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कैंब्रिज एनालिटिका मामलाः कांग्रेस-बीजेपी की तूतू-मैंमैं में गुम हो गए बड़े सवाल

अगर डेटा सुरक्षित नहीं है, तो यूजर का इस पर नियंत्रण खत्म हो जाता है. ऐसा होने की स्थिति में लोकतंत्र के खत्म होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा

Updated On: Mar 23, 2018 01:03 PM IST

Sreemoy Talukdar

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कैंब्रिज एनालिटिका मामलाः कांग्रेस-बीजेपी की तूतू-मैंमैं में गुम हो गए बड़े सवाल

अगर डेटा नया तेल है, तो दुनियाभर की राजनीतिक पार्टियां इस पर फिसल रही हैं. इनमें भारत की दो सबसे बड़ी 'राष्ट्रीय पार्टियां' भी शामिल हैं. कैंब्रिज एनालिटिका घोटाले के बाद बीजेपी और कांग्रेस में से कोई भी इस मामले में दूध की धुली नहीं नजर आ रही है. दोनों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए खुद के इस तरह के मामले में शामिल होने से इनकार किया है. दोनों का नजरिया अपरिपक्व और चिंताजनक है. आरोप-प्रत्यारोप के बजाय दोनों को आरोपों से घिरी इस डेटा एनालिटिक्स फर्म से अपने रिश्तों को लेकर चीजें साफ करनी चाहिए.

भारत के लिए ज्यादा खतरनाक हैं इस तरह की घटनाएं

राजनीतिक पार्टियां सार्वजनिक स्तर पर राय बनाने के बिजनेस में हैं. जाहिर है कि वे बड़े पैमाने पर डेटा को अपने मकसद के लिए उपयोगी पाएंगे, जिससे सार्वजनिक राय बनाई जा सकती है. राजनीतिक संदेश पहुंचाने और वोटरों को प्रभावित करने के लिए ऐसी कंपनियों (डेटा एनालिटिकल टूल का इस्तेमाल करने वाली) की सेवाओं का इस्तेमाल करना अपराध नहीं है. हालांकि, समस्या तब शुरू होती है, जब डेटा अनैतिक और अवैध तरीके से हासिल किए जाते हैं. अगर इस तरह की गतिविधियों पर लगाम नहीं लगाई जाती है, तो यह आखिरकार लोकतंत्र के ढांचे के लिए खतरनाक हो सकता है. भारत में यह खतरा और प्रासंगिक एवं तात्कालिक है, जहां निजती से जुड़े कानून और बिग डेटा से सुरक्षित तरीके से निपटने को लेकर नहीं काम शैशव अवस्था में है.

सहमति को लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है. यह विकल्पों पर आधारित होती है. लोकतंत्र का सिद्धांत इस धारणा पर चलता है कि वोटर विकल्प चुनते वक्त खुद से फैसला कर अपना भविष्य तैयार करेंगे. अब अगर राजनीतिक पार्टियां वोटरों से चालबाजी कर उनकी सहमति लेने का फॉर्मूला ढूंढ सकती हैं, तो समझा जा सकता है कि यह उनके लिए कितना सुविधाजनक होगा?

कैंब्रिज एनालिटिका जैसी फर्में फेसबुक जैसे बड़े कमर्शियल डेटा प्लेटफॉर्म से फर्जीवाड़ा कर/खरीद कर/सूचना हासिल कर बड़े पैमाने पर डेटा इकट्ठा करने का दावा करती हैं. इसके बाद इस सूचना की गुत्थी सुलझाने के लिए एनालिटिकल टूल का इस्तेमाल कर अपने क्लाइंट्स (राजनीतिक पार्टियां, कॉरपोरेट आदि) को लक्ष्य (वोटर आदि) हासिल करने की दिशा में सलाह देती हैं. इस तरह से क्लाइंट खास मैसेज के जरिए अपने हिसाब से लोगों को प्रभावित करने के लिए काम कर सकते हैं.

कितने असरदार तरीके से हो सकता है ये काम?

अब सवाल यह नहीं है कि क्या यह किया जा सकता है? सवाल यह है कि इसे कितने असरदार तरीके से किया जा सकता है? यहां पर सावधानी बरतने की जरूरत है. संदेह जताने वाले ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो इस आइडिया के आधार पर ही सवाल खड़े करते हैं कि बिग डेटा द्वारा मुहैया कराए सूचना का इस्तेमाल वोटरों के रुख या राजनीतिक रुझान बदलने के लिए किया जा सकता है. साइबर सुरक्षा मामलों के जानकार और लेखक अरनब रे का कहना है कि इस तरह के डर को काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है.

हालांकि, स्मार्ट एलगोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस दौर में बिग डेटा को असरदार औजार बनाने की क्षमता को विज्ञान गल्पकथाओं का मामला तो बिल्कुल नहीं माना जा सकता. कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तरह का चलन पहले ही शुरू हो चुका है.

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येल यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर और 'हैकिंग द इलेक्टोरेटः हाउ कैंपेन परसीव वोटर्स' के लेखक आयटन हेर्श के हवाले से Vox ने लिखा है, 'अब अमेरिकी समुदाय या किसी खास वर्ग की सोच के बजाय निजी लोगों की प्रवृत्तियों या यहां तक कि पड़ोस के स्तर पर लक्षणों को ध्यान में रखते हुए प्रचार अभियान चलाए जा सकते हैं. बिग डेटा ने उम्मीदवारों के लिए अपने प्रतिद्वंद्वियों को खारिज करना आसान बना दिया है. उन्हें अब ठीक-ठीक यह पता है कि लोगों ने किस तरह से वोट दिया और भविष्य में वे किस तरह से वोट करने जा रहे हैं और उनके प्रचार अभियान में यह नजर आता है.'

भारत में ऐसा होने के काफी आसार हैं

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूसी दखलंदाजी का मामला और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिये अन्य जगहों पर इस तरह की घटनाएं इस बात की भी संभावना पैदा करती हैं कि भारत से बैर-भाव रखने वाली ताकतें डिजिटल माध्यम का गलत इस्तेमाल कर इसी तरह से दखलंदाजी कर सकती हैं. पिछले आंकड़ों के मुताबिक, भारत में फेसबुक यूजर्स की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है. 13 जुलाई 2017 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में फेसबुक के 24.1 करोड़ एक्टिव यूजर्स हैं, जबकि अमेरिका में इनकी तादाद 24 करोड़ है. किसी विदेशी मुल्क (मिसाल के तौर पर पाकिस्तान) के लिए डेटा के इस खान का इस्तेमाल कर भारत में चुनावों पर निशाना साधना मुश्किल नहीं होगा.

इस तरह की गतिविधियों के मद्देनजर फेसबुक अमेरिका में अब कठघरे में है. फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग को जल्द अमेरिकी कांग्रेस की समिति तलब कर सकती है. जकरबर्ग ने बुधवार को सीएनएन को दिए इंटरव्यू में माना कि 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में फेसबुक रूसी खतरे से निपटने में नाकाम रहा. साथ ही, उन्होंने वादा किया कि भारत समेत कहीं भी दोबारा ऐसी घटना नहीं होगी.

Mark Zuckerberg

उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि 2016 में हम कई मुद्दों पर उतने सजग नहीं थे, जितना हमें रहना चाहिए था. चाहे वह रूसी दखल का मामला हो या फर्जी खबर का...और यह हमारी जिम्मेदारी बनती है, न सिर्फ 2018 में अमेरिका में मिडटर्म के दौरान बल्कि अन्य जगहों पर भी. हमारा इन मामलों पर फोकस रहेगा. इस साल भारत में बड़ा चुनाव है, ब्राजील में बड़ा चुनाव है और दुनियाभर में कई बड़े चुनाव हैं. आप पक्के तौर पर इस बात को मान सकते हैं कि फेसबुक पर चुनावों की निष्पक्षता को सुरक्षित बनाए रखने के लिए हम वह सब कुछ करने को प्रतिबद्ध हैं.'

इस तरह घटनाक्रमों की तुलना में भारतीय राजनीतिक पार्टियों का इस मुद्दे पर रुख बेहद निराश करने वाला है. बीजेपी ने मंगलवार को कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी (कांग्रेस) ने सोशल मीडिया पर राहुल गांधी की छवि चमकाने के लिए कैंब्रिज एनालिटिका की सेवाएं लीं, लेकिन इसे गुप्त रखा. हालांकि, इस बारे में जब कांग्रेस ने बीजेपी पर पलटवार करते हुए आरोप लगाए, तो वह इसे मानने को तैयार नहीं है.

बीजेपी और जेडी(यू) भी रह चुकी हैं कंपनी की क्लाइंट!

भारत में कैंब्रिज एनालिटिका का कामकाज देखने वाली इकाई ओवलेनो बिजनेस इंटेलिजेंस (ओबीआई) की वेबसाइट की स्क्रीनशॉट के आधार मीडिया में आई खबरों के मुताबिक, 'इसके क्लाइंट्स की सूची में बीजेपी, कांग्रेस और जेडी(यू) के अलावा आईसीआईसीआई बैंक और एयरटेल भी शामिल हैं.'

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इस खबर की पुष्टि ओबीआई के डायरेक्टर हिमांशु शर्मा के लिंक्डइन प्रोफाइल पेज से भी होती है, जिसमें शर्मा की उपलब्धियों में सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के चुनाव कैंपेन के सफल प्रबंधन और उसे 272 का मैजिक नंबर दिलाने में अहम भूमिका जैसी चीजें शामिल थीं. हालांकि, अब शर्मा के लिंक्डइन प्रोफाइल से बीजेपी वाली जानकारी हटा दी गई है.

निश्चित तौर पर बीजेपी को कई सवालों के जवाब देने हैं, लेकिन कांग्रेस का भी आचरण बेहतर नहीं रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस संबंध में बीजेपी के आरोपों को फेक न्यूज कहते हुए खारिज कर दिया. उन्होंने दावा किया कि सरकार इराक में 39 भारतीयों की हत्या से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है.

दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी द्वारा कैंब्रिज एनालिटिका से संबंध के मामले में कांग्रेस पर हमले से काफी पहले कई मीडिया संस्थानों ने यह खबर छापी थी कि पार्टी किसी डेटा एनालिटिक्स फर्म से संपर्क में है.

'द इकनॉमिक टाइम्स' ने 9 अक्टूबर 2017 को खबर दी थी कि 'कांग्रेस बिग डेटा फर्म कैंब्रिज एनालिटिका से संपर्क में है, जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को पिछले साल चुनाव जिताने में मदद की थी.' इस खबर में आगे कहा गया था, 'मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अगले लोकसभा चुनावों में यूपीए की चुनावी रणनीति तैयार करने के सिलसिले में कैंब्रिज एनालिटिका के सीईओ एलिग्जेंडर निक्स ने विपक्ष के कुछ नेताओं से मुलाकात की है. कंपनी ने कांग्रेस के सामने प्रेजेंटेशन दिया है, जिसमें ऑनलाइन माध्यम से वोटरों को प्रभावित करने के लिए विस्तार से रणनीति के बारे में बताया गया.'

इस खबर के अपडेट के तहत 22 मार्च 2018 को 'द इकनॉमिक टाइम्स' ने इस खबर का स्रोत एक लेख को बताया है, जो पिछले साल जुलाई में नवभारत टाइम्स में छपा था.

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'संडे गार्डियन' के अभिनंदन मिश्रा ने 12 नवंबर 2017 को खबर दी कि ' कैंब्रिज एनालिटिका की सेवाओं के इस्तेमाल करने को लेकर कांग्रेस पार्टी उपाध्यक्ष (उस वक्त) राहुल गांधी की अगुवाई में पार्टी की इस 'डेटा माइनिंग और एनालिसिस' फर्म के साथ बातचीत निर्णायक दौर में है. लंदन की यह फर्म राजनीतिक पार्टियों और निजी लोगों को चुनाव जिताने के लिए कम्युनिकेशन और अन्य सेवाएं मुहैया कराती है.'

इस रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से यह भी बताया गया था, 'अगर इसको लेकर सहमति बन जाती है, तो कांग्रेस मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव के दौरान इस कंपनी की विशेषज्ञता का इस्तेमाल करेगी. इन राज्यों में चुनाव होने में एक साल से भी कम समय बचा है. हालांकि, कैंब्रिज एनालिटिका की विशेषज्ञता का मुख्य फोकस पार्टी के लिए 2019 के आम चुनावों में होगा.'

मनीकंट्रोल ने 19 मार्च 2018 को खबर दी कि 'बिग डेटा फर्म कैंब्रिज एनालिटिका 2019 के आम चुनावों के लिए भारतीय विपक्षी पार्टी से बात कर रही है.' इस खबर में किसी राजनीतिक पार्टी का नाम नहीं था, लेकिन एक बड़ी विपक्षी पार्टी की बात कही गई थी. खबर के मुताबिक, पिछले साल अगस्त में दिए प्रेजेंटेशन में कैंब्रिज एनालिटिका ऑनलाइन यूजर्स के व्यवहार का विश्लेषण कर सोशल मीडिया पर वोटरों को प्रभावित करने के लिए डेटा आधारित रणनीति बनाने और लोगों से जुड़े अलग-अलग डेटा बेस के गैप को भरने की बात कही थी.

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यहां यह समझना दिलचस्प होगा कि राहुल गांधी ने जहां बीजेपी के आरोपों को 'फेक न्यूज' के तौर पर खारिज कर दिया, वहीं कांग्रेस ने मीडिया के बड़े और विश्वसनीय संस्थानों में छपी इन खबरों पर कभी आपत्ति नहीं जताई. ऐसी कई खबरों में यह भी बताया गया था कि कैंब्रिज एनालिटिका और कांग्रेस के बीच पिछले एक साल से बातचीत चल रही है.

दिव्या स्पंदन ने पहले साध ली थी चुप्पी

कांग्रेस की सोशल मीडिया और डिजिटल कम्युनिकेशन हेड दिव्या स्पंदन ने कहा है कि 'कांग्रेस के कैंब्रिज एनालिटिका के साथ जुड़ने या फिलहाल जुड़ाव की बात पूरी से झूठ है.' यानी उन्होंने जोरदार तरीके से इसका खंडन किया.

हालांकि, पिछले साल अक्टूबर 2017 में न्यूज18 को दिए इंटरव्यू में चुनाव प्रचार अभियानों में बिग डेटा एनालिटिक्स की इस्तेमाल के सवाल पर कांग्रेस की सोशल मीडिया हेड ने 'चुप्पी' साध ली थी.

उस इंटरव्यू के मुताबिक, 'बिग डेटा एनालिटिक्स के बारे में पूछे जाने पर कांग्रेस के सोशल मीडिया हेड ने चुप्पी साध ली. खबरें आ रही हैं कि कांग्रेस डेटा माइनिंग और एनालिटिक्स फर्म कैंब्रिज एनालिटिका के साथ डील कर रही है. यह कंपनी पिछले साल राष्ट्रपति पद के लिए ट्रंप के चुनावी अभियान से करीबी तौर पर जुड़ी थी.'

सवाल यह है कि दिव्या ने उस वक्त कांग्रेस और कैंब्रिज एनालिटिका के रिश्तों के बारे में जोरदार तरीके से खंडन क्यों नहीं किया. यहां इस बात भी उल्लेख किया जाना जरूरी है कि कांग्रेस के बागी नेता शहजाद पूनावाला ने बुधवार को एएनआई से बातचीत में कहा कि कैंब्रिज एनालिटिका से अपने रिश्तों को लेकर कांग्रेस पार्टी झूठ बोल रही है. उन्होंने अपने दावों के पक्ष में तीन ट्वीट किए.

आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी रहने के बीच यह साफ है कि इस मामले में बड़े राजनीतिक नूराकुश्ती के बीच बड़ा सवाल दब गया है. अगर डेटा सुरक्षित नहीं है, तो यूजर का इस पर नियंत्रण खत्म हो जाता है. ऐसा होने की स्थिति में लोकतंत्र के खत्म होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा.

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