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केजरीवाल के धरने को पॉलिटिकल ड्रामेबाजी कहने वाले क्या भूल कर रहे हैं

हालिया धरना उन्हें किस रूप में फायदा पहुंचाने वाला है, संभव है इसकी गणना उन्होंने कर ली होगी. क्योंकि ये पूरा धरना बेहद ऑर्गेनाइज तरीके से किया जा रहा है

Updated On: Jun 14, 2018 10:50 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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केजरीवाल के धरने को पॉलिटिकल ड्रामेबाजी कहने वाले क्या भूल कर रहे हैं

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने तीन सहयोगियों के साथ पिछले चार दिनों से उपराज्यपाल अनिल बैजल के दफ्तर में धरनारत हैं. फरवरी 2015 में प्रचंड बहुमत के साथ सीएम की गद्दी पर काबिज होने वाले केजरीवाल लंबे समय बाद अपने पुराने अवतार में लौटे हैं. सोशल साइट्स इस समय उनकी तस्वीरों से पटी पड़ी है और जमकर पब्लिसिटी मिल रही है.

विपक्षी पार्टियों से लेकर सोशल साइट्स पर भी एक बड़ा धड़ा है जो मानता है कि केजरीवाल का धरनारूपी अस्त्र अब पुराना पड़ा चुका है और इसकी धार भी कुंद हो चली है. राजनीति में कदम रखने के बाद ही अरविंद केजरीवाल ने अपने इस प्रमुख हथियार को कुछ सालों के लिए घर के किसी कोने में रख दिया था. काफी साल बाद एक बार फिर से अरविंद केजरीवाल धरना-प्रदर्शन को अपना मुख्य हथियार बनाकर वापस लौटे हैं.

अब इस धरने को सिरे खारिज करने वाले लोगों को यह भी सोचना होगा कि आखिर केजरीवाल ने धरने का अस्त्र फिर क्यों उठाया है? क्या दिल्ली में एलजी और राज्य सरकार के बीच जारी जंग इस स्थिति में पहुंच चुकी है कि अब केजरीवाल का काम करना पाना नामुमकिन हो रहा है? क्या एक सीएम को जो सामान्य अधिकार मिल सकते हैं, उससे भी उन्हें वंचित रखा जा रहा है? अगर विरोधियों का तर्क ये है कि केजरीवाल बिल्कुल काम नहीं करना चाहते तो उनकी कुछ ऐसी योजनाओं की चर्चा जरूरी है जो खूब सुर्खियां बटोर रही हैं.

From the outdoors to LG office, another unorthodox protest from Kejriwal

केजरीवाल सरकार ने बीते दो-तीन सालों में कई अहम फैसले लिए और उनको अमल में भी लाई. केजरीवाल ने कुछ ऐसे फैसले लिए जिनकी चर्चा देश में ही नहीं विदेशों में भी हुई. खासकर कॉलोनियों और झुग्गी-झोपड़ियों में मोहल्ला क्लीनिक खोलने का निर्णय की काफी तारीफ मिली. मोहल्ला क्लीनिक दिल्लीवालों के लिए काफी लाभदायक साबित हुआ.

अरविंद केजरीवाल की सरकार ने कुछ दूसरे भी अहम फैसले लिए. दिल्ली के लोगों ने पहली बार दिल्ली के अस्पतालों में मुफ्त दवा और मुफ्त चिकित्सा व्यवस्था की सुविधा केजरीवाल सरकार के राज में ही देखी. खासकर झुग्गी-झोपड़ी और दिल्ली के कॉलोनियों में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में इन योजनाओं के आने से काफी फर्क नजर आया. दिल्ली के सरकारी स्कूलों में भी सुधार के काफी काम किए गए. कुलमिलाकर दिल्ली की जनता को अरविंद केजरीवाल की सरकार में विश्वास पैदा हुआ. इसके अलावा एक निश्चित सीमा तक बिजली-पानी फ्री कर केजरीवाल ने अपने कोर वोटर्स के काम करने की कोशिश की है.

कुछ फैसलों ने उठवाई उंगलियां

ऐसा नहीं है कि उनके फैसलों की वजह से सिर्फ तारीफ मिली हो. केजरीवाल ने पिछले एक साल में ऐसे भी फैसले लिए जिसे लेकर पार्टी के भीतर भी भयंकर मतभेद उभर आए. ये लोग अरविंद केजरीवाल को मौकपरस्त और अपने वोटबैंक और मतलब की राजनीति करने वाला नेता करार देने लगे.

क्या इस धरने के पीछे और भी हैं कारण?

कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अरविंद केजरीवाल राजनीति में गिरती अपनी शाख को बचाने के लिए एक बार फिर से धरना को अपना मुख्य हथियार बना कर अपना जनाधार मजबूत कर रहे हैं. यह दिखाया जा रहा है कि जनता के लिए काम करने वाली सरकार को किस तरह से दुत्कार और फटकार मिलती है. इससे अरविंद केजरीवाल में सहानुभूति रखने वाले लोग उन्हें मसीहा समझेंगे और जो सहानुभूति नहीं भी रखते हैं उनके मिजाज में भी कुछ परिवर्तन आएगा.

गुरुवार को अरविंद केजरीवाल ने देश के पीएम को भी एक पत्र लिख कर दिल्ली की समस्याओं से अवगत कराया है. केजरीवाल ने पीएम से इस मामले में हस्तक्षेप करने और इसे सुलझाने का आग्रह किया है. वहीं दिल्ली के एलजी ने सीएम केजरीवाल और तीन मंत्रियों के धरना करने के निर्णय को को बेतुका करार दिया है. ऐसे में जानकारों का मानना है कि केजरीवाल की शिकायत दिल्ली के नौकरशाहों से है लेकिन शिकवा उपराज्यपाल से है और निशाना 2019 लोकसभा चुनाव है.

माफी मांगना भी रणनीति

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इसी साल जनवरी महीने में दिल्ली के प्रमुख सचिव अंशु प्रकाश से आप विधायकों के द्वारा कथित विवाद के बाद से अरविंद केजरीवाल ने मीडिया से दूरी बना ली. कुछ दिन पहले ही उन्होंने अचानक से अरुण जेटली, नीतिन गडकरी और अकाली दल के नेता विक्रम मजीठिया सहित कई लोगों से मानहानि मामले में माफी मांग कर फजीहत करा ली. केजरीवाल के इस फैसले पर पार्टी के ही कुछ विधायकों और सांसदों ने सवाल खड़े कर दिए. इसके बावजूद वे अपने फैसले पर अड़े रहे.

ऐसा लग रहा है कि अरविंद केजरीवाल ने एक सोची समझी रणनीति के तहत ही इन नेताओं से माफी मांगी थी. अरविंद केजरीवाल को लगने लगा था कि अगर इन चीजों में उलझे रहे तो फिर दिल्ली की राजनीति कैसे करेंगे?

धरने के जरिए कोर वोटरों को लुभा रहे केजरीवाल?

अरविंद केजरीवाल की खासियत कहें या उनकी कमजोरी कि उन्हें शिकायत कभी व्यक्ति से, कभी संस्था से, कभी व्यवस्था से तो कभी सत्ता से रही है. लेकिन ये भी याद रखना होगा कि उनके इस शिकायती स्वभाव ने उन्हें शिखर तक पहुंचाया है. एक अधिकारी से सीएम वो अपने बगावती तेवरों के जरिए ही बने हैं जिसमें प्रदर्शन का उनका मुख्य हथियार रहा है.

हालिया धरना उन्हें किस रूप में फायदा पहुंचाने वाला है, संभव है इसकी गणना उन्होंने कर ली होगी. क्योंकि ये पूरा धरना बेहद ऑर्गेनाइज तरीके से किया जा रहा है. आप इसे ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि विरोध हो समर्थन लोग इस पर रिएक्ट कर रहे हैं. और शायद यही रिएक्शन्स केजरीवाल चाहते थे. इस पूरे प्रदर्शन को चुनावी नजरिए से देखेंगे तो आपको इसमें एक नौसिखिया नहीं बल्कि एक मंझा हुआ राजनेता दिखाई देगा.

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