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नोटबंदी: पुराने नोट वापस लेना बीजेपी का महायूटर्न

यूपीए सरकार ने 2014 में पुराने नोटों को वापस लिया था.

Updated On: Nov 20, 2016 01:43 PM IST

Krishna Kant

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नोटबंदी: पुराने नोट वापस लेना बीजेपी का महायूटर्न

किसी पार्टी के विपक्ष में रहते हुए सरकार का जो फैसला 'गरीबों को तबाह करने वाला' लगता है, सत्ता में आते ही वह जनहित का फैसला हो जाता है. केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसके अपवाद नहीं हैं. सत्ता में आने पर पार्टियों के सुर कैसे बदलते हैं, यह देखना है तो पुराने नोटों को बदलने संबंधी यूपीए और एनडीए के फैसलों को देखना चाहिए. दोनों सरकारों की कार्रवाई में मात्र दो साल का अंतर है.

यूपीए सरकार ने 2014 में पुराने नोटों को वापस लिया था. मनमोहन सिंह की अगुआई वाली सरकार ने कालेधन पर काबू पाने के लिए 2005 से पहले के सभी करेंसी नोट वापस लेने का फैसला लिया था. इस प्रक्रिया में न तो बैंक बंद किए गए थे, न ही एटीएम बंद हुए थे, न ही जनता को किसी स्तर पर असुविधा हुई थी. लेकिन यूपीए सरकार के इस कदम को गरीब विरोधी बताया था कि 'करेंसी बदलने के फैसले से गरीब तबाह हो जाएंगे'.

कालेधन और नकली नोटों की समस्या से निपटने के लिए 2014 में भारतीय रिजर्व बैंक ने 2005 से पहले जारी सभी करेंसी नोट वापस लेने का फैसला किया था, जिसके तहत 500 रुपए व 1000 रुपए सहित सभी मूल्य के नोट वापस लिए गए थे. एक अप्रैल 2014 से लोगों को इस तरह के अपने नोट बदलने के लिए बैंकों से संपर्क करना था और नोट बदलने की अंतिम तारीख एक जनवरी, 2015 थी.

23 जनवरी, 2014 को मीडिया में खबरें छपी थीं. जीन्यूज की खबर के मुताबिक, भाजपा ने कहा था कि 'सरकार ने कालेधन पर काबू पाने के नाम पर वर्ष 2005 से पहले के सभी करेंसी नोट वापस लेने का जो निर्णय किया है वह आम आदमी को परेशान करने और उन ‘चहेतों’ को बचाने के लिए है जिनका भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद के बराबर का कालाधन विदेशी बैंकों में जमा है.'

उस समय भाजपा विपक्ष में थी. भाजपा के प्रवक्ता ने आधिकारिक तौर पर कहा था कि 'यह निर्णय बैंकिंग सुविधाओं से वंचित दूर-दूराज के इलाकों में रहने वाले उन गरीब लोगों की खून पसीने की गाढ़ी कमाई को मुश्किल में डाल देगा जिसे उन्होंने बुरे वक्त के लिए जमा किया है. सरकार का यह फैसला विदेशी बैंकों में अमेरिकी डॉलर, जर्मन ड्यूश मार्क और फ्रांसिसी फ्रांक आदि करेंसियों के रूप में जमा भारतीयों के कालेधन में से एक पाई भी वापस नहीं ला सकेगा. इससे साफ है कि सरकार का विदेशों में जमा भारतीयों के कालेधन को वापस लाने का कोई इरादा नहीं है और वह केवल चुनावी स्टंट कर रही है.’

बीजेपी की प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने यह भी उस वक्त कहा था कि 'इस निर्णय से दूर दराज के इलाकों के गरीबों की मेहनत की कमाई पर पानी फिर जाने का खतरा पैदा हो गया है, क्योंकि देश की 65 प्रतिशत आबादी के पास बैंक खातों की सुविधाएं नहीं हैं. ऐसे इलाकों में बैंकों की सुविधा नहीं होने के कारण अधिकतर लोग अपना पैसा 2005 के बाद की करेंसी से नहीं बदल पाएंगे या बिचौलियों के भारी शोषण का शिकार होंगे.'

मीनाक्षी का कहना था कि

'देश की बहुत बड़ी आबादी ऐसी होगी जिसे इस खबर का पता भी नहीं होगा और वक्त जरूरत के लिए जब वे अपना यह कीमती धन खर्च करने के लिए निकालेंगे तब उन्हें एहसास होगा कि उनकी कड़ी मेहनत की कमाई कागज का टुकड़ा भर रह गई है. यह निर्णय आम आदमी को परेशान करने तथा उन ‘चहेतों’ को बचाने के लिए है जिनका कालाधन विदेशी बैंकों में जमा है.'

इसके बाद 22 दिसंबर, 2014 को दैनिक जागरण में छपी खबर के मुताबिक, 'देश में 500 और 1,000 समेत 2005 से पहले छपे करेंसी नोटों को बदलवाने के लिए अब ज्यादा समय नहीं बचा है. ऐसे पुराने नोटों को बदलने के लिए अंतिम तारीख एक जनवरी, 2015 है.

भारतीय रिजर्व बैंक ने 2005 से पहले छपे नोटों को परिचालन से हटाने की कवायद शुरू करते हुए अब तक ऐसे 144.66 करोड़ नोट अलग किए हैं. इनका मूल्य 52,855 करोड़ रुपये है. 2005 के पहले छपे नोटों के जाली नोट तैयार करने का खतरा बहुत ज्यादा था। लिहाजा, सरकार ने इन्हें बंद करने का फैसला लिया था. इसके बाद छपे नोटों में सुरक्षा से जुड़े तमाम उपाय किए गए हैं. इनसे जाली नोटों को चलन में आने से रोकने में मदद मिलेगी.'

जागरण की खबर के मुताबिक, 'रिजर्व बैंक ने इस साल 22 जनवरी को ऐसे नोटों को एक अप्रैल से वापस लेने की घोषणा करते हुए कहा था कि लोग बैंकों में जाकर इन्हें बदलना शुरू कर दें. 2005 से पहले छपे नोटों के पीछे उसकी छपाई का वर्ष मुद्रित नहीं किया गया था. इसके बाद छापे गए नोटों के पीछे निचले हिस्से में मुद्रण का वर्ष प्रकाशित करने की व्यवस्था की गई थी. केंद्रीय बैंक पहले ही बैंकों को कह चुका है कि वह 2005 से पहले की सीरीज वाले नोटों को काउंटर और एटीएम के जरिये न जारी करें. आरबीआइ की मानें तो प्रणाली में 2005 से पहले की सीरीज वाले नोटों की संख्या अब इतनी अधिक नहीं बची है जिससे आम जनता पर कोई बड़ा असर पड़े.'

अगर नोट वापस लेने में देश का फायदा है तो जरूर लिए जाने चाहिए. लेकिन सवाल उठता है कि तब जनता को कोई असुविधा हुए बिना भी जिस प्रक्रिया को भाजपा गरीबों को तबाह करने वाला फैसला बता रही थी, इस बर्ष उससे कड़ी और असुविधाजनक प्रक्रिया पर कैसे अमल किया गया? क्या भाजपा की मोदी सरकार ने गरीबों को तबाह करने वाले फैसले को और कड़ा करके लागू करना माना? अगर आज यह फैसला आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी समस्याओं की रीढ़ तोड़ने वाला है तो दो साल पहले यह देश और जनता के विरोध में कैसे था?

 

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