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भारत की जनता जातिवाद और सांप्रदायिकता के बुखार से बाहर आए, तभी होगा बदलाव

हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य भारत को एक आधुनिक, औद्योगीकृत राज्य में बदलना होना चाहिए, जहां हमारे लोग उच्चतम जीवन स्तर का आनंद ले सकें.

Updated On: Nov 29, 2018 03:46 PM IST

Markandey Katju

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भारत की जनता जातिवाद और सांप्रदायिकता के बुखार से बाहर आए, तभी होगा बदलाव

भारत में 5 राज्यों के विधानसभाओं के लिए चुनाव हो रहे हैं और अगले साल मई में संसदीय चुनाव भी होंगे. इस बात पर अटकलें काफी तेज हैं कि जीत किसकी होगी, कांग्रेस की, बीजेपी की या अन्य पार्टियों की.

हालांकि, एक और अधिक महत्वपूर्ण सवाल है, जिस पर शायद ही कभी चर्चा की जाती है. सवाल यह है कि क्या संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था भारत के अनुकूल है. यदि नहीं, तो विकल्प क्या है और इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है?

मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि भारत में संसदीय लोकतंत्र, वर्तमान व्यवस्था और मौजूदा राज्य की स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती है, क्योंकि यह पूरी तरह से हमारे देश के लिए अनुपयुक्त हैं. चाहे बीजेपी जीते या कांग्रेस या कोई अन्य पार्टी, इससे हमारे लोगों के जीवन में कोई फर्क नहीं पड़ता. कैसे? मैं समझाता हूं.

तीन आवश्यकताएं

दिल्ली में हुए किसान आंदोलन के दौरान की एक तस्वीर

दिल्ली में हुए किसान आंदोलन के दौरान की एक तस्वीर

हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य भारत को एक आधुनिक, औद्योगीकृत राज्य में बदलना होना चाहिए, जहां हमारे लोग उच्चतम जीवन स्तर का आनंद ले सकें. ऐसे परिवर्तन के लिए हमें दो से तीन चीजों की आवश्यक होगी. जैसे, (1) हजारों बेहतरीन इंजीनियरों, तकनीशियनों, वैज्ञानिकों, प्रबंधकों, डॉक्टरों आदि के रूप में तकनीकी प्रतिभा का एक विशाल पूल (2) विशाल प्राकृतिक संसाधन (भारत, इंग्लैंड या जापान जैसा कोई छोटा देश नहीं बल्कि एक उपमहाद्वीप है).

हालांकि, एक तीसरी आवश्यकता भी है. यह है एकजुट लोगों द्वारा परिवर्तन के लिए संघर्ष, जो दुर्भाग्यवश नहीं दिखता. इस तीसरी आवश्यकता पर हमें ध्यान देना चाहिए.

दुर्भाग्यवश, संसदीय लोकतंत्र की जो व्यवस्था हमने अपनाई है, वह काफी हद तक जाति और सांप्रदायिक वोट बैंकों के आधार पर चलती है. जातिवाद और सांप्रदायिकता ऐसी सामंती ताकतें हैं, जो हमारे लोगों को बांट कर हमें पिछड़ा बनाए रखती हैं. अगर हम प्रगति चाहते हैं, तो उन्हें नष्ट किया जाना चाहिए. लेकिन संसदीय लोकतंत्र उन्हें आगे बढ़ाता है.

ऐतिहासिक रूप से, सभी महान परिवर्तन जनता के द्वारा हुए है. जनता ही इतिहास के असली निर्माता हैं. सभी महान आधुनिक क्रांतियां, ब्रिटिश (17वीं शताब्दी), अमेरिकी (1775 से 1781 तक), फ्रांसीसी (1798), रूसी (1917) और चीनी (जो 1949 में समाप्त हुई), जनता के द्वारा ही हुईं थीं.

जाति-धर्म में बंटी जनता से उम्मीद!

भारत में समस्या यह है कि जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के आधार पर बुरी तरह से बंटी भारतीय जनता पर हम भरोसा कैसे कर सकते हैं? हम उनसे बड़े कामों की उम्मीद कैसे कर सकते हैं, जब गरीबी, बेरोजगारी, बाल कुपोषण, स्वास्थ्य देखभाल की कमी, अच्छी शिक्षा की कमी जैसी समस्याओं को खत्म करने की जगह लोगों के लिए गोरक्षा, घर वापसी और राम मंदिर निर्माण के काम महत्वपूर्ण बन जाते हैं?

एक तरफ तो हमें अपने देश को महान ऐतिहासिक परिवर्तन के जरिए आधुनिक, वैज्ञानिक, बनाने के लिए भारतीय जनता पर भरोसा करना चाहिए, जबकि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था जातिवाद और सांप्रदायिकता की राजनीति से प्रेरित है.

ये विरोधाभास कैसे टूटेगा?

मेरे दिमाग में इसके लिए केवल एक ही तरीका है. हालांकि इस लक्ष्य को पाने के लिए काफी समय और धैर्य लगेगा.

शिक्षितों को शिक्षित करिए

सबसे पहले हमें अपने बुद्धिजीवियों के छोटे और आधुनिक सोच वाले वर्ग को समझाना चाहिए कि हमारा लक्ष्य एक ऐसे देश की स्थापना होनी चाहिए, जिसमें हमारे लोगों का जीवनस्तर उच्च हो. दूसरे शब्दों में, हमें पहले अपने देश के 'शिक्षितों' को शिक्षित करना होगा. बुद्धिजीवी समाज की आंखें हैं और बुद्धिजीवियों के बिना एक समाज अंधा है.

दुर्भाग्यवश आज भारत के तथाकथित 'बुद्धिजीवियों' (अकादमिक, लेखक, पत्रकार आदि) का अधिकांश हिस्सा असल में बौद्धिक है ही नहीं. वे अहंकार और किताबी ज्ञान से भरे हैं. लेकिन उनमें भी एक छोटी संख्या ऐसी है, जो ईमानदार, विनम्र और सीखने की वास्तविक इच्छा रखते हैं. हमें उन पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें शिक्षित करना चाहिए. क्योंकि वे आने वाले समय के नेता होंगे.

AYODHYA

हालांकि, महान ऐतिहासिक परिवर्तन जनता के काम हैं. इसलिए हमें तब तक धैर्यपूर्वक इंतजार करना होगा, जब तक जनता अपने अनुभवों से खुद अपने सही नेता को पहचान नहीं लेती है और उनके पीछे एकजुट नहीं हो जाती है. वर्तमान में भारत के अधिकांश आंदोलन या तो जातिवादी हैं, जैसे पटेल या जाट या दलित आन्दोलन या फिर राम मंदिर निर्माण जैसे सांप्रदायिक आंदोलन. किसान की समस्या जाति और धर्म से परे है. फिर भी किसान आंदोलन के पास कोई बौद्धिक नेता नहीं है. इसलिए किसान आंदोलन बार-बार असफल होने के लिए बाध्य है.

भूकंप का प्रभाव महसूस करने में थोड़ा समय लगता है, लेकिन इसकी गति के निर्माण में अनंत समय लगता है.

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