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CBI की पूछताछ पर इतना हंगामा क्यों बरपा? संघीय व्यवस्था का हवाला देकर किसे बचाना चाहती हैं ममता?

इस ताजा विवाद से ये संदेश ही जाता है कि ममता सरकार शारदा चिटफंड घोटाले को लेकर भ्रष्टाचारियों के साथ खड़ी हैं क्योंकि टीएमसी के कई नेताओं के नाम भी शारदा घोटाले से जुड़े हैं

Updated On: Feb 04, 2019 03:55 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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CBI की पूछताछ पर इतना हंगामा क्यों बरपा? संघीय व्यवस्था का हवाला देकर किसे बचाना चाहती हैं ममता?

पश्चिम बंगाल की राजनीति ने देश की सियासत में भूचाल ला दिया है. दस साल बाद राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धरने पर बैठी हैं. ये धरना CBI और केंद्र सरकार के खिलाफ है. इससे पहले ममता बनर्जी सिंगूर और नंदीग्राम के मुद्दे पर राज्य की तत्कालीन सीपीएम सरकार के खिलाफ धरने पर बैठी थीं.

लेकिन दोनों वक्त के दौर और मुद्दों में जमीन-आसमान का फर्क है. दस साल पहले मां-माटी-मानुष की बात कर ममता सत्ता के सिंहासन पर पहुंची थीं. लेकिन इस बार वो सीबीआई की कार्रवाई से बौखलाई मोदी सरकार पर संविधान पर हमला करने का आरोप लगा रही हैं.

इस बार बड़ा फर्क इसलिए भी है कि देश के इतिहास में पहली बार कोई सीएम किसी पुलिस अधिकारी को बचाने के लिए धरने पर बैठा है और धरना स्थल पर ही कैबिनेट की बैठक भी कर रहा है. दरअसल, ममता बनर्जी जिस पुलिस अधिकारी को बचाने की कोशिश कर रही हैं उस पर शारदा चिटफंड घोटाले के सबूत मिटाने के गंभीर आरोप खुद सीबीआई लगा रही है.

शारदा घोटाले की जांच से जुड़ी कुछ खास फाइलों और दस्तावेज के गायब होने के मामले में सीबीआई पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करना चाहती थी. लेकिन कमिश्नर निवास पर गए सीबीआई अधिकारियों के साथ न सिर्फ धक्का मुक्की हुई बल्कि उन्हें हिरासत में भी ले लिया गया. यहां तक कि खुद सीएम ममता बनर्जी कमिश्नर के घर पहुंच गईं और उन्होंने कमिश्नर की गिरफ्तारी का जोरदार विरोध किया.

कमिश्नर निवास के बाहर आकर ममता ने कहा कि मोदी सरकार देश के संविधान पर हमला कर रही है. लेकिन आरोप लगाने से पहले ममता बनर्जी को ये जवाब देना चाहिए कि सीबीआई अधिकारियों के साथ झूमाझटकी होना और उन्हें गिरफ्तार करना क्या संवैधानिक व्यवस्था पर हमला नहीं है? क्या किसी घोटाले में किसी आरोपित अधिकारी से सीबीआई की पूछताछ राज्य की सरकार के खिलाफ 'तख्तापलट' की कोशिश है?

दूसरे राज्यों को गलत संदेश जा रहा है

क्या देश के इतिहास में कभी ऐसा हुआ है कि किसी आरोपी को बचाने के लिए खुद मुख्यमंत्री उसके घर पहुंच जाए और बाद में धरने पर बैठ जाए? कोलकाता पुलिस कमिश्नर को राजनीतिक संरक्षण देने के पीछे आखिर क्या वजह है?

दरअसल, ममता बनर्जी की ‘स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स’ ही देश के लोकतंत्र के भविष्य के प्रति गंभीर खतरा पैदा कर रही हैं. ममता जिस तरह से अपने राजनीतिक हित के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कर रही हैं वो संघीय व्यवस्था के दुरुपयोग की ताजा मिसाल है.

आखिर शारदा चिटफंड घोटाले और रोजवैली घोटाले की वजह से ममता बनर्जी इतना आपा क्यों खो बैठीं कि उन्होंने आज पश्चिम बंगाल की विधानसभा में बजट पेश करने की बजाए कोलकाता कमिश्नर के समर्थन में धरना देना ज्यादा जरूरी समझा? क्या शारदा घोटाले के 'कुछ खास लोग' पश्चिम बंगाल की जनता से ज्यादा मायने रखते हैं?

कोलकाता में धरने पर बैठीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी

कोलकाता में धरने पर बैठीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी

आज भले ही मोदी विरोध के नाम पर एकजुट होने का दावा करने वाला विपक्ष इस मुद्दे पर ममता बनर्जी के साथ है लेकिन सीबीआई के साथ राज्य सरकार के बर्ताव से दूसरे राज्यों के लिए एक गलत संदेश जा रहा है.

बात सिर्फ सीबीआई की एन्ट्री की नहीं बल्कि अपने राजनीतिक फायदे के लिए दूसरे राजनीतिक दलों को रैली न करने देना और राजनेताओं के हैलिकॉप्टर लैंड न करने देकर ममता सरकार कौन सा लोकतंत्र बहाल करना चाहती हैं? ममता आखिर किस संविधान पर हमले की बात कर रही हैं? क्या वो उस ‘ममता-संविधान’ की बात कर रही हैं जिसके तहत बीजेपी नेताओं के हैलिकॉप्टर को पश्चिम बंगाल में उतरने की इजाजत नहीं मिलती?

अगर यही व्यवस्था तय हो गई तो भविष्य में न तो किसी सरकारी कार्यक्रम, आयोजन या चुनावी रैली में कोई नेता या मंत्री किसी दूसरी पार्टी की सरकार के राज्य में जा सकेगा और न ही किसी राज्य पर केंद्र सरकार का कोई वैधानिक अधिकार रह पाएगा.

संघीय ढांचे का हवाला देकर पेश किया अराजकता का नमूना

संघीय ढांचे का हवाला देकर अराजकता का ये नमूना पश्चिम बंगाल में निरंकुश होती राजनीति का कथित 'सत्याग्रह' है जिसमें सत्य की जगह भ्रमित धारणाओं का दुराग्रह ज्यादा नजर आता है. तभी कोलकाता पुलिस कमिश्नर को बचाने के लिए ममता बनर्जी सीबीआई जैसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ मोदी-विरोध का हवाला देकर खड़ी हो जाती हैं. क्या ममता बनर्जी एक संवैधानिक संस्था के सरकारी काम में गंभीर दखल नहीं दे रही हैं? क्या ममता ये बताना चाहती हैं कि देश में उनका संविधान अलग चलेगा?

ममता बनर्जी भले ही कितनी सफाई दें और मोदी सरकार पर कितने ही आरोप लगाएं लेकिन इस ताजा विवाद से ये संदेश ही जाता है कि ममता सरकार शारदा चिटफंड घोटाले को लेकर भ्रष्टाचारियों के साथ खड़ी हैं क्योंकि टीएमसी के कई नेताओं के नाम भी शारदा और रोज-वैली घोटाले से जुड़े हैं.

दरअसल, पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रंग देने के लिए ममता बनर्जी ने दस साल पुराना 'विक्टिम-कार्ड' खेला है. ये 'विक्टिम-कार्ड' ही ममता के राजनीतिक हथियारों का आखिरी 'ब्रह्मास्त्र' है क्योंकि पश्चिम बंगाल में पीएम मोदी की रैली ने टीएमसी की नींद उड़ाने का काम किया है. बीते पांच साल में पश्चिम बंगाल में बीजेपी का ग्राफ बड़ी तेजी से बढ़ा है और बीजेपी कांग्रेस और सीपीएम को पछाड़कर दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी है.

पश्चिम बंगाल में एक रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

पश्चिम बंगाल में एक रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

बीजेपी की बढ़ती ताकत को देखते हुए ही ममता बनर्जी ने मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है क्योंकि बीजेपी ने इस साल लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में 22 सीटें जीतने का टारगेट सेट किया है. ऐसे में अपने मजबूत किले में सेंध के डर से ममता ने मोदी-विरोध के लिए पूरे विपक्ष का सहारा लिया है.

पश्चिम बंगाल में महागठबंधन और विपक्षी एकता के नाम पर बुलाई गई महारैली का असली मकसद पश्चिम बंगाल में मोदी के नाम पर बीजेपी को मिलने वाले वोट को रोकना था. तभी अलग-अलग पार्टियों से आए नेताओं ने एक सुर में मोदी विरोध का नारा बुलंद किया ताकि जनता में संदेश जाए.

शाह और योगी का हैलिकॉप्टर नहीं उतरने दिया बंगाल में

इसके बावजूद पीएम मोदी की रैली में उमड़ा जनसैलाब टीएमसी को परेशान कर गया. ऐसे में ममता के लिए सीबीआई की रेड उस सियासी मौके की तरह है जो घर बैठे आसानी से मिल गया. अब मां-माटी-मानुष की बात करने वाली ममता इमोशनल कार्ड खेलकर पश्चिम बंगाल की जनता को ये बताना चाहती हैं कि उनके साथ केंद्र की मोदी सरकार सीबीआई के नाम पर डरा रही है और सरकार गिराने की साजिश रच रही है. लेकिन राजनीति में परिपक्व हो चुकीं ममता ये नहीं समझ पा रही हैं कि बीजेपी ममता सरकार पर राष्ट्रपति भवन से किसी कार्रवाई की सिफारिश कतई नहीं करेगी खासतौर से लोकसभा चुनाव के वक्त तो बिल्कुल ही नहीं.

बहरहाल, अपने मजबूत किले में ममता बीजेपी को किसी भी तरह से सेंध लगाने का मौका नहीं देना चाहती हैं. ममता ये जानती हैं कि लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल से वो जितनी ज्यादा सीटें जीतेंगीं उतनी ही पीएम पद के लिए उनकी दावेदारी भी मजबूत होगी. तभी पीएम पद की महत्वाकांक्षा और बीजेपी के बढ़ते जनाधार से हुई असुरक्षा के चलते ही राज्य में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के हैलिकॉप्टर की लैंडिंग नहीं होने दी गई. योगी आदित्यनाथ को पश्चिम बंगाल में दो जगह रैली करनी थी.

इससे पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के हैलिकॉप्टर की भी लैंडिंग रोकी गई थी. यहां तक कि अमित शाह की रथ यात्रा को भी इजाजत नहीं मिली. क्या पश्चिम बंगाल भारत देश का हिस्सा नहीं है?  आखिर ये कौन सा लोकतंत्र है जहां दूसरे राजनीतिक दलों को अपनी बात कहने की इजाजत नहीं दी जा रही बल्कि इसके उलट संविधान की दुहाई दी जा रही है. क्या पश्चिम बंगाल की जनता का शारदा चिटफंड घोटाले से कोई रिश्ता नहीं है?

बड़ा सवाल ये है कि लोकसभा चुनाव से पहले सीबीआई के किस बड़े खुलासे से डर कर ममता बनर्जी सरकार ने प्रायोजित तरीके से कोलकाता के कमिश्नर को पहले बचाने का काम किया और फिर बाद में धरना देकर राजनीतिक रंग दे दिया.

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