S M L

हर जीत के साथ बीजेपी मालामाल और संघ बेहाल

संघ को सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके समर्थन और पसीने से बनी सरकार उसकी नीतियों, उसके मूल्यों और दर्शन पर चले

Updated On: Mar 27, 2017 05:52 PM IST

Bhuwan Bhaskar Bhuwan Bhaskar
लेखक भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि मामलों के जानकार हैं

0
हर जीत के साथ बीजेपी मालामाल और संघ बेहाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बरसाना तहसील के तहसील प्रचारक मनीष कुमार उत्तर प्रदेश की बोर्ड परीक्षा में हो रहे नकल को रोकने लिए उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के अभियान चलाने संबंधी बयान से उत्साहित होकर अपने इलाके के रामादेवी इंटर कॉलेज पहुंच गए.

कैमरा लिया और लगे दो होमगार्ड जवानों का वीडियो बनाने, जो इंटर में फिजिक्स की परीक्षा के दौरान नकल करा रहे थे. फिर क्या था, होमगार्ड जवानों ने आव देखा न ताव, मनीष कुमार पर पिल पड़े.

डंडों से पिटे मनीष कुमार बाद में संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ थाने पहुंचे, तो होमगार्ड शेरपाल और धनेश के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिया गया. उन्हें जेल भेजने के आश्वासन के साथ निलंबित कर दिया गया.

लेकिन क्लाईमैक्स अभी बाकी था और वह तब आया जब स्वयं बीजेपी के कुछ नेता संघ के कार्यकर्ताओं पर मामले को ज्यादा तूल न दिए जाने का दबाव बनाने लगे.

कारण? दरअसल यह स्कूल एक बीजेपी नेता का है और वह बीजेपी नेता किसी मंत्री का करीबी बताया जा रहा है. बीजेपी की तरफ से यही संघ के लिए संदेश है.

काम करे संघ मौज करे बीजेपी 

Volunteers of RSS take part in a drill during their workers' meet in Ahmedabad

संघ का प्रचारक चुनाव में संगठन को मोबिलाइज करे, कार्यकर्ताओं को अपने घर से अपना खाना खाकर, अपना तेल जलाकर, अपना काम नुकसान कर संगठन के हित में बीजेपी के उम्मीदवार को जिताए और चुनाव खत्म होने के बाद चुपचाप शाखा लगाए. बीजेपी के नेता सत्ता सुख भोगें.

संघ के लिए यह खतरे की घंटी है. संघ हमेशा से दावा करता है कि राजनीति से उसका कोई मतलब नहीं और वह एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है. लेकिन सच सबको पता है.

बीजेपी का गर्भनाल संघ से जुड़ा है और अपने संगठन सचिवों और महासचिवों के जरिए संघ पार्टी के कार्यकलापों और नीतियों पर नियंत्रण भी रखने की कोशिश करता है.

सिर्फ बाहर से प्रभावी दिखता है संघ

पिछले दशक तक संघ के प्रचारक, जिन्हें संगठन की कमान दी जाती थी, सत्ता में भागीदार नहीं बनते थे और सरकार में कोई पद नहीं लेते थे. लेकिन नरेंद्र मोदी से शुरू होकर अब इस परंपरा में कई नाम शामिल हो चुके हैं.

इससे बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि बीजेपी पर संघ का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है. उत्तराखंड में 19 साल तक प्रचारक रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत और उत्तर प्रदेश में मनोज सिंहा का नाम लगभग फाइनल होने के बावजूद योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी ने इस अहसास को और गहरा किया है.

लेकिन थोड़ा भीतर जाकर देखा जाए तो चीजें अलग दिखने लगती हैं. पिछले दो दशकों में जिस तरह बीजेपी का सांगठनिक और पिछले एक दशक में जिस तरह इसकी सत्ता का विस्तार हुआ है, उसके लिहाज से संघ के लिए पार्टी पर नियंत्रण रखना एक बड़ी चुनौती है. यह चुनौती समय के साथ बड़ी होती जा रही है.

पहले बीजेपी के तमाम बड़े नेता संघ की पृष्ठभूमि से थे और इसलिए उनमें से लगभग हर एक की लगाम संघ के किसी न किसी बड़े अधिकारी के हाथ में होती थी. यह लगाम किसी ताकत या मोलभाव की नहीं, बल्कि नैतिक होती थी.

इसकी मुख्य वजह थी कि बीजेपी के इन बड़े नेताओं की सांगठनिक और वैचारिक परवरिश किसी न किसी प्रचारक की छत्रछाया में हुई होती थी, तो ये नेता उन प्रचारकों के सामने कुछ भी गलत करने या गलती जाहिर होने से डरते थे.

लेकिन 2017 की बीजेपी अलग है. संगठन और सरकार में ऐसे नेताओं की एक पूरी फौज है, जो चुनाव से महज कुछ दिनों, हफ्तों या महीनों पहले पार्टी में शामिल हुए और पार्टी या सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर पहुंच गए.

ये वे नेता हैं, जिन्होंने पूरी जिंदगी संघ को, उसकी विचारधारा को और उसके प्रचारकों को गालियां दी हैं. इनके मन में न संगठन के प्रति और न ही संघ के अधिकारियों के प्रति कोई सम्मान है. है तो बस डर. डर संघ की सांगठनिक ताकत का.

चुनावों में संघ की बढ़ती भागीदारी की मजबूरी

आरएसएस के सुभाष वेलिंगकर पर्रिकर और बीजेपी से नाराज चल रहे हैं

यह बात संघ को भी समझ में आ गई है कि बीजेपी पर नियंत्रण बनाए रखने का एकमात्र तरीका पार्टी नेताओं को जीत में अपनी अपरिहार्यता साबित करते रहना है और इसीलिए हर चुनाव में संघ की भागीदारी और गहन होती हुई दिखती है.

लेकिन संघ की इस रणनीति के अपने खतरे भी हैं. जब बीजेपी नेता के स्कूल में परीक्षा में चोरी रोकने के चक्कर में संघ का तहसील प्रचारक पिटता है और जब बीजेपी के नेता संघ के कार्यकर्ताओं पर मामले को दबाने का दबाव बनाते हैं तो ये खतरा अपने पूरे जोरों पर मुखर हो जाता है.

खबर यह भी है कि दिल्ली के एमसीडी चुनावों में संघ के कार्यकर्ता घर-घर जाकर यूपी की तर्ज पर प्रचार करने वाले हैं. इसमें किसी को संदेह नहीं कि दिल्ली के तीनों एमसीडी में बीजेपी शासन का भ्रष्टतम चेहरा सामने आया है.

संघ इसका मूक दर्शक बना रहा और अब फिर से बीजेपी की जीत पक्की करने के लिए मैदान में उतरने की तैयारी में है. अगर यह सच है तो संघ को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके समर्थन और पसीने से बनी सरकार उसकी नीतियों, उसके मूल्यों और दर्शन पर चले.

नहीं तो बीजेपी सत्ता में आकर अपना लक्ष्य हासिल कर लेगी, लेकिन भारत को एक गौरवमयी और आदर्श समाज देने का संघ का उद्देश्य ध्वस्त हो जाएगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi