने होंगे कदम

'कश्मीर में संघर्ष' के बिगड़ते हालात की जड़ें सरकार की दशकों की उदासीनता, कुप्रबंधन, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार में मिलती हैं

Updated On: Mar 08, 2018 04:42 PM IST

Ayjaz Wani, Dhaval Desai

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कश्मीर में तुष्टीकरण की राजनीति के खात्मे के लिए केंद्र को कदम उठाने होंगे कदम

खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज बोर्ड (केवीआईबी) की भर्ती में खुलेआम भाई भतीजावाद से उपजे भारी जन असंतोष से परेशान मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने दिल्ली का दौरा किया और ‘कश्मीर में संघर्ष’ के मुद्दे से जनता का ध्यान भटकाने के लिए ‘कश्मीर पर संघर्ष’ का मुद्दा खड़ा कर दिया. पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी मुलाकात में एलओसी पर “नाजुक हालात” के चलते कश्मीरियों की 'भारी तकलीफों' का जिक्र किया और भारत-पाकिस्तान के बीच हिंसा में कमी लाने की मांग की. लेकिन वह राज्य में चौतरफा फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सरकार द्वारा किसी कार्रवाई की योजना के बारे में एक लफ्ज नहीं बोलीं, जो कि उनकी जनता की 'भारी तकलीफों' की असल वजह है.

दूसरी वजहों के साथ 'कश्मीर में संघर्ष' के बिगड़ते हालात की जड़ें सरकार की दशकों की उदासीनता, कुप्रबंधन, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार में मिलती हैं, जिनके कारण कश्मीरी नौजवानों में जबरदस्त नाराजगी है. लेकिन हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार चिंताजनक हाल में पहुंच गया है.

भाई-भतीजावाद चरम पर

बीते फरवरी महीने में राज्य के केवीआईबी के सीईओ पद पर सैयद अरुत मदनी और इंटिग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम (आईसीडीएस) के तहत हेल्थ एंड न्यूट्रीशन मोबलाइजर के तौर पर रुफाइदा मंसूर व सहारा सईद की मनमाने तरीके से नियुक्ति में एक चीज समान है- ये तीनों ही अपने पदों के लिए निर्धारित योग्यता नहीं रखते, लेकिन इनका सत्तारूढ़ पार्टी के आला लोगों से करीबी रिश्ता है.

मदनी पीडीपी की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के चचेरे भाई होने के साथ ही पार्टी के उपाध्यक्ष सरताज मदनी के बेटे हैं. रुफाइदा पीडीपी के महासचिव और केवीआईबी के वाइस चेयरमैन पीर मंसूर हुसैन की बेटी हैं, जबकि सहारा मुहम्मद सईद खान की बेटी हैं. सईद खान और सरताज मदनी में साले-बहनोई का रिश्ता है.

Mehbooba Mufti

लॉ सेक्रेटरी अब्दुल मजीद भट, जो कि केवीआईबी की भर्ती परीक्षा के कंट्रोलर भी थे, द्वारा सीआईडी के आईजी को लिखे गए पत्र ने भी हालात को और उलझा दिया है. यह इशारा देते हुए कि परीक्षा में गड़बड़ी की गई, उन्होंने परीक्षा प्रक्रिया की 'गहराई से पड़ताल' किए जाने की मांग की है.

इस अप्रत्याशित स्थिति से अचंभित मुख्यमंत्री ने आनन-फानन में मुख्य सचिव बी.बी. व्यास की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय जांच का ऐलान कर दिया, लेकिन अपनी सुविधा के हिसाब से इस संबंध में कोई औपचारिक आदेश पारित करना भूल गईं. मामले में उस समय अंदाजे के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची, जब राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) के एक वरिष्ठ अधिकारी को मीडिया रिपोर्ट में यह कहते हुए कोट किया गया कि, 'अब तक कोई आदेश जारी नहीं किया गया है और जब तक कोई आदेश नहीं जारी किया जाता जांच शुरू नहीं हो सकती.'

योग्य नहीं, अमीरजादे उम्मीदवार चुने गए

जम्मू एंड कश्मीर पब्लिक सर्विस कमीशन (जेकेपीएससी) द्वारा बड़े पैमाने पर सरकारी भर्तियों के लिए ली गई परीक्षा और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए) में भी यही हुआ, जो भ्रष्टाचार और राजनीतिक पक्षपात का शिकार हो गई. इनमें सुविचारित तरीके से योग्य उम्मीदवारों की कीमत पर अमीरजादे प्रत्याशी चुन लिए गए.

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मलाईदार पदों पर सत्तारूढ़ दल के प्रभावशाली नेताओं के नाते-रिश्तेदारों की संदिग्ध नियुक्तियों में हाल के दिनों में आई तेजी से राज्य में तुष्टीकरण की राजनीति और गर्त में गई है. सबसे बुरी बात यह है कि पहले से तनावग्रस्त राज्य में खुलेआम भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की बढ़ती घटनाओं ने राज्य में सामाजिक आर्थिक असंतोष को और बढ़ाया है.

फोटो रॉयटर से

फोटो रॉयटर से

सत्ता का दुरुपयोग और अवसरवाद उस राज्य के युवाओं में गुस्से को बढ़ा रहा है जहां पहले ही 18-29 वर्ष आयुवर्ग के युवाओं में बेरोजगारी की दर 24.6 फीसद है, जो कि राष्ट्रीय औसत 13.2 फीसद का तकरीबन दोगुना है. जाहिर है कि बेरोजगारी की इस ऊंची दर का कारण सिर्फ रोजगार के मौके में कमी या कश्मीरी नौजवानों में शिक्षा और जरूरी योग्यता की कमी नहीं है.

नेहरू के जमाने में शुरू हुआ भ्रष्टाचार

सीएमएस-इंडिया भ्रष्टाचार अध्ययन 2017 ने जम्मू कश्मीर को भारत के सबसे भ्रष्ट राज्यों में रखा है, जहां सर्वे में शामिल 84 फीसद लोगों का मानना था कि सरकारी नौकरियों में भ्रष्टाचार बढ़ा है. इस राज्य पर लंबे समय से केंद्रीय अनुदान का दुरुपयोग करने और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं. द हिंदू अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000-2016 के दौरान केंद्र द्वारा राज्यों को दिए जाने सभी अनुदानों में से जम्मू कश्मीर को 1.14 लाख करोड़ रुपए (10 फीसद) मिले, जबकि यहां देश की आबादी का सिर्फ एक फीसद हिस्सा रहता है.

इसका अर्थ है कि 1.25 करोड़ की आबादी (2011 की जनगणना के अनुसार) वाले जम्मू कश्मीर में हर व्यक्ति को 91,300 रुपए मिले, जबकि देश की सबसे बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश में इसी अवधि के दौरान प्रति व्यक्ति 4,300 रुपए मिले. सीएजी (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) 'गंभीर आर्थिक अनियमितताओं' के लिए सरकार की कई बार आलोचना कर चुका है.

सीएजी की तरफ से सरकार को ताजा फटकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने में ढिलाई बरतने और जरूरतमंद आबादी के बड़े हिस्से को टार्गेटेड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (टीपीडीएस) से वंचित रखने और '17.89 करोड़ रुपए का अनाज अयोग्य परिवारों' को बांट देने के लिए पड़ी है.

समग्रता से देखें तो जम्मू कश्मीर में भारत सरकार द्वारा एक रणनीति के तहत राजनीतिक तुष्टीकरण के लिए भ्रष्टाचार की शुरुआत 1953 के बाद शुरू की गई और नेहरू ने राज्य में रसूखदार तबके को खुश रखने के इकलौते मकसद के साथ इसे संस्थागत रूप दिया.

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मेनस्ट्रीम जर्नल में 16 मार्च 1991 को प्रकाशित लेख में प्रो. रियाज पंजाबी लिखते हैं, शेख अब्दुल्ला की 1953 में गिरफ्तारी के बाद पैदा हुए हालात में भारत की एकता को आसन्न खतरे से निपटने के लिए 'जम्मू कश्मीर में राष्ट्रीय एकीकरण के वास्ते भ्रष्टाचार को एक मॉडल के तौर पर लागू किया गया.' लेकिन इसके उलट भ्रष्टाचार ने इस मुस्लिम बहुसंख्या वाले राज्य और शेष भारत के बीच खाई को और गहरा करने में योगदान दिया.

प्रो. सुमांतरा बोस अपनी किताब ‘कश्मीरः द रूट्स ऑफ कॉन्फ्लिक्ट, पाथ्स टू पीस’ में बताते हैं कि राज्य में इसके बाद का बख्शी गुलाम मुहम्मद का दौर, 'चौतरफा भ्रष्टाचार, जिसमें अधिकारी जैसे चाहे सरकारी खजाने को लूट रहे थे, और माफिया जैसी स्वेच्छाचारिता, पुलिस का मनमाना इस्तेमाल और किसी भी किस्म के प्रतिरोध के खिलाफ प्रोफेशनल गुंडों का इस्तेमाल' से भरा था.

जम्मू कश्मीर के पूर्व गवर्नर जग मोहन ने भी अपनी किताब, ‘माई फ्रोजेन टर्बुलेंस इन कश्मीर’ में यही बातें दोहराई हैं और बताते हैं कि किस तरह राजनीतिक रसूखदार लोग अपने फायदे के लिए केंद्र और यहां तक कि विदेशों में भी एजेंसियों से पैसा हड़प लेते हैं.

फोटो रॉयटर से

फोटो रॉयटर से

केंद्र में बाद में आने वाली सरकारों ने भी वित्तीय अनियमितता और खुलेआम भ्रष्टाचार पर इसी नेहरूवादी रवायत को कायम रखा और कभी भी बेईमान अफसरों और नेताओं के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई. दूसरी तरफ राज्य ने हमेशा तनाव को अपनी गड़बड़ियों को ढांपने के लिए मोलभाव के औजार के रूप में इस्तेमाल किया.

तुष्टीकरण की राजनीति, जिसके चलते कश्मीर की राजनीति में भ्रष्टाचार रच-बस गया था, ने एक और बाईप्रोडक्ट को जन्म दिया. इसने कट्टरपंथियों को खुली छूट देने के साथ ही कश्मीरियों में अलगाव की भावना को जन्म दिया. इससे पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों, कट्टरपंथियों और मुख्यधारा के राजनेताओं को स्थानीय लोगों की भावनाओं से खेलने का जरिया और घाटी के कुंठित युवाओं को नई दिल्ली के खिलाफ भड़काने का मौका मिल गया.

नेता, विधायक की संतानें पा रहीं नौकरियां

नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता जुनैद अजीम मटू ने ट्वीट किया है, 'हमारे प्रतिभाशाली, शिक्षित युवाओं में ‘निराशा’ का भाव @JKPDP की देन है! आरएसएस और आईबी प्रायोजित 'कंसलटेंट्स' की सेवाएं लेने से लेकर इसके नेताओं और विधायकों की संतानों को सरकारी विभागों में समायोजित किया जा रहा है- यही पीडीपी का असली चेहरा है और उनकी असली मंशा लोगों के सामने आ चुकी है.' हालांकि नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता जो शिकवा कर रहे हैं, अगर पार्टी प्रमुख डॉ.फारुख अब्दुल्ला पर लगे जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन में करोड़ों के कथित घोटाले को देखें तो, यही इल्जाम इनकी पार्टी पर भी बनता है.

शुक्र है मटू के 'निराशा के भाव' ने घाटी में अभी भी बहुत से नौजवानों को नहीं छुआ है और वो अब भी ऐसी गलत हरकतों और शक्ति के दुरुपयोग से आजादी की उम्मीद रखते हैं, जैसा कि 28 जनवरी 2018 को पीएमओ शिकायत प्रकोष्ठ को मिली एक ई-मेल से जाहिर होता है. केवीआईबी की नौकरी, जो सैयद मदनी को दे दी गई, से वंचित रह गए एक उम्मीदवार द्वारा लिखे गए इस ई-मेल में, 'प्रतिष्ठित पदों पर रसूखदार लोगों की नियुक्ति के गंभीर आरोप' लगाए गए हैं.

इसमें प्रधानमंत्री से 'इस मामले को देखने की मांग देखने की गई है जो कि सुशिक्षित युवाओं के आतंकवाद के रास्ते पर जाने और राज्य में कट्टरपंथ के पनपने का प्रमुख कारण' है.

राज्य को मिले स्वयत्तता पर भी सवाल

रोमन साम्राज्य के इतिहासकार सीनेटर टेसिटस ने अपनी किताब ‘द एनल्स ऑफ इम्पीरियल रोम’ में वह मशहूर लाइन लिखी है, 'राज्य जितना भ्रष्ट होगा, उतने ही ज्यादा कानून होंगे.' कश्मीर इस अवधारणा को पुष्ट भी करता है और खंडन भी. राज्य में जहां ढेरों प्रांतीय कानून हैं, वहीं अनुच्छेद 370 के तहत मिले विशेष दर्जे और स्वायत्तता के चलते कई केंद्रीय कानून यहां लागू नहीं होते.

अंत में हम कह सकते हैं कि राज्य सरकार ने अपनी स्वायत्तता का इस्तेमाल ना तो समता, समानता और समाज के कल्याण के लिए किया, ना ही केंद्र ने ऐसी स्वायत्तता के खुले दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए कुछ किया. जैसा कि निराश उम्मीदवार ने पीएमओ को लिखी अपनी ई-मेल में मांग की है, अब समय आ गया है कि नई दिल्ली खामोश ना रहे और राज्य में बढ़ते भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए.

फोटो रॉयटर से

फोटो रॉयटर से

सबसे पहले तुष्टीकरण का खात्मा किया जाना चाहिए और नई दिल्ली को भारत के सभी भ्रष्टाचार विरोधी कानून, खासकर भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 जम्मू कश्मीर में लागू करना चाहिए. 2010 के बाद सामने आए सभी घोटालों की सीबीआई जैसी स्वतंत्र इकाई द्वारा जांच कराई जानी चाहिए. केंद्र सरकार को जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के आदेश देने का इंतजार करने के बजाय खुद पहल करनी चाहिए, जैसा कि इसने जेकेसीए घोटाले में सीबीआई को जांच करने के आदेश देकर किया था.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार ने 'मिनिमम गवर्मेंट, मैक्सिम गवर्नेंस' का वादा किया था. वह जम्मू कश्मीर के लोगों को ईमानदार और अच्छी सरकार देकर बहुत लंबे खिंच चुके ‘कश्मीर में संघर्ष’ के मुद्दे को हल करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं. यह कश्मीरी नौजवानों में भरोसा जगाने के लिए एक बड़ा कदम हो सकता है.

तुष्टीकरण की नाकामयाब राजनीति- जिससे भारत और कश्मीर दोनों का ही कुछ भला नहीं हुआ और सिर्फ पाकिस्तान का फायदा हुआ- के उलट इस कदम से भारत के साथ कश्मीर के अर्थपूर्ण एकीकरण की राह आसान होगी. अगर ऐसा नहीं किया गया तो घाटी में पाकिस्तान समर्थित खुराफाती लोग नौजवानों में कट्टरपंथ व अलगाव को बढ़ावा देकर हालात का फायदा उठाएंगे और ‘कश्मीर पर संघर्ष’ में छद्म युद्ध के लिए उनका इस्तेमाल करेंगे.

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