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बीजेपी अखिलेश नाम की 'पुरवइया' से बचने की तैयारी कर ले

बीजेपी को इस सियासी तूफान का सामना करने के लिए खुद को अच्छी तरह से तैयार कर लेना चाहिए

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Jan 18, 2017 07:36 PM IST

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बीजेपी अखिलेश नाम की 'पुरवइया' से बचने की तैयारी कर ले

बीजेपी को पूरब की तरफ से आने वाली तेज हवा अखिलेश यादव से बचने की तैयारी शुरू कर लेनी चाहिए.

मंगलवार को जब पछुवा हवा दिल्ली को कंपकंपा रही थी, तो कांग्रेस के दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अगली चुनौती पूरब से आएगी. इसकी शुरुआत संभवत: हुगली नदी से होगी और चुनौती भरा ये तूफान संगम पर जाकर इकट्ठा होगा.

गुलाम नबी आजाद ने घोषणा की, कि जल्द ही कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का यूपी विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन होगा. अखिलेश के नेतृत्व वाला ये गठबंधन न सिर्फ 2017 विधानसभा चुनावों की हवा की ओर इशारा कर रहा है, बल्कि वो 2019 के लोकसभा चुनावों की रुप-रेखा भी तय कर रहा है.

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इस बात की पूरी संभावना है कि अखिलेश यादव उस गठबंधन का एक हिस्सा होंगे जो 2019 के लोकसभा चुनावों में पीएम मोदी के सामने चुनौती खड़ी करेगा. ये गठबंधन प्रधानमंत्री मोदी के लिए आ रही चुनौती का सबसे बड़ा संकेत होगा.

इस बात की पूरी संभावना है कि अखिलेश नेताओं की उस तिकड़ी का एक चेहरा होंगे जो 2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृ्त्व को चुनौती देगी. अखिलेश के साथ राहुल गांधी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इस तिकड़ी में होंगी, अगर ममता अपनी महत्वाकांक्षा और अहं को काबू में रख सकीं तो.

बीजेपी के खिलाफ गठजोड़ तय 

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठजोड़ कमोबेश तय है. गुलाम नबी आजाद ने तो एक कदम आगे बढ़कर राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच मुलाकात का प्रस्ताव भी रख दिया. कांग्रेस अपने घटते जनाधार की वजह से जानती है कि वो यूपी की राजनीति में तभी तक प्रासंगिक रह सकती है जब तक वो अखिलेश यादव के पीछे नहीं लटकती.

इस बात की पूरी संभावना है कि गठबंधन की सूरत में कांग्रेस 100 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए राजी हो जाएगी. यानी वो साइकिल पर पीछे की सीट पर बैठ कर सवारी करने को राजी हो गई है.

कांग्रेस पार्टी अखिलेश के साथ हर हाल में गठबंधन करना चाहती है

कांग्रेस पार्टी अखिलेश के साथ हर हाल में गठबंधन करना चाहती है

उधर अखिलेश भी बीजेपी से मुकाबले के लिए उसके विरोधी गुट के हर वोट को एक टोकरे में इकट्ठा करना चाहते हैं, ताकि बीजेपी के विरोधी वोटों का बिखराव न हो. अखिलेश यादव को इस बात का अंदाजा है कि त्रिकोणीय मुकाबले में वोटों में होने वाली जरा सी गड़बड़ी या हेरफेर किसी भी राजनैतिक दल का नफा और नुकसान कर सकती है.

चुनाव आयोग से साइकिल चुनाव चिन्ह मिलने के बाद अब अखिलेश का जोर मुस्लिम-यादव वोटों को एकजुट रखने पर होगा. साथ ही शहरी मध्यम वर्ग के मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने पर होगा. अखिलेश अपने विकास के एजेंडे पर कांग्रेस के वोटों का समर्थन भी जुटाना चाहते हैं. ताकि इन सभी वोटों के बूते वो विनिंग कॉम्बिनेशन तैयार कर सकें.

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2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को 29.29 प्रतिशत वोट मिले थे. कांग्रेस को 13 फीसद वोट मिले थे. हालांकि राजनीति में 29 और 13 का जोड़ शायद ही 42 होगा. लेकिन अगर इस गठजोड़ के बाद कांग्रेस को मिलने वाले वोट का ज्यादा से ज्यादा फायदा भी अगर अखिलेश को मिलता है तो भी उन्हें उम्मीद है कि वे चुनाव में इकतरफा जीत हासिल कर लेंगे.

बीएसपी से बेहतर स्थिति में होगा गठबंधन

इस गठबंधन से समाजवादी पार्टी की स्थिति बीएसपी से बेहतर हो गई है. गठबंधन के बाद उनके पास बीएसपी से ऊंचा एक ऐसा झंडा होगा जिसके नीचे बीजेपी विरोधी मतदाता खासकर अल्पसंख्यक इकट्ठा हो पाएंगे.

अखिलेश की कोशिश है कि वो ऐसा गठबंधन बनाएं जो बीएसपी को इस चुनावी समर से पूरी तरह से बाहर कर दे और चुनाव में एसपी का सीधा मुकाबला बीजेपी से हो. यानि अंत में यूपी का चुनाव अखिलेश बनाम मोदी की लड़ाई हो जाए.

सूत्रों के हवाले से आई खबरों के मुताबिक कांग्रेस-समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल का गठजोड़ एक तरह से दो पीढ़ियों की भी टक्कर होगी. राहुल और प्रियंका गांधी के साथ अखिलेश और डिंपल यादव मिलकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को चुनौती देंगे.

बीजेपी भी पिछले एक साल से यूपी में अपनी पूरी ताकत झोंकने में लगी है

बीजेपी भी पिछले एक साल से यूपी में अपनी पूरी ताकत झोंकने में लगी है

यहां पर बीजेपी को कम करके आंकना गलती होगी. पिछले एक साल से बीजेपी लगातार जमीनी स्तर पर विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही है ताकि उसके मतदाताओं में हर जाति, वर्ग और समुदाय का वोटर शामिल हो.

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हिंदुत्व के कोर मतदाताओं के अलावा बीजेपी ने मायावती के वोट बैंक में भी तगड़ी सेंध लगाई है. नोटबंदी के दौरान पीएम मोदी की तरफ से दिए गए बयानों का जमकर अलग-अलग वर्गों के लोगों बीच इस्तेमाल किया गया है.

बीजेपी के उम्मीदवारों की सोमवार को जारी हुई पहली लिस्ट पर नजर डालें तो ये साफ है कि बीजेपी पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों पर काफी जोर दे रही है जो अखिलेश यादव के कोर वोट बैंक में सेंध लगाने की आखिरी बड़ी रणनीति है.

यूपी चुनाव 2017 यादगार रहने वाला है 

2015 के बिहार चुनाव की तरह इस बार के यूपी चुनाव भी लंबे वक्त तक न सिर्फ याद रखा जाएगा, बल्कि इसका असर भी लंबे वक्त तक देखने को मिलेगा और चूंकि ये मुकाबला दिग्गजों के बीच होगा इसका लंबे समय तक गहरा राजनैतिक असर भी होगा.

अगर अखिलेश यादव ये चुनाव जीतते हैं तो वो मोदी विरोधी खेमे का प्रमुख आधार बन जाएंगे और अगर वो चुनाव हारते भी हैं तो भी उत्तर भारत में वो अकेले ऐसे गैर बीजेपी नेता होंगे, जो बीजेपी को 2014 के लोकसभा चुनाव जैसा प्रदर्शन दोहराने से रोक सकते हैं.

2014 में बीजेपी और सहयोगियों ने मिलकर यूपी की 73 सीटें जीती थीं. कांग्रेस जिसकी अपनी कोई पहचान अब यूपी में बची नहीं है वो इस हकीकत को अच्छी तरह से पहचानती है. कांग्रेस जिस तरह से इस गठबंधन की जूनियर सहयोगी बनकर चुनाव लड़ने को तैयार हो गई, उससे ये साफ होता है कि कांग्रेस पार्टी खुद के आकलन को लेकर कितनी यथार्थवादी है.

दीदी पर नजर

अगर सब कुछ ठीक रहा तो कांग्रेस पार्टी 2019 के लोकसभा चुनावों तक राज्य में साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं.

Akhilesh Rahul

कांग्रेस चाहेगी की वो 2019 के चुनावों तक एसपी के साथ रहे

अब ये देखना दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी यूपी की राजनीति में क्या स्टैंड लेती हैं. नोटबंदी के बाद से ही ममता बनर्जी खुद को सबसे बड़ी मोदी विरोधी नेता के तौर पर खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं. वो प्रधानमंत्री मोदी को हराने की कसमें खा रही हैं. उन्होंने ये संकेत दिये हैं कि वो यूपी में मोदी विरोधी गठबंधन का समर्थन करेंगी. यादव परिवार में लड़ाई के दौरान ममता बनर्जी ने अखिलेश यादव का समर्थन किया था.

शरलॉक होम्स के फैन्स को मालूम होगा कि पूरब की हवा की कितनी अहमियत होती है. ये अचानक बहना शुरू होती है, तेज रफ्तार से बहती है और अपने रास्ते में आने वाली उन तमाम मजबूत दरख्तों को उखाड़ फेंकती है जिनकी नींव कमजोर होती है.

जॉन वॉटसन के शब्दों में कहें तो अब बीजेपी को इस सियासी तूफान का सामना करने के लिए खुद को अच्छी तरह से तैयार कर लेना चाहिए.

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