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खनन घोटाले को लेकर सीबीआई के छापों का असर, अब बन सकता है यूपी में बड़ा राजनीतिक मोर्चा!

लखनऊ इस वक्त राजनीतिक हलचल का केंद्र बन गया है. एसपी-बीएसपी गठबंधन का घोषणा होते ही सीबीआई के ताबड़तोड़ छापे डाले गए हैं. जिसमें कुछ लोग समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के करीबी हैं

Updated On: Jan 07, 2019 08:57 PM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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खनन घोटाले को लेकर सीबीआई के छापों का असर, अब बन सकता है यूपी में बड़ा राजनीतिक मोर्चा!

लखनऊ इस वक्त राजनीतिक हलचल का केंद्र बन गया है. एसपी-बीएसपी गठबंधन का घोषणा होते ही सीबीआई के ताबड़तोड़ छापे डाले गए हैं. जिसमें कुछ लोग समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के करीबी हैं. इसी कारण सीबीआई की ये कार्रवाई लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है. राज्य के मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने अखिलेश यादव की भूमिका की जांच की मांग की है. जबकि किसी राजनीतिक मंशा को खारिज कर दिया है. जिससे ये साफ हो गया है कि बीजेपी इस पूरे प्रकरण का राजनीतिक फायदा उठाने की फिराक में है.

कांग्रेस को अवसर

कांग्रेस एसपी-बीएसपी के एकतरफा के गैर एलानिया गठबंधन से हतप्रभ थी. लेकिन खनन घोटाले के छापों ने कांग्रेस के लिए गुजाइंश बढ़ा दी है. कांग्रेस को लग रहा है कि एसपी-बीएसपी बीजेपी से मुकाबला नहीं कर सकती है. इसलिए कांग्रेस अब नए सिरे से मामले को गठबंधन में बदलने के फिराक में लगी है. कांग्रेस कमजोर एसपी-बीएसपी में अपना जुगाड़ बनाने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ व्यापक गठबंधन करने के लिए प्रयास कर रही है. लेकिन बीजेपी की कोशिश है कि एसपी-बीएसपी के गठबंधन में कांग्रेस शामिल ना हो पाए. सीबीआई का दबाव कितना कारगर होगा ये कहना मुश्किल है. हालांकि राजनीतिक गठजोड़ में सिर्फ संकेत से काम चल जाएगा ये बीजेपी का सोचना गलत साबित हो सकता है.

राजनीतिक विकल्प

Akhilesh_Mayawati

राजनीतिक समीकरण जिस तरह से बन रहे हैं. उससे लग रहा है कि एसपी-बीएसपी के गठबंधन को रोकना आसान नहीं है. बल्कि दबाव बनाने से समाजवादी पार्टी को कांग्रेस से सटने का मौका मिल सकता है. समाजवादी पार्टी और खासकर अखिलेश यादव को कांग्रेस पहले भी मदद कर चुकी है. जब अखिलेश समाजवादी पार्टी पर अपना अख्तियार जमाने की कोशिश कर रहे थे. बाद में एसपी कांग्रेस के अलायंस को जनता ने नकार दिया था. तब से ही अखिलेश यादव और कांग्रेस के बीच दरार पैदा हो गई थी. बीएसपी पहले से ही तीन राज्यों में सरकार का समर्थन कर रही है. जहां काग्रेस बड़ी पार्टी है. लेकिन यूपी में कांग्रेस को चुनाव पूर्व हिस्सेदारी देने से दोनों ही दल बच रहे हैं.

कांग्रेस रिस्क नहीं लेना चाहती

तीन राज्यों के चुनाव में कांग्रेस को इन दलों ने बहुमत से दूर रखा है. कई सीट कांग्रेस आप, एसपी और बीएसपी की वजह से हार गई है. कांग्रेस इससे सबक लेकर यूपी में अकेले लड़ने से कतरा रही है. कांग्रेस को लग रहा है कि यूपी में कहीं सबकी आपसी लड़ाई में बीजेपी बाजी न मार ले. कांग्रेस हर हाल में बीजेपी को रोकने के लिए कुर्बानी दे सकती है. एक व्यापक गठबंधन बीजेपी को यूपी में रोक सकता है. ये सभी विरोधी दल समझ रहे हैं लेकिन एक प्लेटफॉर्म पर नहीं आ पा रहे हैं. बीजेपी इस कश्मकश का फायदा उठाना चाहती है. लेकिन ज्यादा दबाव बनाना सभी को एकजुट करने में मददगार हो सकता है.

एकजुट होने का नुकसान बीजेपी को

सभी विरोधियों के एकसाथ खड़ा होने से बीजेपी को नुकसान है. राजनीतिक गठबंधन बनने से तो रोकना मुश्किल है. कई अहम मुद्दों पर अभी एसपी-बीएसपी कांग्रेस के साथ नहीं हैं. मसलन राफेल के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एसपी ने क्लीनचिट दे दिया था. लेकिन माया-अखिलेश को टार्गेट करने का खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है.

यूपी सरकार की नाकामी

अखिलेश यादव ने बीजेपी पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाया है. हालांकि कांग्रेस को भी नहीं बख्शा है. लेकिन समाजवादी पार्टी बीजेपी के साथ नहीं जा सकती है. बीएसपी की कमोवेश यही स्थिति है. लेकिन जिस तरह से यूपी सरकार कई फ्रंट पर काम नहीं कर पाई उससे जनता का रुझान अखिलेश की तरफ बढ़ सकता है. सीबीआई की रेड सहानुभूति बढ़ाएगी. जनता के बीच अखिलेश का प्रचार-प्रसार अपने आप होता रहेगा. एक सवाल भी खड़ा होता है कि गठबंधन की अनौपचारिक खबर के बाहर आते ही सीबीआई हरकत में कैसे आ गई? अभी तक हाथ पर हाथ धरे बैठी क्यों थी?

नया राजनीतिक समीकरण

बीजेपी के दबाव का अनचाहा फायदा कांग्रेस को मिल सकता है. यूपी में कांग्रेस को अपनी हैसियत का अंदाजा है. इसलिए कांग्रेस भले ही औपचारिक तौर पर 20 सीट की बात कर रही है. लेकिन पार्टी 12 से 15 सीट पर सेटल हो सकती है. कांग्रेस की तरफ से जो फॉर्मूला दिया जा रहा है. उसमें एसपी-बीएसपी को कुछ सीटें देनी पड़ सकती हैं. लेकिन इससे स्ट्राइक रेट बढ़ सकता है. ज्यादा सीटों पर लड़ने से ज्यादा सीटें जीतना महत्वपूर्ण है. जिसके पास ज्यादा सांसद होंगे, उसकी ताकत बढ़ेगी.

कैसे बैठेगा सीट का गणित

यूपी में 80 लोकसभा सीट हैं. जिसमें 71 बीजेपी 2 बीजेपी की सहयोगी अपना दल के पास हैं. 5 सांसद समाजवादी पार्टी के पास हैं और 2 सांसद कांग्रेस के हैं. फिलहाल कांग्रेस 2009 की स्थिति की बात कर रही है. जब लोकसभा में कांग्रेस के 23 सांसद थे. मौजूदा हालात में कांग्रेस की मोल-भाव की ताकत घटी है. कांग्रेस समझ रही है. इसलिए कांग्रेस एसपी-बीएसपी से 20 सीट छोड़ने के लिए कह रही है. इसमें कांग्रेस आरएलडी और छोटे दलों को एडजस्ट करेगी. आरएलडी को 3 से 4 सीट लड़ने के लिए मिल सकती हैं. चौधरी अजित सिंह भी कांग्रेस के साथ वाले गठबंधन के हिमायती हैं. ताकि विरोध के वोट का बिखराव ना होने पाए.

कांग्रेस की दुविधा

Rahul Gandhi (1)

कांग्रेस की दुविधा है कि संगठन के लोग अकेले चुनाव लड़ने की हिमायत कर रहे हैं. वहीं चुनावी समर में उतरने वाले संभावित बड़े नेता गठबंधन की वकालत कर रहे हैं. कांग्रेस के नेता विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि गठबंधन कांग्रेस के लिए हितकारी नहीं है बल्कि नुकसानदेह है. हालांकि कांग्रेस अभी बड़ी लड़ाई लड़ने में मशगूल है. राहुल गांधी ने भी कांग्रेस के नेताओं को यही सलाह दी थी. यानी बड़ी लड़ाई में छोटी कुर्बानी का महत्व नहीं है.

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