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पेट्रोल सरचार्ज: कैशलेस व्यवस्था में बैंकों का टोपी ट्रांसफर फॉर्मूला

बैंक, तेल कंपनियां और पेट्रोल पंप मालिक धंधा कर रहे हैं. उनसे दान की उम्मीद करना बेमानी है.

Updated On: Jan 09, 2017 07:13 PM IST

Dinesh Unnikrishnan

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पेट्रोल सरचार्ज: कैशलेस व्यवस्था में बैंकों का टोपी ट्रांसफर फॉर्मूला

पेट्रोल पंप मालिकों ने 13 जनवरी तक कार्ड पेमेंट न लेने का अपना फैसला टाल दिया है. यकीन मानिए बैंको और पेट्रोल पंप मालिकों के बीच यह सुलह ज्यादा दिन नहीं चलने वाली. नरेंद्र मोदी सरकार को इस मसले का कोई स्थायी हल निकालने के लिए कुछ नया करना पड़ेगा.

भारत सरकार को इस मसले का स्थायी समाधान निकालने से पहले फिलहाल कोई रास्ता निकालना होगा. ऐसा नहीं हुआ तो कैशलेस योजना को पलीता लग सकता है. सड़क किनारे पेट्रोल पंपों से उपजी यह समस्या का कोई आसान उपाय नहीं है. इसके कई कारण हैं.

सरचार्ज का बोझ कौन लेगा?

पेट्रोल पंप के एक मालिक के मुताबिक ये बिजनेस ज्यादा फायदे वाला नहीं है. इसमें पेट्रोल पंप मालिकों का मार्जिन एक से दो फीसदी ही होता है. एक पेट्रोल पंप मालिक के परिवार वाले ने मुझे बताया कि उन्हें दो ही सूरतों में फायदा होता है. पहला, या तो वो तेल में मिलावट करें. दूसरा, ग्राहकों के लिए कोई लुभावनी योजना लाकर अपनी बिक्री बढ़ाएं.

बाकी दुकानदारों की तरह पेट्रोल पंप अपने ग्राहकों पर सरचार्ज का बोझ नहीं डाल सकते क्योंकि तेल की कीमतें और इसमें मार्जिन पहले से तय होते हैं. इस पर से अगर बैंक एक फीसदी सरचार्ज लेते हैं तो पेट्रोल पंप मालिकों के हाथ कुछ नहीं रह जाता.

पहले यह समस्या नहीं थी. लेकिन 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के बाद कार्ड से पेमेंट दोगुने हो गए. सरकार की कोशिशों और कैश की कमी के चलते कार्ड पेमेंट में इजाफा हुआ.

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नोटबंदी के पहले 50 दिनों में सरकार ने कार्ड लेन-देन पर हर तरह का सरचार्ज माफ कर दिया था. इस वजह से उस दौरान लोगों ने कार्ड का ज्यादा इस्तेमाल किया. पेट्रोल पंप मालिकों की जेब पर भी इसका असर नहीं हुआ.

हर कार्ड पेमेंट में की एक कीमत होती है. 50 दिन की मियाद खत्म होने के बाद इसका बोझ बैंकों पर पड़ने लगा क्योंकि कार्ड लेन-देन का बोझ बैंकों पर आने लगा. अपने ऊपर बढ़ते बोझ को बैंको ने पेट्रोल पंप मालिकों पर डाल दिया.

दूसरे फुटकर व्यापारियों से भी बैंक 2 से 2.5 फीसदी सरचार्ज लेते हैं. लेकिन यह सरचार्ज का बोझ सीधे ग्राहकों पर डाल दिया जाता है. पेट्रोल पंप मालिक ऐसा नहीं कर सकते.

आगे क्या?

बैंको और पंप मालिकों को होने वाले नुकसान की भरपाई किसी को तो करनी होगी. यह भरपाई सरकार, तेल कंपनियां या फिर ग्राहकों में से ही किसी एक को करनी होगी.

इस बात की पूरी संभावना है कि आखिरकार यह बोझ ग्राहक के सिर पर ही पड़ेगा. ऐसा नहीं हुआ तो सब्सिडी या फिर सरचार्ज माफी के रूप में सरकार को इसका बोझ उठाना पड़ सकता है.

कैशलेस योजना को सफल बनाने का सरकार पर दबाव

कार्ड से लेन-देन पर लगाए जाने वाले चार्ज में पूरी पारदर्शिता बरतने की भी जरूरत है. कई पेट्रोल पंप मालिक ग्राहक से 2 से 2.5 फीसदी सरचार्ज ग्राहकों से तो ले लेते हैं लेकिन कंपनी को देते नहीं. इसमें से वे एक फीसदी तेल कंपनियों को बढ़ाते हैं. बाकि वो खुद रख लेते हैं.

कार्ड पेमेंट से पेट्रोल पंप मालिकों को एक ही समस्या नहीं है. कायदे से पॉइंट ऑफ सेल मशीन के जरिए पैसा दुकानदार के खाते में एक रात में आ जाना चाहिए. लेकिन आजकल यही पैसा उन्हें तीन दिन बाद मिल रहा है.

PM Modi at Digidhan Mela

नई दिल्ली में शुक्रवार को तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित डिजिधन मेले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

इसके चलते दोबारा तेल भरवाने के लिए पंप मालिकों को पैसा उधार लेना पड़ता है. इसमें उन्हें कई तरह की टैक्स संबंधी झंझटों से दो-चार होना पड़ता है.

कार्ड से लेन-देन पर बैंक 2 से 2.5 फीसदी का चार्ज लेते हैं लेकिन पेटीएम जैसी मोबाइल वालेट कंपनियां 1 से 4 फीसदी का शुल्क लेती हैं.

सरकार पर अपनी कैशलेस योजना को सफल बनाने का दबाव है. लिहाजा उसने साफ कर दिया है कि इसका भार न तो पंप मालिकों पर पड़ेगा और न ही जनता पर.

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा,’तेल कंपनियों और बैंकों के बीच इसका हल निकालने के लिए बातचीत जारी है. डिजिटल लेने-देन को बढ़ावा देने के लिए हम  प्रतिबद्ध हैं. जनता और पंप मालिक निश्चिंत रहें. इसका बोझ उन पर नहीं आएगा.’

कैशलेस होने का फैसला जनता को तय करने दें 

लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर तेल कंपनियां और बैंक कब तक एक दूसरे को सहारा देंगी. कभी न कभी तो इसका कोई स्थाई समाधान निकालना होगा. भुगतान की सुविधा मुहैया कराने वाली कंपनियां और बैंक अपनी कमाई का जरिया नहीं छोड़ सकते. कार्ड पेमेंट से इनकी अच्छी खासी कमाई होती है.

कार्ड पेमेंट में हुआ इजाफा इनके लिए फायदेमंद भी हो सकता है और नुकसानदेह भी. बैंक सरचार्ज से आने वाला पैसा वसूलते हैं तो उन्हें फायदा होगा.

इस लेन-देन को मुफ्त करने पर बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. रिजर्व बैंक ने भी सरचार्ज हटाने के सरकार के निर्देश का विरोध किया था. यह सरचार्ज बैंक दुकानदारों से वसूलते हैं. इसे हटाना बैंको के लिए घाटे का सौदा होगा.

कार्ड पेमेंट इतनी तेजी से बढ़े हैं कि इसका बोझ सरकार या जनता में से ही किसी एक को उठाना होगा. नोटबंदी के बाद जनता के पास पहले से नकद की कमी है.

Awareness campaign for cashless transactions

उसके पास कार्ड से लेने-देन करने के अलावा और कोई चारा बचता नहीं. जब तक नकदी बाजार में पूरी तरह वापस नहीं लौट आती तब तक के लिए यह समस्या बनी रहेगी.

लेकिन एक बार नकदी बाजार में वापस लौट आती है तो यह फैसला जनता पर छोड़ना ही बेहतर होगा कि वो कैशलेस लेन-देन पसंद करता है या फिर नकद. जनता को कार्ड पेमेंट की सुविधा का लाभ उठाना है तो उसे सरचार्ज देना होगा.

बैंक, तेल कंपनियां और पेट्रोल पंप मालिक धंधा कर रहे हैं. उनसे दान की उम्मीद करना बेमानी है. इस समस्या का यही सार्थक समाधान नजर आ रहा है. लेकिन नकदी की कमी दूर होने तक सरकार को कोई तात्कालिक समाधान तलाशना होगा.

इस सब पचड़े से एक बात तो साफ है. जनता को कैशलेस जिंदगी जीना है या नहीं. सरकार को यह फैसला जनता पर छोड़ देना चाहिए.

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