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उपचुनाव नतीजे: क्षत्रपों की ताकत को फिर साबित किया बंगाल ने

ऐसा लग रहा है कि तृणमूल कांग्रेस अपने उदार दृष्टिकोण की वजह से आने वाले कुछ सालों तक बंगाल पर अपना कब्जा बनाए रखेगी

Suhit K. Sen Updated On: Jun 01, 2018 09:40 PM IST

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उपचुनाव नतीजे: क्षत्रपों की ताकत को फिर साबित किया बंगाल ने

हाल ही में पश्चिम बंगाल में संपन्न हुए पंचायत चुनावों में अपना परचम लहराने के बाद तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है. गुरुवार को उपचुनावों के परिणाम ने तृणमूल और ममता बनर्जी को एक बार फिर से मुस्कराने का मौका दे दिया है. तृणमूल ने पश्चिम बंगाल के महेशतला विधानसभा उपचुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की है. पार्टी ने ये जीत 60 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से जीती है. विधानसभा उपचुनाव में इतने बंपर वोटों से जीत से वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी कैडरों का हौसला बुलंद हो गया है.

लेकिन ममता की इस शानदार जीत के प्रभावों के बारे में जुलाई में पता चलेगा. दरअसल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के पंचायत चुनावों में उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने के मामले पर फैसला सुनाने की उम्मीद है. बिना मुकाबले वाले जीती गयी सीटों की संख्या कुल सीटों की लगभग एक तिहाई है और उनमें से अधिकतर पर टीएमसी के उम्मीदवारों ने कब्जा जमाया हुआ है. ऐसे में उपचुनाव में शानदार प्रदर्शन के बाद भी ममता की निगाहें जुलाई में सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई होंगी.

पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार तृणमूल ने महेशतला विधानसभा सीट लगभग 50 हजार से ज्यादा वोटों से जीती है. पिछली बार जीत का अंतर लगभग दस हजार था जबकि इस बार 60 हजार से ज्यादा है. इस बड़े अंतर से जीत की मुख्य वजह ये है कि अब राज्य में विपक्ष पूरी तरह से कमजोर हो चुका है. विपक्ष की इस कमजोरी का मुख्य कारण है वोटों का बंटवारा. कभी मुख्य विपक्षी दल रहा लेफ्ट अब बुरी तरह कमजोर हो चुका है. इस बार महेशतला विधानसभा के उपचुनावों में लेफ्ट तीसरे नबंर पर खिसक गया. दूसरा स्थान प्राप्त किया भारतीय जनता पार्टी ने. बीजेपी को इस चुनाव में 42 हजार से ज्यादा वोट मिले जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को लगभग 30 हजार वोट मिले और वो तीसरे स्थान पर रही.

mamta in delhi

महेशतला विधानसभा उपचुनाव का परिणाम ऐसे समय में आया है जब अगले लोकसभा चुनावों में लगभग एक साल का ही समय रह गया है, ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि उस समय बंगाल की राजनीतिक तस्वीर कैसी रहेगी? ये सवाल आज के समय में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में अभी राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही है और आने वाले समय में इसके निर्णायक स्थिति में पहुंचने की संभावना है. पश्चिम बंगाल में कुल 42 लोकसभा सीटें हैं और इन सभी सीटों पर कब्जा जमाने की कोशिश तृणमूल कांग्रेस करेगी. लेफ्ट फ्रंट का राज्य से लगभग सफाया हो गया है लेकिन अभी भी ममता विरोधी मतों में एक बड़ा हिस्सा लेफ्ट को जाएगा. विरोधी मतों का बंटवारा होने से निश्चित रूप से ममता को फायदा होगा.

बीजेपी ने राज्य में अपनी शक्ति निश्चित रुप से बढ़ा ली है और लेफ्ट की जगह पर अब वो खुद मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में पहुंच गयी है लेकिन इसके बावजूद अभी राज्य में बीजेपी उस स्थिति में नहीं पहुंच सकी है जिससे कि वो ममता बनर्जी की पार्टी को पटखनी दे सके. बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय को लगता है कि बंगाल में पार्टी शानदार प्रदर्शन करेगी लेकिन ममता कि राज्य में पकड़ को देखते हुए लगता नहीं है कि उनका दावा सही हो सकेगा.

ममता के बंगाल को अपने अभेद्य किले के रूप में तब्दील कर लेने का असर राष्ट्रीय परिदृश्य पर भी पड़ने जा रहा है. दरअसल अगले लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय क्षत्रपों का बहुत जोर चलेगा. केवल बंगाल ही नहीं बल्कि उड़ीसा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, और तेलंगाना में भी क्षेत्रीय दल काफी मजबूत स्थिति में हैं. इन पांच राज्यों में 144 लोकसभा की सीटें हैं. अगर इन राज्यों के क्षत्रप अपना किला बचाने में कामयाब हो जाते हैं तो राष्ट्रीय पार्टियों को यहां से निराशा ही हाथ लगेगी.

बीजेपी और कुछ हद तक कांग्रेस भी देश की दो मजबूत राष्ट्रीय पार्टियां हैं. ऐसे में उन दोनों के लिए इन राज्यों की 144 सीटों का महत्व काफी होगा लेकिन चूंकि इन सभी राज्यों में क्षेत्रीय दल मजबूत स्थिति में हैं ऐसे में दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की ख्वाहिश होगी कि वो उनके साथ गठबंधन कर लें. बीजेपी को ही लीजिए, बंगाल में पार्टी का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ रहा है लेकिन उस तेजी को वो सीटें जीतने वाली स्थिति में अब तक नहीं मोड़ सके हैं. दूसरी तरफ से राज्य में कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया है. यहां तक उन दो जिलों से भी कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया है जहां कुछ वर्षों पहले तक मजबूत संगठन की बदौलत उसका दबदबा हुआ करता था.

इसका मतलब ये हुआ कि अगर 2019 में बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो दोनों राष्ट्रीय दल दिल्ली में गठबंधन से सरकार बनाने की कोशिश करेंगे. ऐसे में दोनों बड़ी पार्टियां क्षेत्रीय दलों के साथ समझौता करने को बाध्य होंगे.

बंगाल में लगभग 40 सीटों पर अपनी मजबूत पकड़ रखने वाली ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस किसी भी बड़े दल के लिए महत्वपूर्ण सहयोगी साबित हो सकती हैं. लेकिन बीजेपी और टीएमसी की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह अनुमान लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि दोनों दल किसी भी सूरत में एक दूसरे से अपना हाथ नहीं मिलाएंगे. हां इस बात की पूरी संभावना है कि तृणमूल कांग्रेस का हाथ थाम सकती है क्योंकि दोनों पार्टियों के बीच फिलहाल संबंध अच्छे हैं.

लेकिन कांग्रेस के लिए तृणमूल का साथ पाना इतना आसान होगा नहीं. पार्टी को सबसे पहले गठबंधन के लिए अपने मुख्य सहयोगी की भूमिका को त्यागना पड़ेगा. बंगाल में ममता के साथ साथ अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी इस संबंध में पहले ही अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है. विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में उन चार सीटों का मोह कांग्रेस को त्यागना पड़ेगा जो कि उसने 2014 के आम चुनावों में जीती थीं. अगर जानकारों की मानें तो इस बात की पूरी संभावना है कि मालदा और मुर्शिदाबाद में कांग्रेस के अधिकतर नेता तृणमूल कैंप में शामिल हो जाएंगे.

माना जाता है कि अगर बंगाल की राजनीति में किसी तरह का बदलाव होता है तो इसके लिए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का इसमें अहम रोल होता है लेकिन अभी कि परिस्थितियों के मुताबिक और निकट भविष्य में भी ऐसा लगता नहीं कि सीपीआई-एम वहां किसी तरह की चुनौती पेश करने की स्थिति में है. सीपीआई-एम के नेता और कैडर, जमीनी स्तर पर पार्टी का साथ छोड़ते जा रहे हैं और तृणमूल और बीजेपी की तरफ रुख कर रहे हैं. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने कैडर और स्थानीय नेताओं को एकजुट करने में विफल रहा है.

Mamta

ममता बनर्जी

इसका मतलब स्पष्ट है कि बंगाल में मुख्य रूप से दो राजनीतिक दल ही मुकाबले में रहेंगे,बीजेपी और तृणमूल. ऐतिहासिक रुप से ये प्रमाणित है कि बहुसंख्यकों को एकीकृत करने की राजनीतिक योजना कभी सफल नहीं रही है और यही वजह है जिसने बंगाल में बीजेपी के आगे बढ़ने की राह में कांटे बिछा दिए हैं.

दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस अपने उदार दृष्टिकोण की वजह से आने वाले कुछ सालों तक बंगाल पर अपना कब्जा बनाए रखेगी. उपचुनाव के परिणाम भी ममता बनर्जी को फेडरल फ्रंट के निर्माण के प्रति उत्साहित करते रहेंगे हालांकि इस समय अभी तक कुछ भी तय नहीं है.

वैसे बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि इस साल के आखिर में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होनेवाले विधानसभा चुनावों में किसका पलड़ा भारी रहता है. जाहिर है जिसको भी इन चुनावों में बढ़त मिलेगी उनका दावा 2019 में दिल्ली की गद्दी पर बैठने का ज्यादा होगा. हां, इस पूरी कवायद में क्षेत्रीय दलों की भी अहम भूमिका रहेगी

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