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कश्मीर में इन छह सिपहसालारों के कंधों पर है बीजेपी का जनाधार बढ़ाने की जिम्मेदारी

इस कड़ी में हमने कश्मीर घाटी में बीजेपी के उभार में जुटे 6 सदस्यों की प्रोफाइल इकट्ठा की है

Updated On: Sep 02, 2018 05:04 PM IST

FP Staff

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कश्मीर में इन छह सिपहसालारों के कंधों पर है बीजेपी का जनाधार बढ़ाने की जिम्मेदारी
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जम्मू-कश्मीर में बीजेपी के उभरने की दास्तां के अलावा ज्यादा चौंकाने वाला है इनके सदस्यों की कहानी. कैसे एक स्थानीय कश्मीरी ने साल 1992 में मुरली मनोहर जोशी के फहराए तिरंगे को सैल्यूट किया. कैसे एक पुलिसकर्मी साल 1990 के दौरान बढ़ते आतंकवाद के दौर में नौकरी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गया? उस पर कई बार हमले होने के बाद भी बीजेपी के प्रति क्यों एक कश्मीरी मुस्लिम की निष्ठा अभी भी बनी हुई है? घाटी में बीजेपी के उभरने की दास्तां के इस सीरीज में हमने बीजेपी के 6 सदस्यों की प्रोफाइल इकट्ठा की है. इससे हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि कैसे वह बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं और अब भी घाटी में पार्टी बहुत ज्यादा प्रसिद्ध नहीं हैं.

असरफ आजाद

साल 1992 के दौर में कश्मीर पूरी तरह से पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की गिरफ्त में था. उस वक्त बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी ने ऐलान किया कि वह गणतंत्र दिवस के मौके पर लाल चौक पर तिरंगा फहराएंगे. आतंकी जोशी के इस कदम से परेशान हो गए. उन्होंने जोशी और बीजेपी समर्थकों को तिरंगा फहराने से रोकने की कोशिश की और उन्हें चुनौती दी. आतंकियों ने 26 जनवरी के दो दिन पहले बड़ी हड़ताल की. आतंकियों ने चुपके से राज्य के डीजीपी के मीटिंग में बम रख दिया. जब मीटिंग चल रही थी तभी बम फट गया और डीजीपी समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों को गंभीर चोट आई.

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26 जनवरी को लाल चौक को सुरक्षाबलों ने घेर लिया. कश्मीर में कर्फ्यू लगा दिया गया था. लाल चौक स्थित घंटा घर की पटरी पर जोशी ने झंडा फहरा दिया, हालांकि इस दौरान तिरंगे के कई समर्थकों को भारी चोट आई. हिन्दू समर्थकों के साथ कुछ दूरी पर एक स्थानीय कश्मीरी युवक भी था जिसकी उम्र उस समय बीस साल थी जिसने बड़गाम से हकरमुल्ला गांव से यहां तक आने की हिम्मत की थी. वह भी खड़ा रहा और झंडे को सलामी दी.

असरफ ने मुताबिक, 'उस वक्त कर्फ्यू लगा था और मैंने सुरक्षाबलों से झूठ बोला कि मैं अस्पताल जा रहा हूं.' उन्होंने कहा कि वह लाल चौक इसलिए पहुंचना चाहते थे, क्योंकि वह उस शख्स को देखना और उसे 'सम्मान' देना चाहते थे जिसने 'आतंकियों को चुनौती देने की हिम्मत' दिखाई. असरफ ने कहा, 'जब मैंने जोशी को झंडा फहराते और सैल्यूट करते देखा तो मैंने भी सैल्यूट किया. यह उनके जूनून के लिए सम्मान था.'

असरफ ने बताया कि उस वक्त किसी ने उनकी बांह पकड़ ली. असरफ ने कहा, 'मैंने सफेद कुर्ता पर काले कोट पहने हुए, काले दाढ़ी वाले एक आदमी को देखा, उसने मुझसे मेरा नाम पूछा. मैं डर गया था लेकिन उसे अपना मान बताया.' असरफ ने बताया,'मुझे बाद में पता चला कि वह आरएसएस का सदस्य थे और उनका नाम नरेंद्र दामोदरदास मोदी था.'

जो लोग जोशी के साथ आए थे, वे असरफ से बातचीत करने के बाद प्रभावित हुए. उन्हें जम्मू ले जाया गया जहां उन्हें एक पीस ग्रुप बनाने के लिए कहा गया. उनका काम लोगों को यह समझाना था कि बंदूक समाधान नहीं है.

असरफ ने कहा, 'जब मैं श्रीनगर लौट आया, तो मुझे सुरक्षा और सरकारी आवास मिला.' आजाद के मुताबिक, वह श्रीनगर के बेमिना इलाके में एक छोटी एलपीजी-भरने वाली इकाई चला रहा हैं. हालांकि, उनके गांव के एक स्थानीय ने कहा कि असरफ को हमेशा विश्वासघाती माना जाता है रहा है.

असरफ ने दावा किया, 'अगले साल जब नरेंद्र मोदी कश्मीर गए, आजाद से उनके साथ रहने के लिए कहा गया. कश्मीर में उस समय केवल छह जिले थे. मोदी जी और मैंने लगभग सभी जिलों का दौरा किया. हमने उस वक्त कई लोगों से मुलाकात की.' उस समय मोदी उनके घर पर तीन दिनों तक रहे. असरफ ने कहा मोदी केवल शाकाहारी भोजन खाते थे.

असरफ ने बड़गाम से तीन बार चुनाव लड़ा लेकिन हार गए. साल 2014 में उन्होंने चुनाव लड़ना बंद कर दिया. असरफ ने कहा, 'मैं अब सक्रिय नहीं हू. मैं दो बेटे और दो बेटियां का पिता हूं. मुझे उनके विवाह की व्यवस्था और परिवार की देखभाल करनी है.'

सोफी यूसुफ

सोफी यूसुफ अनंतनाग से ताल्लुक रखते हैं. अनंतनाग कॉलेज ज्वॉइन करने के बाद ही उनका सिलेक्शन जम्मू-कश्मीर पुलिस कांस्टेबल परीक्षा में हो गया था. लेकिन, यूसुफ हमेशा से राजनीतिक महात्वाकांक्षी थे. इसके लिए उन्होंने बीजेपी ज्वॉइन करने की सोची और लगातार जम्मू बीजेपी की सदस्यता के लिए लोकल नेताओं से लगातार संपर्क कर रहे थे.

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सोफी यूसुफ की जिंदगी में 1996 का साल काफी अहम रहा. इस साल उनकी उम्र के कई हजार युवाओं ने हुकूमत के खिलाफ 'आज़ादी' की लड़ाई के लिए किताब छोड़ बंदूक थाम ली थी. इस घटना पर सोफी यूसुफ का कहना था कि 1987 के चुनाव के दौरान हुए खून-खराबों ने कश्मीर में आतंकवाद को जन्म दिया था. तब से हालात बिगड़े हैं, जो अभी तक नहीं संभलें. जब आतंकवाद को सरकार स्पॉन्सर करे, तो चीजें और खतरनाक होने लगती है.

यूसुफ कहते हैं, 'इन सबके पीछे एक ही पार्टी थी. कांग्रेस पार्टी. उनके बीजेपी में शामिल होने के पीछे कांग्रेस पार्टी भी एक वजह रही.' यूसुफ बताते हैं, 'बीजेपी ज्वॉइन करने के बाद मेरी मुलाकात पार्टी के टॉप नेताओं से हुई. इसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल थे. जब भी ये दोनों कश्मीर आते थे, मैं उनके साथ होता था.'

यूसुफ आगे बताते हैं, '2002 में मैंने जब अटल बिहारी वाजपेयी और वेंकैया नायडू घाटी का दौरा करने आए थे, तब मैंने एक मेगा रैली आयोजित की थी. जिसका काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला था.' उनके मुताबिक, बीजेपी ही एक ऐसी पार्टी है, जो घाटी में अमन-चैन ला सकती है.

लतीफ अहमद खान

पेशे से फोटोजर्नलिस्ट लतीफ अहमद खान बीजेपी में आने से पहले कांग्रेस के साथ थे. साल 2000 में उन्होंने कांग्रेस का 'हाथ' छोड़ बीजेपी का 'कमल' पकड़ लिया. 40 साल के लतीफ अहमद खान पहलगाम के श्रीगुफवाड़ा से ताल्लुक रखते हैं. बीजेपी ज्वॉइन करने के बाद खान ने बेबाकी से कहा था कि उन्होंने पार्टी के कामों के अच्छे से देखने के बाद ही इसमें शामिल होने का फैसला लिया है.

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बीजेपी की इमेज को लेकर एकबार उन्होंने कहा था, 'लोग कहते हैं कि ये पार्टी एंटी-मुस्लिम है. जब मैंने पार्टी ज्वॉइन की थी, तब मेरे दिमाग में भी यही सब बातें रहती थीं. लेकिन, पार्टी के सीनियर नेताओं से मिलने के बाद और कई बैठकों में शामिल होने के बाद मेरी राय बदल गई. मैंने देखा कि बीजेपी का कभी एंटी-मुस्लिम एजेंडा रहा ही नहीं.'

खान कहते हैं, 'शायद बीजेपी से इतर कोई और पार्टी ज्वॉइन करना आसान और फायदेमंद होता. लेकिन, उन पार्टियों की 'हिप्पोक्रेसी' को देखते हुए मुझे बीजेपी ही बेस्ट ऑप्शन लगी और मैंने बीजेपी के ही चुना.'

लतीफ अहमद खान का कहना है कि अगर कोई अपना काम पूरी लगन से करता है, तो पार्टी नेतृत्व उसे नज़रअंदाज नहीं कर सकती. बीजेपी में ऐसा ही है. लेकिन, आप दूसरी पार्टियों को देखिए. वहां आपको परिवारवाद के अलावा कुछ नहीं मिलेगा. खान का इशारा कांग्रेस की तरफ था.

अल्ताफ ठाकुर

पॉलिटिकल साइंस में पोस्ट-ग्रेजुएट अल्ताफ ठाकुर कश्मीर बीजेपी के प्रवक्ता हैं. वह बीते सात सालों से पार्टी के मीडिया प्रभारी भी हैं. बीजेपी के साथ उनका सफर कॉलेज के दिनों से ही शुरू हो गया था.

अल्ताफ ठाकुर बताते हैं, 'मैंने 2002 में बीजेपी ज्वॉइन की, तब मैं पोस्ट-ग्रेजुएशन कर रहा था. उन दिनों में यूनिवर्सिटी कैंपस में देशप्रेम राजनीति को प्रमोट कर रहा था. दरअसल, मैं पार्टी के अंडरकवर ऑपरेटिव के तौर पर काम कर रहा था.'

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इसी दौरान अल्ताफ ठाकुर पर यूनिवर्सिटी में जानलेवा हमला हुआ. उस हमले में वह बाल-बाल बचे थे. ठाकुर बताते हैं, 'उस वक्त मुझपर एक के बाद तीन आतंकी हमले हुए, लेकिन मेरे दिमाग में ये ख्याल कभी नहीं आया कि मैं पार्टी छोड़ दूं.'

अल्ताफ ठाकुर आर्टिकल 370 और आर्टिकल 35A पर बीजेपी के स्टैंड का खुलकर समर्थन भी करते हैं. उनका कहना है कि कश्मीर में अमन-चैन के लिए इन्हें हटा देना चाहिए. कश्मीर का दर्जा वैसा ही होना चाहिए जैसा देश के बाकी राज्यों का है. तभी घाटी में शांति आ सकती है.

यह पूछने पर कि क्या बीजेपी मुस्लिमों और दूसरे अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के आरोपियों की 'मददगार' है? इसके जवाब में ठाकुर कहते हैं, 'ये विपक्ष की हिप्पोक्रेसी है. इसी पार्टी के लोग पीएम नरेंद्र मोदी की एंटी-मुस्लिम छवि बना रहे हैं. लेकिन, सच ये नहीं है. मैंने गुजरात में देखा है, वहां के मुसलमान खुश, संपन्न और सशक्त हैं.'

नीलम गश

इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुकीं 33 साल की नीलम गश की रुचि कभी इस पेशे में नहीं रही. उन्होंने पहले तो एक एनजीओ में काम किया और फिर कम्प्यूटर एपलिकेशन में मास्टर्स (एमसीए) की पढ़ाई के लिए दिल्ली चली गईं. इसके बाद फिर उन्होंने दिल्ली की ही एक कंपनी रिलेशनशिप मैनेजर की जिम्मेदारी संभाली. करीब चार की नौकरी के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया और फिर सिविल सर्विसेज़ की तैयारी में जुट गई. हालांकि यहां उन्हें कामयाबी नहीं मिली, तो उन्होंने सियासत की तरफ का मन बनाया और कांग्रेस से जुड़ गईं.

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साल 2014 में बीजेपी के स्थानीय नेता की नजर उनकी क्षमताओं पर पड़ी और आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी की तरफ से उन्हें टिकट दे दिया गया. श्रीनगर स्थित बीजेपी ऑफिस में न्यूज़18 से बातचीत में गश कहती हैं, 'मैं हमेशा से राजनीति में आना चाहती थी, लेकिन बीजेपी का टिकट ऑफर मेरे लिए चौंकाने वाला था. मुझे तभी पता चला कि बीजेपी कश्मीर में मौजूद है.'

नीलम गश बताती हैं, 'उन्हें इसे लेकर फैसले में ज्यादा वक्त नहीं लगा. मैंने अपने परिवार से सलाह मशविरा किया. पापा ने इजाज़त दे दी, लेकिन मैं ध्यान रखने को कहा. और इस तरह मैंने चुनाव लड़ने की हामी भर दी.'

गश के पिता एक डॉक्टर हैं और वह करीब एक दशक तक उनके साथ ईरान में रह चुकी हैं. बीजेपी ने उन्हें श्रीनगर की ज़ादीबल विधानसभा सीट से टिकट दिया. नीलम गश का जन्म इसी जगह हुआ था, लेकिन उन्हें चुनाव प्रचार के लिए महज कुछ हफ्तों का ही वक्त मिला, जिस कर वह बस 316 वोट ही हासिल कर पाई.

हालांकि गश इससे परेशान नहीं हुईं. वह कहती हैं, 'इस तरह भारत में चुनाव लड़ने वाली वह पहली शिया मुस्लिम महिला बन गईं और उन्हें इस पर गर्व है.' इसके साथ ही वह कहती हैं, 'चाहे आर्टिकल 370 हो या कुछ और, पार्टी के रुख से मैं पूरी तरह सहमत हूं.'

जावेद कादरी

दक्षिण कश्मीर में स्थित शोपियां घाटी के सबसे संवेदनशील जगहों में एक माना जाता है. इलाके के दर्जनों युवा हाल के दिनों में चरमपंथ की तरफ बढ़ते दिखे. मुख्यधारा के सियासतदानों के लिए यहां जाना लगभग नामुमिकन माना जाता है. यहां पिछले कुछ महीनों के दौरान कई पार्टी कार्यकर्ताओं का अपहरण और हत्या के मामले सामने आ चुके हैं. आतंकियों के हालिया शिकार पुलवामा से आने वाले बीजेपी नेता सब्बीर अहमद रहे, जिन्हें बकरीद के मौके पर आतंकियों ने उनके घर के पास गोली मार दी.

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हालांकि इन आतंकी वारदातों का खौफ 34 साल के जावेद कादरी को डिगा नहीं पाया. पूर्व सरपंच और फल कारोबारी कादरी ने 2014 में बीजेपी ज्वाइन कर ली थी और पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लड़ा. हालांकि वह जीत नहीं पाए और उन्हें महज 3700 वोट मिले.

शोपियां से करीब पांच किलोमीटर दूर मुशवेरा गांव अपने सेब के बागान से घिरे अपने घर में News18 से बातचीत करते हुए कादरी कहते हैं, 'यहां कोई (सियासी नेता) नहीं है. मुझे पता नहीं पिछली बार कब कोई विधायक यहां आया था. इसलिए मैं लोगों की मदद कर रहा हूं.'

कादरी कहते हैं, 'आसपास के गांवों से भी लोग मुझसे रोजाना मिलने आते हैं. जब भी सेना किसी स्थानीय लड़के को गिरफ्तार करती है, या फिर उनके मोबाइल चोरी या झपटमारी होती है, तो मैं जाता हूं और उनकी मदद करता हूं.'

हालांकि यहां गौर करने वाली बात यह भी थी कि कादरी को भारी सुरक्षा मुहैया कराई गई है. वह कहते हैं कि वह बीजेपी के सिपाही हैं और पार्टी ने उनसे लोगों के बीच रहने को कहा है. वह कहते हैं, 'अगर कल को मैं मारा जाता हूं तो भी लोग में अच्छे कामों को तो याद रखेंगे.'

(साभार न्यूज18 के लिए आकाश हसन की रिपोर्ट)

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