S M L

कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश ने फ़र्स्टपोस्ट को सुनाई राज्य में समाजवाद के पतन की दास्तान

वापसी के सफर में नीतीश कुमार ने लोहिया को याद करते हुए कहा कि आजादी के दो दशक बाद लोहिया ने देश की राजनीति में 1967 में उस वक्त बड़ा बदलाव ला दिया था

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: May 08, 2018 08:16 AM IST

0
कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश ने फ़र्स्टपोस्ट को सुनाई राज्य में समाजवाद के पतन की दास्तान

ये बात उस वक्त की है जब रामकृष्ण हेगड़े कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे. जाति से ब्राह्मण रामकृष्ण हेगड़े को एक ताकतवर नेता माना जाता था. हेगड़े अपनी नैतिकता और शुचिता, शानदार प्रशासनिक क्षमता, राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की सोच से नजदीकी रखने वाली सियासी विचारधारा के लिए जाने जाते थे.

भ्रष्टाचार के दलदल में धंसने से काफी पहले कर्नाटक की राजनीति में एस निजलिंगप्पा जैसे नेता भी हुए, जिन्होंने कांग्रेस से नाता तोड़ कर खुद को नई तरह की उस राजनीति से जोड़ा, जो सबको बराबरी की बात करती थी और एक परिवार के वर्चस्व के खिलाफ थी. निजलिंगप्पा ने हेगड़े और उन जैसे कई नेताओं को संरक्षण दिया. 1960 के दशक से 1990 के दशक तक कर्नाटक की राजनीति मे समाजवादी सियासत का वर्चस्व रहा था. इसके बाद सियासी भ्रष्टाचार ने राज्य में बीजेपी को जड़ें जमाने का मौका दे दिया.

अगर हम आज के कर्नाटक के सियासी माहौल को देखें और ये याद करें कि रामकृष्ण हेगड़े ने दो बार नैतिक आधार पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, तो ऐसा लगेगा कि हम न जाने किस इतिहास की बात कर रहे हैं. और आज तो ये बात इसलिए भी अनोखी लगती है कि आज कर्नाटक में देश का सबसे महंगा चुनाव लड़ा जा रहा है. पैसा कर्नाटक के चुनाव में इस तरह बहाया जा रहा है, मानो किसी ताकतवर नदी की कभी न खत्म होने वाली धारा. ये कावेरी नदी की तरह नहीं है, जो पानी की कमी से सूख गई है. राज्य का दौरा करें तो अक्सर आपका सामना नकदी से खाली एटीएम से होता है. लेकिन इस चुनाव में नकद का ही बोलबाला है.

RAMA KRISHNA HEGDE

रामकृष्ण हेगड़े ( तस्वीर यूट्यूब से साभार )

मिसाल के तौर पर एक राष्ट्रीय पार्टी के उस उम्मीदवार के बयान को ही लीजिए, जिसने बड़े गुरूर से कहा कि उसने चुनाव के खर्च के लिए ही पचास करोड़ रुपए अलग रख दिए हैं. ये रकम चुनाव आयोग की चुनाव खर्च की तय की हुई सीमा से कई गुना ज्यादा है. अगर इस रकम का बंटवारा करें, तो उस नेता की सीट के हर मतदाता के हिस्से पांच हजार रुपए आएंगे. चुनाव में पैसे बहाने की बात करें, तो, इस नेता के मुकाबले खड़े उम्मीदवार भी कम नहीं. कई ऐसी सीटें हैं जहां उम्मीदवार पानी की तरह चुनाव में पैसे बहा रहे हैं, लेकिन ऐसा करते हुए भी वो चुनाव आयोग की नजरों से बचे हुए हैं.

कर्नाटक के ऐसे चुनावी माहौल में जब आप समाजवाद और इस विचारधारा के समर्थकों की बात करते हैं, तो ये न सिर्फ अप्रासंगिक बल्कि हास्यास्पद भी लगता है. यही वजह है कि जब रविवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, कर्नाटक में अपनी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के 8 उम्मीदवारों के लिए प्रचार करने आए, तो वो मौजूदा सियासी माहौल में एकदम बाहरी लग रहे थे.

बेंगलुरु हवाई अड्डे से अपनी रैली के रास्ते के सफर में नीतीश कुमार पुराने दिनों को याद करते हुए कहने लगे, 'ये राज्य कभी निजलिंगप्पा, हेगड़े, वीरेंद्र पाटिल से लेकर एस आर बोम्मई और एच.डी देवेगौड़ा जैसे समाजवादी नेताओं का गढ़ हुआ करता था. और इन सब में सबसे अलग समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस की तो बात ही अलग थी'.

आखिर समाजवादी नेताओं ने अपनी सियासी जमीन बीजेपी के लिए क्यों छोड़ दी? मैंने नीतीश कुमार से ये सवाल पूछते हुए समाजवाद जैसी ताकतवर विचारधारा के तीन दशकों के भीतर ही पतन की वजह पर उनकी राय जानने की कोशिश की. नीतीश कुमार ने पहाड़ी इलाके पर निराशा भरी नजर डालते हुए कहा, 'आप देखिए ये दिक्कत इसलिए हुई कि बड़े समाजवादी नेता एकजुट नहीं हो सके, न एक पार्टी के रूप में और न ही नेताओं के तौर पर. भले ही सभी शानदार नेता थे, मगर वो सभी निजी अहं के शिकार और व्यक्तिवादी थे'. जिस इलाके से हम गुजर रहे थे, वो आज बीजेपी का गढ़ माना जाता है. इस इलाके में बड़ी आबादी लिंगायतों की है.

टुमकुर में सबसे प्रतिष्ठित लिंगायत मठ में मत्था टिकाने और 111 साल के लिंगायत संत शिवकुमारा स्वामी से आशीर्वाद लेने की औपचारिकता पूरी करने के बाद, नीतीश कुमार ने कहा, 'कुछ समाजवादी नेताओं ने अपने पिट्ठुओं और परिवार के लोगों को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक जीवन में मजहब की अहमियत को कम करने की कोशिश की. ये बात समाजवादी विचारधारा के बुनियादी सिद्धांत के ही खिलाफ है'. कुमार ने कहा, 'लोहिया का ये मजबूत विचार था कि हर धर्म और जाति के लोगों की भावनाओं का खयाल रखा जाना चाहिए उन्होंने राम, कृष्ण और शिव पर एक खूबसूरत निबंध लिखा था और इसके जरिए आज के दौर में उनकी अहमियत पर जोर दिया था'.

नीतीश कुमार बेंगलुरु से करीब 300 किलोमीटर का सफर तय करके दावणगेरे जिले में अपनी पार्टी की उम्मीदवार महिमा पटेल के लिए प्रचार करने पहुंचे. महिमा पटेल कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री जे.एच पटेल के बेटे हैं. उन्होंने अपनी पार्टी के दूसरे सात उम्मीदवारों को पास की सीट चेन्नागेरे में बुलाया और मतदाताओं से जोरदार अपील की कि वो कर्नाटक की सियासत में ताजी हवा के झोंके के लिए वोट करें, क्योंकि अभी तो कर्नाटक की राजनीति जातिवाद, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार के जख्मों से बुरी तरह घायल है. मंच पर जब एक वक्ता ने नीतीश कुमार के बीजेपी से गठबंधन पर सवाल उठाया, तो उन्होंने बड़ी चतुराई से इस मुश्किल सवाल का जवाब दिया. नीतीश कुमार ने कहा कि उन्होंने भ्रष्टाचार, अपराध और सांप्रदायिकता से कभी भी समझौता नहीं किया, भले ही गठबंधन किसी भी दल से रहा हो.

नीतीश कुमार एक चतुर राजनेता है. उन्हें पता है कि कर्नाटक के सियासी माहौल में इस वक्त जाति और धर्म का शोर है और पैसा पानी की तरह बह रहा है. ऐसे माहौल में उनकी अपील का असर बहुत ज्यादा नहीं होगा.

ram manohar lohia

डॉ. राम मनोहर लोहिया

वापसी के सफर में नीतीश कुमार ने लोहिया को याद करते हुए कहा कि आजादी के दो दशक बाद लोहिया ने देश की राजनीति में 1967 में उस वक्त बड़ा बदलाव ला दिया था, जब उन्होंने कई राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में मदद की थी. ऐसे राजनीतिक माहौल में जहां काले धन की बहार है, साजिशों की बयार है, वहां पर ऐसी यादें ही हवा के ताजे झोंके का एहसास कराती हैं.

(यह लेख अंग्रेजी से अनुवादित है. मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
कोई तो जूनून चाहिए जिंदगी के वास्ते

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi