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वो कौन सी गुफाएं हैं जहां से पैसा निकलता है और सीधा पार्टियों की झोली में गिरता है?

बीजेपी की आय में बढ़ोत्तरी और कांग्रेस को मिलने वाले धन में कमी कोई आश्चर्य की बात नहीं है लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात पार्टियों को मिलने वाले धन के अज्ञात स्रोतों से है

Dinesh Unnikrishnan Updated On: Apr 12, 2018 08:23 AM IST

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वो कौन सी गुफाएं हैं जहां से पैसा निकलता है और सीधा पार्टियों की झोली में गिरता है?

सत्ता में रहने वाली पार्टी को धन की कमी नहीं होती है ये बिल्कुल सत्य है ऐसे में सत्ता पक्ष को मिलने वाले दान की तुलना विपक्ष को मिलने वाले दान से करना बेईमानी है. इसलिए जब ये बात सामने आई कि सत्ताधारी बीजेपी को साल 2016-17 में उसको होने वाली आय में 81 फीसदी इजाफा हुआ है तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ, उसी तरह से कांग्रेस पार्टी को मिलने वाले धन में भी 14 फीसदी तक की कमी आई तो किसी ने हैरानी नहीं जताई.

देश के दो सबसे बड़े राष्ट्रीय राजनैतिक दल बीजेपी और कांग्रेस को मिलने वाले धन के आंकड़ों पर तुलना के लिए गौर फरमाइए. चुनाव और उससे जुड़ी बातों पर नजर रखनेवाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के मुताबिक सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को साल 2015-16 में कुल 570.86 करोड़ रुपए की आय हुई थी जो कि केवल एक साल में 81 फीसदी बढ़ कर साल 2016-17 1,034.27 करोड़ हो गई. उधर इसके ठीक उल्टा विपक्षी दल कांग्रेस का हाल हुआ है. कांग्रेस को जहां साल 2015-16 में 261.56 करोड़ रुपए मिले, वो एक साल में 36.20 करोड़ घट कर मात्र 225.36 करोड़ रुपए रह गए.

बीएसपी की तरह ही नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का खजाना भी बढ़ा है

भारतीय जनता पार्टी के 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही बीजेपी की किस्मत चमकने लगी. पार्टी को शासन में आने वाले उसे धन की कमी महसूस नहीं हुई है. सत्ता में आने के बाद पार्टी के खजाने में लगभग 53 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. बीजेपी की आय जहां 2013-14 में केवल 673.81 करोड़ थी वहीं 2016-17 में ये बढ़ कर 1034.27 करोड़ रुपए हो गई है. दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी को इस मोर्चे पर खासा नुकसान उठाना पड़ा है. पार्टी के खजाने में 62 फीसदी तक की कमी दर्ज की गई है. 2013-14 में जहां कांग्रेस को 598.06 करोड़ मिले थे वहीं 2016-17 में ये घट कर महज 225.36 करोड़ रुपए ही रह गए.

अब एक नजर बहुजन समाज पार्टी को मिलने वाले धन के आंकड़ों पर भी डालिए. पार्टी के खाते में जबरदस्त वृद्धि हुई है. जहां बीएसपी को साल 2015-16 में केवल 47.385 करोड़ रुपए की आय हुई थी वहीं साल 2016-17 में ये आंकड़ा 173.58 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. यानी कि एक साल में पार्टी के फंड में 266.32 फीसदी तक की बंपर बढ़ोत्तरी हो गई. बीएसपी की तरह ही नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का खजाना भी बढ़ा है. एनसीपी के खाते में 88.63 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक एनसीपी को साल 2015-16 में जहां 9.137 करोड़ रुपए की आय हुई वहीं 2016-17 में ये बढ़ कर 17.235 करोड़ तक पहुंच गई. यानी एनसीपी को एक साल में 8.098 करोड़ ज्यादा मिले.

अगर सात राष्ट्रीय पार्टियों को मिलने वाली राशि की पूरी तस्वीर को ध्यान से देखें तो पाएंगे की 2016-17 में उन्हें मिले कुल 1169.07 करोड़ रुपए में से 75 फीसदी धन उन्हें स्वैच्छिक योगदान के तहत मिले हैं. जबकि इसके विपरीत 2015-16 में इन पार्टियों को मिले कुल धन का केवल 60 फीसदी स्वैच्छिक योगदान के तहत मिला था.

BSP Rally in Moradabad

पार्टियों को मिलने वाला अधिकांश धन अज्ञात स्रोतों से

जैसा की शुरू में ही बताया गया है कि बीजेपी की आय में बढ़ोत्तरी और कांग्रेस को मिलने वाले धन में कमी कोई आश्चर्य की बात नहीं है लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात पार्टियों को मिलने वाले धन के अज्ञात स्रोतों से है. इस विषय पर नजर रखने वाली संस्था एडीआर ने अभी तक अज्ञात स्रोतों से पार्टियों को मिलने वाले रकम का खुलासा नहीं किया है लेकिन इसी संस्था के संस्थापक सदस्यों में से एक प्रो.जगदीप छोकर के मुताबिक सभी पार्टियों को मिलने वाली कुल राशि का लगभग 75 से 80 फीसदी तक धन अज्ञात स्रोतों से ही मिलता है.

दूसरे शब्दों में कहें तो राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लाने का सरकार का वादा अब तक केवल वादा ही बना हुआ है. ये मुद्दा निश्चित रूप से देश के लिए और खास करके बीजेपी के लिए अच्छा नहीं है क्योंकि बीजेपी ने शुरू में वादा किया था कि वो राजनीतिक चंदों और फंडों के लेन देन में पारदर्शिता लाने की कोशिश करेगी.

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जबकि असल में नरेंद्र मोदी सरकार ने राजनीतिक फंडिग को लेकर अपनी कई नीतियों में उलटे पारदर्शिता कम करने का काम किया है. पिछला ऐसा मौका 2018 के फाइनेंस बिल के पास कराने के दौरान आया था जब लोकसभा ने शांतिपूर्ण तरीके से एक कानून में संशोधन पर अपनी मुहर लगा दी. ये कानून विदेशों से मिलने वाले चंदे से संबंधित था जिसके अनुसार राजनीतिक दलों को 1976 के बाद विदेशों से मिलने वाले धन की जांच पड़ताल से बचाव में मदद मिलती है. मजेदार बात ये कि 218 संशोधनों में से ये एकमात्र संशोधन था जिसको लोकसभा ने बिना किसी चर्चा के पास कर दिया.

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इस संशोधन का मतलब क्या है ? दरअसल फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट 2010 के मुताबिक भारत के राजनीतिक दलों को विदशों से मिलने वाले चंदे को लेने की मनाही है. लेकिन इस संशोधन के मुताबिक अब राजनीतिक दलों से विदेशी चंदों के संबंध में कोई पूछताछ नहीं की जा सकेगी. यानी न इस मसले पर राजनीति दलों से कोई सवाल पूछा जा सकता है और न ही उन्हें जवाब देने की कोई बाध्यता है. लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा तो ये है कि अगर राजनीतिक दलों को विदेशों से मिलने वाले धन पर नजर नहीं रखा गया तो क्या भारत के चुनाव व्यवस्था पर विदेशी हस्तक्षेप संभव नहीं होगा ?

ये एक ऐसी संभावना है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता. इस महत्वपूर्ण प्रावधान को तभी समझा जा सकता है जब राजनीतिक दलों के चंदे से संबंधित इतिहास पर ध्यान दिया जाए. एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में देश के दो बड़े राष्ट्रीय राजनीति दल बीजेपी और कांग्रेस को दिल्ली हाईकोर्ट ने विदेशी चंदा प्राप्त करने का दोषी पाया था. इस संबंध में याचिका एडीआर ने ही डाली थी.

इस रिपोर्ट के मुताबिक लंदन की कंपनी वेदांता रिसोर्सेज ने कथित रूप से अपनी भारतीय सहयोगी कंपनियों की तरफ से कांग्रेस को 879 लाख और बीजेपी को 790 लाख रुपए दान किए थे. अब नए संशोधन के मुताबिक इस तरह के आरोपों पर पार्टियों को किसी तरह की सफाई देने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

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इस पूरे लेनदेन में धन देने वाले और लेने वाले दोनों अज्ञात ही रहते हैं

2017 के फाइनेंस बिल में भी कुछ इसी तरह की राहत राजनीतिक दलों को मिली थी जिसके माध्यम से वो अपने चंदे के स्रोतों को आसानी से छिपा सकते थे. इसके लिए कानून में दो महत्वपूर्ण बदलाव किए गए. पहला ये कि किसी भी कंपनी के लिए पिछले तीन साल के औसत नेट प्रॉफिट के 7.5 फीसदी से ज्यादा चंदा राजनीतिक दलों को देने की सीमा समाप्त कर दी गई और दूसरा सरकार ने उस नियम को समाप्त करने की बात कही जिसके अनुसार कंपनी को अपने नफा नुकसान के खाते में ये घोषित करना होता था कि उसने किस राजनीतिक दल को कितना चंदा दिया. इन दोनों बदलावों ने राजनीतिक दलों के चंदे से संबंधित पारदर्शिता को तिलांजलि दे दी.

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अभी हाल ही में सरकार ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के बारे में जानकारी के लिए इलेक्टोरल बांड्स जारी किया है. लेकिन ये भी पारदर्शिता के पैमाने पर सफल नहीं है. कोई भी दानकर्ता अब इन बांड्स को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की निर्धारित शाखाओं से एक हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ के गुणकों में खरीद कर किसी भी रजिस्टर्ड राजनीतिक दल को चंदे के रूप में दे सकता है. राजनीतिक दल उस बांड को भुना कर अपने खाते में जमा करा सकते हैं.

पहले चरण में 222 करोड़ रुपए के बॉन्ड्स की बिक्री हुई है और दूसरा लॉट इसी महीने जारी किया गया है. इस तरीके के माध्यम से कैशलेस राजनीतिक चंदे को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है लेकिन इस व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष ये है कि इस पूरे लेनदेन में धन देने वाले और लेने वाले दोनों अज्ञात ही रहते हैं ऐसे में आखिरी में किस का पैसा किस के पास जा रहा है ये संदेह बना ही रहता है. यही अज्ञात स्रोत पूरे राजनीतिक चंदे की मूल कड़ी में जुड़े हुए हैं और इसी को समाप्त करने की मांग राजनीतिक विश्लेषक लंबे समय से कर सके हैं.

किसी भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों को काम करने के लिए रुपए की आवश्यकता होती है लेकिन भारत में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का अधिकांश भाग अज्ञात स्रोतों से मिलता है. ये एक खतरनाक ट्रेंड है क्योंकि इससे न केवल पॉलिटिकल-कॉरपोरेट नेक्सस को बढ़ावा मिलता है बल्कि इससे अर्थव्यवस्था में भ्रष्टाचार और काले धन की भी उत्पत्ति होती है.

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