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बीएमसी नतीजे: मेयर की कुर्सी के लिए बीजेपी-शिवसेना के पास विकल्प क्या हैं?

क्या शिवसेना मुंबई और ठाणे में मेयर पद पर कब्जा जमाने के लिए किसी दूसरे दल का हाथ थामेगी?

Updated On: Feb 24, 2017 11:44 AM IST

Mahesh Vijapurkar

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बीएमसी नतीजे: मेयर की कुर्सी के लिए बीजेपी-शिवसेना के पास विकल्प क्या हैं?

मुंबई नगरपालिका चुनाव में भले बीजेपी और शिवसेना की राहें जुदा हो गईं हों. लेकिन जब बात नगरपालिका में जीती गई सीटों पर आकर थमती है तो यहां दोनों ही पार्टियां एक दूसरे के करीब दिखती हैं.

बीजेपी ने इससे पहले नगरपालिका चुनाव में इतनी सीटें कभी नहीं जीतीं थीं. बावजूद इस कामयाबी के मुंबई नगरपालिका पर एकक्षत्र राज्य जमाने का बीजेपी का सपना अधूरा ही रह गया.

ऐसे में नगरपालिका चुनाव के नतीजे न ही देवेंद्र फड़णवीस या बीजेपी और न ही उद्धव ठाकरे या शिवसेना के लिए अच्छी खबर लेकर आया है. क्योंकि दोनों ही दलों के पास इतना संख्याबल नहीं है कि वो अपना राज कायम कर सकें. लिहाजा दोनों ही पार्टियों को दूसरे दलों का समर्थन लेने के लिए मबूर होना पड़ेगा. और यहीं पर जाकर इस पूरे सियासी गणित का समीकरण उलझता हुआ दिखता है.

दोनों ही पार्टियां अगर अन्य दलों से समर्थन जुटाती है, तो उन्हें वैसे दलों से हाथ मिलाने को बाध्य होना पड़ेगा जो वैचारिक रूप से दोनों ही पार्टियों से एकदम अलग हैं. विपरीत दिशा में चलने वाले हैं. नतीजतन जहां गठबंधन कायम करना कठिन होगा वहीं इसे लंबा खींच पाना भी बड़ी चुनौती होगी.

Mumbai: Shiv Sena President Uddhav Thackeray (L) along with his wife Rashmi and son Aditya (R) during a press conference on party's win in BMC polls at Sena Bhavan in Mumbai on Thursday. PTI Photo (PTI2_23_2017_000250B)

अगर किसी तरह गठबंधन तैयार भी हो जाता है तो पार्टी से लोगों का भरोसा टूटने का खतरा बढ़ जाएगा. जबकि न बीजेपी और न ही शिवसेना समर्थन के लिए कांग्रेस का दरवाजा खटखटा सकते हैं. यही हाल कांग्रेस का भी है. अगर कांग्रेस इनमें से किसी भी पार्टी का समर्थन करती है तो पार्टी की साख को भारी धक्का पहुंचेगा.

उधर शिवसेना ने एमएनएस को हमेशा से ठुकराया है. लेकिन बदले हुए सियासी हालात में एमएनएस को अब बीजेपी अपनी तरफ मिलाने की कोशिश कर सकती है. बीजेपी, पुणे और नागपुर में जीत का परचम लहरा रही रही है. छह दूसरी नगरपालिकाओं में भी बीजेपी बतौर सबसे बड़ी पार्टी उभरी है. ये भी पढ़ें: बीएमसी चुनाव: मुंबई पर किसका चलेगा राज!

हालांकि बीजेपी की गले की हड्डी मुंबई और ठाणे नगरपालिका है. क्योंकि शिवसेना के साथ गठजोड़ को लेकर सवाल यही है कि क्या ‘आर्ट ऑफ द पॉसिबल’ थ्योरी कारगर साबित होगी? क्योंकि महाराष्ट्र सरकार का मुखर विरोध करने के साथ ही शिवसेना देवेंद्र फड़णवीस सरकार को समर्थन भी दे रही है. ऐसे में शिवसेना के साथ सियासी डील करना आसान नहीं होगा.

2014 विधानसभा चुनावों में उद्धव ठाकरे ने 63 सीटें जीतकर बेहतर प्रदर्शन किया था. इसके बाद उनकी पार्टी को इस बार के नगरपालिका चुनाव में बीजेपी से ही कठिन चुनौती का सामना करना पड़ा. चुनाव के दौरान दोनों ही पार्टियों के नेताओं के बीच खुलेआम जुबानी जंग छिड़ी हुई थी.

हालांकि इस चुनाव के बाद अब कैबिनेट में उद्धव ठाकरे अपनी स्थिति को और मजबूत करने की कोशिश करेंगे. जबकि मुंबई के प्रशासन को लेर फड़णवीस पारदर्शिता की मांग करेंगे. क्योंकि अपारदर्शिता से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है.

तमाम विश्लेषकों की राय में इस चुनावी नतीजे की सबसे प्रमुख बात यही है कि मुंबई ने गर्वनेंस की जगह ‘पॉलिटिक्स ऑफ आइडेन्टिटी’ का चुनाव किया है. इस बात से किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता कि प्रशासन कितना लाचार है? सड़क पर गड्ढे क्यों हैं? क्योंकि नगरपालिका चुनाव शुरू होने से कुछ महीनों पहले तक नागरिक प्रशासन में बीजेपी शिवसेना की सहयोगी थी. और पार्टी शिवसेना का उसी तरह विरोध करती थी जिस प्रकार अब शिवसेना राज्य सरकार का विरोध कर रही है.

Mumbai: Chief Minister of Maharashtra Devendra Fadanvis and party state president Ravsaheb Danve along with Kirit Somaiya flash victory signs after the BMC poll results at Mumbai BJP office on Thursday. PTI Photo (PTI2_23_2017_000233B)

ये सिर्फ किसी एक पार्टी को निशाना बनाने की बात नहीं है. मुंबई और ठाणे में शिवसेना पिछले दो दशकों से राज कर रही है. बावजूद शहर के हालात ऐसे हैं जिसे लेकर अफसोस जाहिर करना पड़ता है. आखिर इस बात के लिए कौन जिम्मेदार ठहराया जा सकता है कि 3700 करोड़ के वार्षिक बजट में आधे से अधिक पैसा जब विकास कार्यों पर खर्च किया जाना था. तो इन पैसों का इस्तेमाल ही नहीं किया सका? इस शहर की ये स्थिति चिंताजनक है. क्योंकि ठाणे में भी हालात इससे कुछ अलग नहीं हैं.

वर्ष 1990 के दौरान ग्रेटर मुंबई की नगरपालिका कांग्रेस के नियंत्रण में थी. लेकिन 1995 में जब शिवसेना और बीजेपी ने चुनाव पूर्व गठबंधन के बाद राज्य में सरकार बनाया. तब कहीं जाकर नागरिक प्रशासन से संबंधित संस्थाओं मे बदलाव की बयार बही.

1997 में शिवसेना के 103 कारपोरेटर्स थे, जो अब तक पार्टी के लिए सबसे ज्यादा संख्या थी. तब बीजेपी के महज 26 कारपोरेटर्स ही थे. लेकिन इसके बाद शिवसेना के कारपोरेटर्स की संख्या में लगातार कमी होती गई. वर्ष 2002 में शिव सेना कारपोरेटर्स की संख्या 97 थी तो 2007 में ये घटकर 82 पहुंच गई. और 2012 में शिवसेना कारपोरेटर्स की संख्या सबसे कम 75 पर पहुंच गई.

हालांकि बीजेपी के साथ गठबंधन होने के चलते शिवसेना के सिर पर मेयर का ताज जरूर चमकता रहा. लेकिन जब फड़णवीस ने शिवसेना के साथ अपने रास्ते अलग किए तो उन्होंने कहा कि बीजेपी को दिया गया हर वोट मुझे मजबूत करेगा. हालांकि तब फड़णवीस को यह अहसास नहीं रहा होगा कि वो खुद को अलग थलग कर लेंगे.

क्या अब शिवसेना मुंबई और ठाणे में मेयर पद पर कब्जा जमाने के लिए किसी दूसरे दल का हाथ थामेगी? क्या शिवसेना बीजेपी से समर्थन मांगेगी? क्या जो कांग्रेस और एनसीपी शिवसेना पर सांप्रदायिक होने का आरोप मढ़ती रही है वो कुछ आगे हाथ बढ़ा सकते हैं?

हालांकि मुंबई और ठाणे पर सिर्फ ध्यान केंद्रित नहीं किया जाना चाहिए. क्योंकि बीजेपी ने दूसरी जगहों पर जो सीटें जीती है वो पार्टी की कामयाबी का सबूत है. पुणे और पिंपरी चिंचवाड़ में पार्टी ने एनसीपी और कांग्रेस को उसकी हैसियत बता दी. क्योंकि पुणे, पिंपरी चिंचवाड़ में शरद पवार उनके परिवार का भारी असर है.

हालांकि हम लोग अभी भी जिला परिषद और पंचायत समितियों के चुनावी नतीजों की बात नहीं कर रहे हैं. जो शहरी जरूरतों और उम्मीदों से कहीं अलग हैं. ये बात ध्यान देने योग्य है कि मुंबई और ठाणे जैसे शहर गर्वनेंस के मुद्दे को तवज्जों नहीं देते हैं. हालांकि ये उम्मीद करना बेमानी होगा कि अगर बीजेपी यहां से चुनाव जीती होती तो स्थितियों में सुधार होता. स्थानीय नेता शायद ही सुधार के वैसे किसी कदम के पक्ष में होंगे जिससे भ्रष्टाचार का जरिया ही खत्म हो जाए.

ये भी पढ़ें: BMC Results 2017: किसी को बहुमत नहीं, शिवसेना को 84 तो बीजेपी को 82 सीट

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