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बीएमसी चुनाव: राहुल के नेतृत्व पर एक और सवालिया निशान

कांग्रेस को फिर से जीवित करना है तो गांधी-परिवार के बाहर नए नेतृत्व की तलाश करनी होगी

Updated On: Feb 24, 2017 08:04 AM IST

Suresh Bafna
वरिष्ठ पत्रकार

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बीएमसी चुनाव: राहुल के नेतृत्व पर एक और सवालिया निशान

उड़ीसा के बाद अब महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों में बीजेपी की जबर्दस्त जीत ने कांग्रेस के उपाध्यक्ष और जल्द ही अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने वाले राहुल गांधी के नेतृत्व पर एक और सवालिया निशान लगा दिया है. बृहन्मुंबई महानगरपालिका व अन्य शहरों के चुनाव नतीजों में कांग्रेस व एनसीपी कई शहरों में तीसरे और चौथे नंबर की पार्टियां बन गई हैं.

इन नतीजों से यह बात भी रेखांकित हुई है कि नोटबंदी का बीजेपी की चुनावी संभावनाअों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा है.

महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना के बीच गठबंधन टूटने के बाद आम तौर पर यह उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस पार्टी को इसका सीधा फायदा मिलेगा, लेकिन देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कांग्रेस की संख्या 52 से घटकर 31 रह गई. कांग्रेस का गढ़ माने-जानेवाला नागपुर भी पूरी तरह बीजेपी के कब्जे में चला गया. उधर पुणे में एनसीपी और कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा.

मुंबई में कांग्रेस को मजबूत करने की जिम्मेदारी राहुल गांधी ने संजय निरुपम के कंधों पर डाली थी. तब मुंबई के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष गुरुदास कामत ने पार्टी के इस निर्णय के खिलाफ बगावत की थी.

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संजय निरुपम (फोटो: पीटीआई)

मुंबई की कांग्रेस निरुपम, कामत, नारायण राणे और महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चव्हाण के चार गुटों में बुरी तरह विभाजित हो गई थी, जिसका असर चुनाव नतीजों पर पड़ा है. भारतीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी की एक बड़ी समस्या यह है कि कोई भी नेता पार्टी संगठन को मजबूत करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेता है.

राहुल गांधी ने हरियाणा में अशोक तंवर, मुंबई में संजय निरुपम, राजस्थान में सचिन पायलट, दिल्ली में अजय माकन, उत्तर प्रदेश में राज बब्बर और मध्य प्रदेश में अरुण यादव को पार्टी अध्यक्ष मनोनीत किया था, लेकिन अभी तक इनमें से कोई भी नेता कांग्रेस पार्टी की स्थिति बेहतर कर पाने में सफल नहीं हो पाया है.

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अरुण यादव के नेतृत्व में पार्टी कई बार पराजय का मुंह देख चुकी है, लेकिन उनके पद को कोई खतरा नहीं हुआ है. अशोक तंवर के नेतृत्व में हरियाणा में पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा है. राजस्थान में सचिन पायलट भी कुछ नहीं कर पाए हैं.

विचित्र बात यह है कि बिहार की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर बीजेपी विरोधी गठबंधन बना रहे है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के भीतर जारी गुटीय टकराव को रोक पाने में हर स्तर पर विफल हो रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के साथ गठबंधन करके प्रकारांतर से राहुल गांधी ने यह घोषित कर दिया है कि वे अब प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं रहे हैं. पश्चिम बंगाल, बिहार के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी राहुल छोटे सहायक की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं.

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बीएमसी चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद महाराष्ट्र कांग्रेस के दफ्तर के बाहर सन्नाटा छाया रहा (फोटो: पीटीआई)

महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों के चुनाव नतीजों का एक नतीजा यह भी दिखाई देता है कि 60 साल से अधिक राज करनेवाली कांग्रेस पार्टी चौथे नंबर की पार्टी बन गई है और एनसीपी तीसरे नंबर पर खिसक गई है.

तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव का अनुभव यह है कि कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन करने का खामियाजा डीएमके व वामपंथी मोर्चे को उठाना पड़ा था. उत्तर प्रदेश में अब अखिलेश यादव का राजनीतिक भविष्य भी अधर में लटका दिखाई दे रहा है.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव प्रचार में भाग न लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान अब पूरी तरह से राहुल गांधी के हाथ में दे दी है. कांग्रेस पार्टी की दुर्गति का अंदाजा इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले दो सालों यह अटकल चल रही है कि राहुल गांधी को किसी भी क्षण पार्टी का अध्यक्ष घोषित किया जा सकता है.

महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय के नतीजे इस बात की अोर संकेत करते हैं कि कांग्रेस के पारंपरिक प्रभाव वाले राज्यों में भी बीजेपी एक गंभीर चुनौती बन गई है और विपक्ष का स्पेस भी कोई अन्य दल भरने की स्थिति में आ गया है. पंजाब में आप पार्टी ने कांग्रेस के सामने गंभीर चुनौती पेश की है. वह जमाना चला गया जब गैर-कांग्रेसी दलों की सरकारों के सामने कांग्रेस ही एक स्वाभाविक विकल्प होती थी.

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कांग्रेस पार्टी इस तथ्य को समझ पाने में विफल रही है कि बीजेपी व अन्य क्षेत्रीय दलों की ताकत बढ़ने का सबसे बड़ा कारण इन दलों में क्षेत्रीय नेताअों का वजूद है. इंदिरा गांधी ने एक सिरे से कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताअों को कमजोर कर अपना आधिपत्य स्थापित किया था, यह परंपरा आज सोनिया-राहुल के राज में भी जारी है.

नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के भीतर क्षेत्रीय नेतृत्व के नाम पर चापलूस नेताअों की लंबी कतार लग गई. ये कमजोर नेता पार्टी को मजबूत करने की बजाय गुटीय संघर्ष में उलझ गए. राहुल गांधी इस बीमारी का इलाज करने में सक्षम नहीं है. अब यदि कांग्रेस को फिर से जीवित करना है तो ऐसे गांधी-परिवार के बाहर नए नेतृत्व की तलाश करनी होगी.

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