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लालू प्रसाद यादव: बिहार के स्वघोषित राजा ने खत्म की अपनी राजनीतिक उपयोगिता

90 के दशक में लालू को देश के सबसे बड़े नेताओं में शामिल किया जाता था. भ्रष्टाचार की जंजीरों ने उनके करियर को धुंधला कर दिया

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Jul 07, 2017 11:02 PM IST

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लालू प्रसाद यादव: बिहार के स्वघोषित राजा ने खत्म की अपनी राजनीतिक उपयोगिता

राजा गलती नहीं किया करते. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने इस दैवीय क्षमता के नियम को कानून के कठघरे में पहुंचने से पहले ही अपने और अपने परिवार के लिए खोज लिया था.

ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे साबित होता है कि उन्होंने एक राजा की तरह बिहार में शासन किया. ऐसा ही एक वाकया है जिसे पटना में एक संवाददाता के रूप में काम करते हुए लेखक ने देखा था, और जो लालू की इस मानसिकता को उजागर भी करता है.

जब लालू ने शिक्षकों से कहा 'राजा का खर्चा थोड़ी रुकता है'

बात 1993 की है जब बिहार के शिक्षकों को उनकी सैलरी कई महीनों से नहीं दी जा रही थी और वे लालू प्रसाद यादव के पास इसकी शिकायत लेकर गए. मुख्यमंत्री ने सहानुभूति भरी नजर से शिकायतकर्ताओं को देखते हुए अपनी मजबूरी बयां की, ‘सरकार का खजाना खाली है.’ इस पर प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने पूछा, ‘लेकिन आप पूरे बिहार का दौरा हेलीकॉप्टर से करते रहे हैं जिस पर भी भारी खर्च होता है.’ सवाल से बिफरे लालू ने जवाब दिया, ‘हम राजा नु हैं, राजा का खर्चा थोड़ी रुकता है.’ तिरस्कार और गुस्से में लालू के इस जवाब से निराश होकर शिक्षक लौट गए.

Young Lalu Yadav

लालू प्रसाद यादव का चरम वही था. ‘धर्मनिरपेक्षता के रक्षक’ और ‘सामाजिक न्याय के चैंपियन’ वाली छवि के साथ उन्होंने राजनीतिक पर्यवेक्षकों को हैरत में डाल दिया. वामपंथी उदारवादी बुद्धिजीवी वास्तव में उनके हाथों पलने लगे. उन्हें ऐसे एकमात्र नेता के रूप में जाना जाने लगा जो एल.के आडवाणी की रथयात्रा रोक सकता था और उन्होंने ऐसा किया भी. बीजेपी नेता के अयोध्या रथ को लालू ने 1991 में समस्तीपुर में रोक दिया था. अंग्रेजी भाषा के बुद्धिजीवियों के एक हिस्से की ‘तारीफ’ ने उनमें यह भाव भर दिया कि उनसे गलती नहीं हो सकती और उन्हें कोई हरा नहीं सकता.

शुक्रवार को सीबीआई ने उनके पटना स्थित आवास पर छापे मारे और उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को संदेहास्पद तरीकों से अकूत संपत्ति जमा करने में शामिल पाया. बदले हालात में लालू अब ऐसे राजा हैं जिनका घमंड टूटने वाला है. वह और उनके परिवार के सदस्य बेहद कमजोर हैं और गलती नहीं करने को लेकर बहाने गढ़ रहे हैं. लेकिन यह बचाव कमजोर है जो ठोस सबूतों के सामने नहीं ठहरेगा.

अब लालू प्रसाद के बेटों- बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और मंत्री तेज प्रताप यादव- के लिए नीतीश कुमार सरकार में अपने पद पर बने रहना मुश्किल होगा. माना जा रहा है कि उन्हें देर-सवेर इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया जाएगा. माना जा रहा है कि भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई ने मुख्य अभियुक्त के तौर पर तेजस्वी यादव के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है. भ्रष्टाचार का यह मामला खतरे की तलवार बनकर तेजस्वी पर मंडरा रहा है. साफ है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने डिप्टी सीएम के खिलाफ अब कार्रवाई करनी होगी.

पूरी संभावना है कि राजगीर में स्वास्थ्य लाभ ले रहे नीतीश कुमार साफ शब्दों में तेजस्वी को बताएंगे कि विकल्प बहुत सीमित है. कई मामलों में नाम होने की वजह से तेज प्रताप के खिलाफ भी मुकदमे दायर होंगे. आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि यादव परिवार के खिलाफ पुरजोर साक्ष्य हैं.

90 के दशक के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे लालू यादव

लालू यादव और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ पूरी एजेंसियां लगी हुई हैं और यह कहना गलत नहीं होगा कि वे उनके राजनीतिक पतन का अभिलेख तैयार कर रही हैं. लालू प्रसाद और उनकी राजनीति की उपयोगिता स्पष्ट रूप से खत्म हो चुकी है. लेकिन इन घटनाओं पर खुश होना गलत होगा चूंकि सम्मानजक स्थिति से लालू प्रसाद यादव का शर्मनाक पतन बिहार के लिए सामाजिक त्रासदी से कम नहीं है.

90 के दशक में वे देश के सबसे बड़े नेताओं में थे, जो राज्य में दरकिनार कर दिए गए प्रगतिशील सामाजिक ताकतों का प्रतिनिधित्व किया करते थे. ओबीसी, दलित और मुसलमानों का गठजोड़ उन्हें मसीहा के तौर पर देखा करता था, जो सामंतवाद और सवर्णों के प्रभुत्व वाले राज्य बिहार को सभी बुराइयों से मुक्त करा सकते थे.

Lalu Prasad addresses press

लालू की राजनीतिक यात्रा प्रेरक रही है. वे गरीब परिवार से आए, शिक्षा ग्रहण की और छात्र राजनीति में शुरूआती दिनों में ही कूद गए. धीरे-धीरे उन्होंने रास्ता बनाना शुरू किया और मंडल कमीशन लागू किए जाने के बाद सामाजिक न्याय के मुख्य पथ-प्रदर्शक बन गए. साधारण पृष्ठभूमि वाले लालू प्रसाद ने बिहार के गरीबों और पिछड़े तबके का भरोसा जीता. लोग उन्हें अपने जैसा मानते थे, एक ऐसा व्यक्ति, जो जनता का दुख-दर्द समझ सकता है. यह त्रासदी ही रही कि लालू ने न सिर्फ उनका विश्वास तोड़ा, बल्कि खुद को शहंशाह समझने लगे, जिन्हें ईश्वर ने राज्य में शासन करने के लिए भेजा हो.

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