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कावेरी जल विवाद : SC के निर्णय से मुश्किल में रजनीकांत और सीएम पलानीस्वामी !

अब जब तमिलनाडु के किसान कावेरी डेल्टा में अपनी बर्बाद फसलों को दुःख के साथ देखेंगे तो खुद को पीड़ित और ठगा महसूस करेंगे. पलानीस्वामी को किसानों की इस भावना की चिंता करनी चाहिए.

Updated On: Feb 17, 2018 06:50 PM IST

T S Sudhir

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कावेरी जल विवाद : SC के निर्णय से मुश्किल में रजनीकांत और सीएम पलानीस्वामी !

तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के बीच दशकों पुराने कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम फैसला सुनाया. अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु को मिलने वाले पानी की मात्रा घटा दी है. जबकि पीने के पानी की मांग और औद्योगिक जरूरतों के मद्देनजर कर्नाटक को मिलने वाले पानी में इजाफा किया है.

कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसले आने के बाद शुक्रवार को चेन्नई में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी के आवास पर खामोशी छाई गई. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राज्य में हर कोई निराश दिखाई दिया. कोर्ट ने तमिलनाडु को कावेरी नदी से मिलने वाले पानी के हिस्से में भारी कटौती जो कर दी थी. साल 2007 में कावेरी रिवर ट्रिब्यूनल ने तमिलनाडु के लिए 192 टीएमसी पानी आवंटित किया था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने उसे घटाकर 177.25 टीएमसी कर दिया है. कावेरी नदी के जल में हिस्सेदारी घटने से तमिलनाडु के लोग खुद को ठगा और पीड़ित महसूस कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुनकर तमिलनाडु सरकार के सलाहकार और AIADMK के राज्यसभा सांसद नवनीतकृष्णन ने अपनी व्यथा और मनोदशा को संक्षेप में कुछ यूं बयान किया, 'हां यह हमारे लिए एक बड़ा झटका है.'

तमिलनाडु के विपरीत सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कर्नाटक में खुशी की लहर है. जैसे ही फैसला आया कांग्रेसी नेता कर्नाटक के विधानसभा भवन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को बधाई देने पहुंच गए. कांग्रेसी नेताओं से घिरे सिद्धारमैया उस वक्त विजयी मुद्रा में नजर आ रहे थे. सिद्धारमैया के हाव-भाव (बॉडी लैंग्वेज) से जाहिर हो रहा था कि सुप्रीम कोर्ट में कावेरी जल विवाद की कानूनी लड़ाई में कर्नाटक की जीत उनकी वजह से ही संभव हो पाई है. सोने पर सुहागा यह रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पीने के पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेंगलुरु को 4.75 टीएमसी पानी अतिरिक्त दिया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दक्षिण कर्नाटक में तो जश्न जैसा माहौल है. लोग मिठाइयां बांट कर अपनी खुशी ज़ाहिर कर रहे हैं.

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कर्नाटक में कावेरी डेल्टा के दो जिलों में से एक 'मंड्या' में राज्य गन्ना किसान संघ के नेता कुरुबर शांताकुमारन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को 'निष्पक्ष फैसला' माना है.

इस न्यायिक आदेश में तमिलनाडु के लिए उम्मीद की एकमात्र किरन कावेरी मैनेजमेंट बोर्ड की स्थापना है. जिसके गठन लिए राज्य में पिछले कई सालों से मांग की जा रही थी. ऐसा इसलिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सलेम जिले में स्थित मेट्टूर बांध में पानी के लिए कर्नाटक के रहमोकरम पर निर्भरता खत्म हो.

लेकिन कर्नाटक के विरोध के चलते केंद्र सरकार कावेरी मैनेजमेंट बोर्ड के गठन में कोताही करती रही. वहीं तमिलनाडु सरकार भी बोर्ड के गठन को लेकर कभी भी ज्यादा गंभीर नजर नहीं आई. दरअसल तमिलनाडु सरकार को डर था कि सूखे की स्थिति में बोर्ड उसे मेट्टूर बांध का पानी छोड़ने के लिए मजबूर कर सकता है. लेकिन अब बोर्ड से यह उम्मीद की जाती है कि वह कर्नाटक से कावेरी नदी का पानी नियमानुसार तमिलनाडु, केरल, और पुदुचेरी में छोड़े जाने की निगरानी करेगा. बोर्ड को यह अहम काम एक स्वतंत्र अथॉरिटी के तौर पर सुनिश्चित करना होगा.

कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कर्नाटक और तमिलनाडु की राजनीति के बहुत ही संवेदनशील वक्त पर आया है. एक तरफ कर्नाटक में जहां कुछ महीनों बाद चुनाव होने वाले हैं, वहीं दूसरी तरफ तमिलनाडु में पलानीस्वामी इस हफ्ते बतौर मुख्यमंत्री एक साल पूरा करेंगे. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की स्थिति यकीनन मजबूत होगी. कांग्रेस अब सिद्धारमैया को कन्नाडिगा के हितों के रक्षक और चैंपियन के रूप में पेश करेगी. ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में फायदा उठाया जा सके. इसके उलट तमिलनाडु में पलानीस्वामी को तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा.

हालांकि, पलानीस्वामी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर यकीनन रिव्यू पिटीशन दाखिल करेंगे. जिससे हो सकता है कि उन्हें आलोचनाओं से फौरी तौर पर कुछ राहत मिल जाए. लेकिन फिलहाल पलानीस्वामी की सबसे बड़ी चिंता अभिनेता से नेता बने कमल हासन हैं. कावेरी जल विवाद और उस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर वह पलानीस्वामी को घेरने में कोई कोर-कसर नहीं रखेंगे. कमल हासन 21 फरवरी को पदयात्रा पर निकलेंगे. पहले वह रामनाथपुरम में अपनी राजनीतिक पार्टी को लॉन्च करेंगे. इसके बाद रामनाथपुरम से रामेश्वरम और मदुरै होते हुए शिवगंगा तक की पदयात्रा करेंगे.

कमल हासन ने अपने इरादे पहले ही स्पष्ट कर दिए हैं कि, पदयात्रा के दौरान वह किसानों के मुद्दों पर विशेष ध्यान देंगे और हर जिले में एक गांव को गोद लेंगे. अगर कमल हासन लोगों को यह समझाने में कामयाब हो गए कि AIADMK तमिलनाडु के हितों की रक्षा करने में नाकाम साबित हुई है, तो वह यकीनन मैदान मार सकते हैं.

कमल हासन के अलावा पलानीस्वामी को द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और बाकी विपक्षी दलों के हमलों का भी सामना करना होगा. विपक्षी दल अरसे से पलानीस्वामी पर यह आरोप लगाते आ रहे हैं कि राज्य सरकार ऑटो पायलट मोड में चल रही है. वैसे पलानीस्वामी ने सिद्धारमैया को एक चिट्ठी लिखने के सिवाय तमिलनाडु के हितों के लिए ज़्यादा कुछ किया भी नहीं है. पलानीस्वामी ने सिद्धारमैया को यह चिट्ठी पिछले महीने लिखी थी. जिसमें कावेरी नदी का पानी छोड़ने के मुद्दे पर चर्चा के लिए बैठक का अनुरोध किया गया था. लिहाजा लोगों को ऐसा महसूस हो रहा है कि सिद्धारमैया ने जहां कावेरी जल के मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाते हुए जीत हासिल की, वहीं तमिलनाडु पर्याप्त लॉबिंग करने में नाकाम रहा जिससे उसके हाथ निराशा लगी.

जनवरी 2016 में जल्लीकट्टू (बैलों को साधने का परंपरागत खेल) पर लगी रोक को हटाने की मांग को लेकर राज्य के किसानों ने चेन्नई के मरीना बीच पर इकट्ठा होकर ज़बरदस्त प्रदर्शन किया था. उस वक्त किसानों ने जता दिया था कि उनमें न सिर्फ तमिलनाडु बल्कि केंद्र सरकार को भी हिला देने की कुव्वत है. क्या तमिलनाडु एक बार फिर से किसानों के क्रोध और नाराजगी का गवाह बनेगा?

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पलानीस्वामी के अलावा तमिलनाडु में रजनीकांत ऐसे दूसरे शख्स हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मुश्किल में डाल दिया है. रजनीकांत अभिनय की दुनिया से ताजा-ताजा राजनीति के मैदान में उतरे हैं. रजनीकांत का जन्म कर्नाटक के बेंगलुरु में हुआ था, लेकिन उन्होंने अपना फिल्मी करियर तमिलनाडु में बनाया. रजनीकांत पर अब कावेरी जल विवाद पर अपना रुख स्पष्ट करने का दबाव होगा. यानी रजनीकांत को सार्वजनिक तौर पर यह साफ करना होगा कि कावेरी मुद्दे पर वह अपनी जन्मभूमि (कर्नाटक) के साथ हैं या कर्मभूमि (तमिलनाडु) के साथ.

रजनीकांत की ज़ुबान से निकला एक गलत शब्द आगामी गर्मियों में रिलीज होने वाली उनकी दो फिल्मों के खतरनाक साबित हो सकता है. तमिलनाडु के अलावा रजनीकांत की कर्नाटक में भी जबरदस्त फैन फॉलोइंग है. लिहाजा उन्हें कर्नाटक के खिलाफ बोलने से भी परहेज़ करना होगा. वरना बेंगलुरु के आकर्षक बॉक्स ऑफिस पर उनकी फिल्मों को तगड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है. रजनीकांत को बहुत चतुराई और संतुलन के साथ अपनी स्थिति स्पष्ट करना होगी. वैसे अतीत में रजनीकांत ऐसा संतुलन बना चुके हैं.

उन्होंने चेन्नई में कर्नाटक के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा भी लिया था और फिर कर्नाटक पहुंचकर अपनी फिल्मों को शांतिपूर्ण तरीके से रिलीज भी करवा लिया था.

तमिलनाडु के किसानों को कर्नाटक की नीयत पर संदेह है. किसानों को लगता है कि कावेरी मैनेजमेंट बोर्ड के निर्देशों पर कर्नाटक शायद ही ध्यान दे. ऐसे में क्या तमिलनाडु को हर बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा? इन्हीं वजहों के चलते तमिलनाडु के किसान निराश और नाखुश हैं. वह विश्वासघात की भावना से भरे हुए हैं और खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं.

पिछले साल तमिलनाडु के सौ से ज्यादा किसानों ने दिल्ली आकर विरोध-प्रदर्शन किया था. यहां तक कि उन्होंने नग्न होकर भी दिखाया लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी. कई दिनों तक प्रदर्शन के बाद भी जब किसी ने किसानों की सुध नहीं ली तो वे मायूस होकर तमिलनाडु लौट गए थे. अब जब तमिलनाडु के किसान कावेरी डेल्टा में अपनी बर्बाद फसलों को दुःख के साथ देखेंगे तो खुद को पीड़ित और ठगा महसूस करेंगे. पलानीस्वामी को किसानों की इस भावना की चिंता करनी चाहिए.

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