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क्या न्यायालय विमुद्रीकरण की मेरिट पर विचार कर सकता है?

संविधान के अनुसार विधायिका का काम कानून बनाना है और उसे कार्यपालिका लागू करती है.

Updated On: Nov 20, 2016 06:20 PM IST

सुरेश बाफना
वरिष्ठ पत्रकार

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क्या न्यायालय विमुद्रीकरण की मेरिट पर विचार कर सकता है?

500 व 1000 रुपए के नोट को गैर-कानूनी घोषित किए जाने पर देश में जारी लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गई है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि देश की विभिन्न अदालतों में विमुद्रीकरण के खिलाफ दायर विचाराधीन याचिकाअों पर रोक लगाई जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के अनुरोध को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि आम जनता की परेशानियां बढ़ती जा रही है और कोर्ट इस स्थिति से आंख मूंद नहीं सकती. सुप्रीम कोर्ट ने यह जरूर कहा कि केंद्र सरकार इन याचिकाअों को दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानान्तरित करने का आवेदन कर सकती है. सवाल उठता है कि क्या जनता की परेशानी का तर्क देकर न्यायालय सरकार के नीतिगत‍ निर्णयों की मेरिट पर विचार कर सकता है? भारतीय संविधान में न्यायपालिका, कार्यपालिका व विधायिका के अधिकार क्षेत्र की व्याख्या स्पष्ट तौर पर की गई है.

तीनों संस्थाओं की अलग जिम्मेदारियां 

पीटीआई पीटीआई

तीनों संस्थाअों से यह अपेक्षा की गई है कि वे एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करेंगी. न्यायपालिका को संविधान में कानून के पालन व उसकी व्याख्या करने का अधिकार दिया गया है. यदि विमुद्रीकरण पर अदालत को विचार करने का अधिकार दिया जाता है तो इसका अर्थ यही है कि वह सरकार के नीतिगत निर्णय की मेरिट पर विचार करेगी.

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि परेशान लोगों को याचिका के माध्यम से अपनी बात रखने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते हैं। इस टिप्पणी से सवाल उठता है कि क्या अदालतों को अपनी परेशानी की शिकायत दर्ज करने का स्थान बनाया जा सकता है?

वास्तविकता यह है कि देश में पिछले कुछ सालों से कानूनी प्रक्रियाअों का दुरुपयोग करने की प्रवृति बढ़ी है और अब इसका राजनीतिक दुरुपयोग भी शुरू हो गया है. जनता की परेशानी और जनहित की आड़ में कई याचिकाएं निजी स्वार्थी तत्वों द्वारा भी दायर की जाती है.

जनहित याचिकाओं को कोर्ट ने खारिज किया 

ऐसे मामलें कम नहीं है, जब अदालतों ने ही ऐसी याचिकाअों को दंड के साथ खारिज किया है. सुप्रीम कोर्ट में अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी और वकील व कांग्रेस के प्रवक्ता कपिल सिबल के बीच हुई नोंकझोंक इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक टकराव सर्वोच्च अदालत में भी पहुंच गया है.

सरकार के नीतिगत निर्णयों पर राजनीतिक विवादों का निपटारा अदालतों में संभव नहीं है. यदि सरकार के किसी निर्णय से जनता को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है तो कोई भी दल या संस्था उसके खिलाफ जनता के बीच आंदोलन कर सकती है. जनता की नाराजगी की वजह से सत्ताधारी दल को चुनाव में पराजय का सामना भी करना पड़ता है.

न्यायपालिका को राजनीतिक अखाड़ा बनाने की कोशिश को न्यायपालिका ही रोक सकती है. जनहित याचिकाअों ने न्यायपालिका के दायरे को बढ़ाया है, लेकिन इसके दुरुपयोग की घटनाअों से न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर आंच भी आई है.

संविधान के अनुसार विधायिका का काम कानून बनाना है और उस कानून को लागू करना कार्यपालिका का काम है. संविधान व कानून की व्याख्या के साथ यह तय करना न्यायपालिका का काम है कि कानून का पालन हुआ है या नहीं. संविधान के अनुसार विमुद्रीकरण करने का अधिकार कार्यपालिका के पास है और इस निर्णय के मेरिट पर न्यायालय में विचार नहीं हो सकता है.

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