Co Sponsor
In association with
In association with
S M L

प्रवीण तोगड़िया को अब भी VHP चीफ बनाए रखना संघ के लचीलेपन को दिखाता है

संघ परिवार को मालूम है कि बागी तोगड़िया सुर्खियां भले बटोर लें, मगर वो विरोधियों के कुछ खास काम नहीं आने वाले. तोगड़िया, विपक्ष के लिए बोझ ही साबित होंगे

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Jan 18, 2018 09:24 AM IST

0
प्रवीण तोगड़िया को अब भी VHP चीफ बनाए रखना संघ के लचीलेपन को दिखाता है

विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया इन दिनों सुर्खियों में हैं. ऐसा लंबे अरसे के बाद हुआ है कि तोगड़िया खबरों में छाए हुए हैं. इस हफ्ते प्रवीण तोगड़िया अचानक पूरे दिन लापता रहे. जिस वक्त तोगड़िया गायब हुए, उस वक्त राजस्थान और गुजरात की पुलिस गिरफ्तारी का वारंट लेकर उनकी तलाश कर रही थी. बाद में तोगड़िया को बेहोशी की हालत में अस्पताल लाया गया था. बाद में एक प्रेस कांफ्रेंस में भावुक तोगड़िया ने दावा किया कि उनकी जान को खतरा है. उन्हें मारने की साजिश रची जा रही है.

आंसू बहाते तोगड़िया हमारे देश के लोकतंत्र के भविष्यवक्ताओं के लिए एक शानदार मंजर थे. ऐसे लोग इस बात से तसल्ली कर सकते हैं कि उन्होंने तो पहले ही कहा था कि देश का लोकतंत्र खतरे में है. तोगड़िया का आंसू भरा दावा इस बात का सबूत है. लेकिन आप को ऐसे भविष्यवक्ताओं की बातों पर यकीन करने से पहले पूरा सच जान लेना चाहिए.

भिड़ने की होड़ में अलग हो गए तोगड़िया

आज प्रवीण तोगड़िया जिस हालत में हैं, उनकी जो दिमागी हालत है, उनका नरेंद्र मोदी सरकार से जो झगड़ा है, वो कोई रातों-रात पैदा नहीं हुआ. पिछले एक दशक से प्रवीण तोगड़िया हिंदू हितों का मामला उठाकर अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर आडवाणी और नरेंद्र मोदी तक से भिड़ते रहे हैं. इस चक्कर में तोगड़िया, संघ परिवार की रणनीति की मुख्यधारा से कब सरककर किनारे लग गए, पता ही नहीं चला. बीजेपी में नरेंद्र मोदी के सबसे ताकतवर और नंबर वन नेता होने से पहले ही प्रवीण तोगड़िया हाशिए पर जा चुके थे.

तोगड़िया, लंबे वक्त से संघ परिवार में अलग-थलग पड़ चुके थे. एक दौर था जब वो हिंदुत्व ब्रिगेड के उभरते सितारे माने जाते थे. मगर वो दौर कब का बीत चुका. कैंसर के डॉक्टर रहे तोगड़िया कभी अपने भड़काऊ भाषणों के लिए खूब सुर्खियां बटोरते थे. उनके समर्थकों की भी अच्छी-खासी तादाद थी. 90 के दशक में तोगड़िया को विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल पर भी तरजीह मिला करती थी. हालांकि सिंघल को संघ परिवार में ज्यादा इज्जत मिलती थी. लेकिन भड़काऊ भाषणों की वजह से तोगड़िया रातों-रात नए स्टार के तौर पर उभरे थे. वहीं सिंघल, सबको साथ लेकर चलने की रणनीति वाले माने जाते थे.

ये भी पढ़ें: अपनों के बजाय कांग्रेस और हार्दिक पटेल का मुंह क्यों देख रहे हैं प्रवीण तोगड़िया?

पहले भी रहे हैं मतभेद, लेकिन ऐसे नहीं

तोगड़िया का नाम आज तक विश्व हिंदू परिषद के बड़े नेताओं में शुमार होता है. ये वीएचपी के एक संगठन के तौर पर लचीले रुख को ही दिखाता है. संघ परिवार में अक्सर तनातनी होती है, फिर भी परिवार बागियों की चुनौतियों से परिवार के भीतर ही निपट लेता है. संघ परिवार की ये बहुत बड़ी खासियत है. तोगड़िया का संघ परिवार के दूसरे लोगों से जो झगड़ा है, उसे समझने के लिए हमें इतिहास के कुछ पन्ने खंगालने होगे.

आरएसएस के भीतर दत्तोपंत ठेंगड़ी का नाम बहुत इज्जत से लिया जाता है. उन्होंने संघ की मजदूर यूनियन भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की थी. ठेंगड़ी ने अकेले ही अपनी कोशिश से भारतीय मजदूर संघ को एक ताकतवर ट्रेड यूनियन बनाया. उनकी कोशिशों का ही नतीजा था कि संघ परिवार की तरफ से मजदूर यूनियन में लेफ्ट के प्रभुत्व को चुनौती दी जा सकी. भारतीय मजदूर संघ आज सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (CITU), ऑल इडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) और इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC) की बराबरी का संगठन माना जाता है.

वाजपेयी सरकार के दौरान दत्तोपंत ठेंगड़ी की वाजपेयी और आडवाणी से बहुत तनातनी हुई थी. ठेंगड़ी और एनडीए सरकार के बीच रिश्ते इतने बिगड़ गए थे कि ठेंगड़ी ने वाजपेयी और आडवाणी से बात करनी तक बंद कर दी थी. तनातनी के बावजूद ठेंगड़ी, आडवाणी की पत्नी कमला के संपर्क में रहा करते थे. रिश्तों में कड़वाहट के बावजूद, पारिवारिक ताल्लुक उतने ही मजबूत बने रहे. इसी तरह वाजपेयी भी ठेंगड़ी का बहुत सम्मान करते थे, भले ही दत्तोपंत ठेंगड़ी खुलेआम वाजपेयी की मुखालफत किया करते थे.

ashok-singhal-reuters1

इसी तरह अशोक सिंघल और आडवाणी के बीच उस वक्त तनातनी बढ़ गई थी जब आडवाणी ने 2005 में बीजेपी अध्यक्ष का पद संभाला था. फिर भी आडवाणी हमेशा सिंघल का सम्मान करते रहे थे. इसकी बड़ी वजह ये थी कि ये सभी नेता संघ परिवार के मूल्यों में पले-बढ़े थे. वहां पर किसी से खुलेआम लड़ाई को अच्छा नहीं समझा जाता था. लोग अपनी नाराजगी को सरेआम नहीं उजागर किया करते थे. सिंघल कभी भी आडवाणी के खिलाफ खुले तौर पर नाराजगी नहीं जताते थे. यही वजह है कि अशोक सिंघल और दत्तोपंत ठेंगड़ी का आज भी संघ परिवार के नेता बहुत सम्मान से नाम लेते हैं.

गोविंदाचार्य, उमा भारती और कल्याण सिंह के रास्ते पर तोगड़िया

अब इनके बरक्स के एन गोविंदाचार्य, उमा भारती और कल्याण सिंह की मिसालें भी देखिए. ये सब भी संघ परिवार से आए थे, मगर इन सभी ने परिवार का अनुशासन तोड़ा. इसकी कीमत इन्हें हाशिए पर जाकर चुकानी पड़ी. गोविंदाचार्य, बीजेपी की कड़ी निंदा तो करते थे, मगर वो किसी और पार्टी से नहीं जुड़े. वहीं, कल्याण सिंह और उमा भारती ने तो दूसरी सियासी पार्टियों में भी किस्मत आजमाई. हालांकि, आखिरकार दोनों ही नेताओं को परिवार में वापस आना पड़ा. लेकिन, इस वजह से उनकी हैसियत संघ परिवार के भीतर काफी कम हो गई. जब इन नेताओं ने संघ परिवार से अलग होकर सियासी दांव खेले, तो वो कामयाब नहीं रहे. जब उन्हें एहसास हो गया कि उनकी कोशिशें बेकार हैं, तो वो परिवार में वापस चले आए. प्रवीण तोगड़िया भी इसी राह पर चलते आए हैं.

ये भी पढ़ें: वीएचपी के पोस्टर बॉय आखिर राजस्थान में बीजेपी के लिए 'नासूर' क्यों बन गए?

अशोक सिंघल की कोई सियासी महत्वाकांक्षा नहीं थी. लेकिन, तोगड़िया गुजरात की राजनीति में दखल देना चाहते थे. जब तोगड़िया ने देखा कि उनके सामने नरेंद्र मोदी जैसे मजबूत विरोधी हैं, तो उन्होंने राज्य भर में विश्व हिंदू परिषद के काडर को एकजुट करके मोदी का विरोध किया. 2002 से लेकर गुजरात के हर विधानसभा चुनाव में, तोगड़िया ने अपनी जाति का दांव खेलकर मोदी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की (प्रवीण तोगड़िया एक पटेल हैं). 2007 और 2012 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस को छुप-छुपाकर समर्थन दिया, जबकि संघ और विश्व हिंदू परिषद के नेताओ ने ऐसा न करने की सलाह दी थी. ऐसा लग रहा था कि प्रवीण तोगड़िया अपने मुट्ठी भर समर्थकों के साथ अकेले ही लड़ाई लड़ने पर आमादा थे.

विपक्ष के लिए भी बोझ ही बनेंगे तोगड़िया

तोगड़िया से जुड़े पूरे विवाद में एक बात काबिले-तारीफ है. बागी तेवरों के बावजूद संघ भगवा ब्रिगेड ने उन्हें विश्व हिंदू परिषद का प्रमुख बने रहने दिया है. आज तोगड़िया का कद काफी घट गया है, फिर भी आधिकारिक तौर पर तो वो वीएचपी के अध्यक्ष हैं ही. संघ परिवार, प्रवीण तोगड़िया के बागी तेवरों से नाखुश है, फिर भी उन्हें वीएचपी प्रमुख के तौर पर बर्दाश्त किया जा रहा है. इसकी वजह साफ है. संघ परिवार को मालूम है कि बागी तोगड़िया सुर्खियां भले बटोर लें, मगर वो विरोधियों के कुछ खास काम नहीं आने वाले. तोगड़िया, विपक्ष के लिए बोझ ही साबित होंगे.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
AUTO EXPO 2018: MARUTI SUZUKI की नई SWIFT का इंतजार हुआ खत्म

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi