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उपचुनाव की हार से सबक नहीं सीख रहीं वसुंधरा, अपनों के ही निशाने पर 'सरकार'

विधानसभा में सबसे ज्यादा सवाल कानून व्यवस्था को लेकर उठ रहे हैं और सवाल उठाने वाले भी बीजेपी के ही विधायक हैं.

Mahendra Saini Updated On: Mar 01, 2018 08:41 AM IST

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उपचुनाव की हार से सबक नहीं सीख रहीं वसुंधरा, अपनों के ही निशाने पर 'सरकार'

राजस्थान में ये चुनावी साल है. इस साल के आखिर में वसुंधरा सरकार की अग्निपरीक्षा है. उपचुनावों के नतीजों ने वैसे ही पार्टी का जायका बिगाड़ दिया है.  तीन उपचुनाव में मिली सबसे बुरी हार के बाद माना जा रहा था कि शायद वसुंधरा राजे सरकार सबक लेगी. लेकिन मौजूदा बजट सत्र में विधानसभा के अंदर और बाहर सत्ता की जो शैली दिख रही है, वो कहीं से भी इसका आभास नहीं देती है. हालात ये हैं कि बीजेपी को अब अपनों के ही तीखे तीरों का सामना करना पड़ रहा है.

विधानसभा में सबसे ज्यादा सवाल कानून व्यवस्था को लेकर उठ रहे हैं. सवाल उठाने वाले भी बीजेपी के ही विधायक हैं. विधायकों का अपनी ही सरकार पर आरोप है कि पुलिस अपराध रोकने के बजाय घूस लेकर अपराधियों को संरक्षण दे रही है.

बीजेपी विधायक के संगीन आरोप

रामगढ़ से विधायक और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से खफा चल रहे ज्ञानदेव आहूजा ने अलवर एसपी राहुल प्रकाश पर घूस लेने के आरोप लगाए. विधानसभा में आहूजा ने कहा कि अलवर एसपी जिले के हर थाने से 15 लाख की मंथली लेकर अवैध खनन को खुली छूट दे रहे हैं.

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हालांकि एक विधायक के इतने सनसनीखेज आरोपों पर जांच का आदेश देने के बजाए गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने अलवर एसपी को फौरन क्लीन चिट दे दी. कटारिया ने कहा कि अलवर एसपी ने इस संवेदनशील जिले में अपराधों पर लगाम कसी है.

कटारिया के बयान सदन में भारी हंगामा हुआ. विपक्ष और सत्ता पक्ष के कई सदस्यों ने शेम-शेम के नारे लगाए. कांग्रेस व्हिप गोविंद सिंह डोटासरा ने सवाल उठाया कि 'जब गृहमंत्री जांच से पहले ही आरोपी को मेरिट सर्टिफिकेट बांट रहे हों तो फिर क्या उम्मीद की जा सकती है.'

अपनों ने ही दागे 'सरकार' पर तीखे सवाल 

ऐसा कम ही होता है जब विपक्ष नहीं बल्कि खुद सत्तापक्ष के विधायक अपने ही मंत्रियों से चुभते हुए सवाल पूछते हैं. वर्तमान बजट सत्र में सरकार को अपने ही विधायकों को मैनेज कर पाना मुश्किल हो गया है. कई बार तो बहस तीखे नोंकझोंक के स्तर तक पहुंच जाती है.

इसी सोमवार को जब ज्ञानदेव आहूजा सवाल पर सवाल दाग रहे थे तो गृहमंत्री ने उन्हे धीरे बोलने की हिदायत दे डाली. कटारिया ने कहा कि 'चिल्लाने से कुछ हासिल नहीं होगा.'

इस पर आहूजा ने भी तीखा जवाब देते हुए कहा कि 'सच की आवाज तेज होती है और वे मुंह पर साइलेंसर नहीं लगा सकते.'

साभार फेसबुक

साभार फेसबुक

अपने ही खोल रहे पुलिस की पोल गृहमंत्री के विभाग पर सवाल सदन में ही नहीं बल्कि सदन के बाहर भी खूब उठ रहे हैं. खुद पुलिसकर्मी ही अपने विभाग की पोल खोलते नजर आ रहे हैं. नागौर जिले के कुचेरा थाने में तैनात एएसआई मेहराम जाखड़ ने पुलिस महकमे का 'सच' उजागर कर दिया है.जाखड़ ने सोशल मीडिया पर छोड़े एक संदेश में लिखा कि कुचेरा एसएचओ महावीर मीना पुलिसकर्मियों को धमकाते हैं.

दरअसल पिछले दिनों  एक कांस्टेबल ने पुलिस उत्पीड़न से परेशान होकर पूरे परिवार समेत खुदकुशी कर ली. जिसके बाद एक वायरल संदेश में लिखा पाया गया कि मीना अपने अधीनस्थों को धमकाते हुए कहते हैं- 'मेरे डर से बंशीलाल मरा. मेरी पहुंच ऊपर तक है, एसपी तक मैं मंथली पहुंचाता हूं.'

लेकिन इस मामले को लेकर एसपी ने शिकायतकर्ता को ही सस्पेंड कर दिया. एसपी परिस देशमुख का तर्क है कि एएसआई ने उच्च अधिकारियों को सूचना दिए बिना सोशल मीडिया पर क्यों लिखा?

हालांकि दबाव बढ़ने पर पूरे मामले की जांच एससी/एसटी सेल के डिप्टी एसपी को सौंप दी गई है.

खनन माफिया के हौसले हैं बुलंद

पुलिसकर्मी अपने उच्चाधिकारियों से परेशान हैं तो खनन माफिया इतना बेखौफ है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले से भी नहीं चूक रहा है. 26 फरवरी को ही नागौर जिले के बड़ायली गांव के पास अवैध खनन को रोकने पहुंचे तहसीलदार पर हमला कर दिया गया. हमले में बीचबचाव करने आए तहसीलदार के ड्राइवर और स्टाफ बुरी तरह घायल हो गए.

अभी ऊंट पहाड़ के नीचे नहीं आया ! कानून व्यवस्था ही नहीं बल्कि नौकरियों को लेकर वादाखिलाफी का सिलसिला भी टूटने का नाम नहीं ले रहा है. 2013 विधानसभा चुनाव के घोषणा पत्र में 15 लाख नौकरियों का वादा करने के बाद 4 साल तक भर्तियों पर लगभग ताला लगा रहा. उपचुनावों में हार के बावजूद लगता है अभी ऊंट पूरी तरह पहाड़ के नीचे आ नहीं पाया है. हालांकि उपचुनाव में हार के बाद बजट में एक लाख नई नौकरियों की घोषणा की गई.

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लेकिन विधानसभा में ग्रामीण विकास और पंचायती राजमंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ ने कहा कि विद्यार्थी मित्रों को नौकरी देने का कभी वादा ही नहीं किया गया. अपने घोषणा पत्र में से पतली गली निकालते हुए राठौड़ ने कहा कि बीजेपी के वादे का वो मतलब नहीं था जो लोगों ने निकाल लिया. राठौड़ के मुताबिक बीजेपी ने विद्यार्थी मित्रों, संविदा शिक्षकों, अंशकालिक शिक्षकों और शिक्षा प्रबोधकों की समस्या का केवल समाधान करने की बात कही थी.

ये तो वही बात हुई जैसा कि काले धन को वापस लाकर हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए जमा करदेने के वादे को बाद में चुनावी जुमला बता दिया गया था. लोकतंत्र में ऐसे वादों और दावों से बचना चाहिए जिनसे दोबारा मुंह दिखाने में संकोच पैदा होने लगे.

राजस्थान में भले ही हर 5 साल में सत्ता परिवर्तन की परंपरा बन गई है. लेकिन इसी परंपरा के दूसरे राज्यों ने दिखाया है कि अगर सरकार काम करके दिखाती है तो जनता उसे बरकरार भी रखती है. मध्यप्रदेश और ओडिशा इसका सटीक उदाहरण है.

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नगरीय निकायों को नाकाम बनाने की साजिश राजे सरकार रीजनल एंड अरबन प्लानिंग बिल को लाने की तैयारी कर रही है. राजस्थान सरकार की इसे अध्यादेश के जरिए लागू किए जाने की पूरी तैयारी भी थी. लेकिन अटॉर्नी जनरल ने सरकार को तगड़ा झटका दे दिया. अटॉर्नी जनरल ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसे कानून को अध्यादेश के जरिए लाना खतरनाक साबित हो सकता है. हालांकि राज्य सरकार ने यहां भी चालाकी दिखाते हुए अटॉर्नी जनरल से सिर्फ ये पूछा था कि कोर्ट में चलते मामले के बीच राज्य सरकार ऐसा अध्यादेश लागू करे तो क्या कोई परेशानी आ सकती है?

दरअसल, मास्टर प्लान की पालना को लेकर राजस्थान सरकार को कई बार हाईकोर्ट की फटकार पड़ चुकी है. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के आदेश को सही मानते हुए राज्य सरकार को इसकी पालना के निर्देश दिए थे. लेकिन सरकार है कि इसकी पालना के बजाय बचने का नया रास्ता बना रही है.

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रीजनल एंड अरबन प्लानिंग बिल अगर लागू हो जाता है तो जयपुर, जोधपुर और अजमेर विकास प्राधिकरण, 15 यूआईटी और 191 नगरीय निकाय महज कठपुतली बन कर रह जाएंगे. राज्य सरकार के पास इनके संबंध में असीमित शक्तियां आ जाएंगी. इन शक्तियों के सहारे सरकार सीधे निकायों में दखल दे सकेगी. हालांकि निकायों में अभी भी बड़े बदलाव सरकार के स्तर पर ही होते हैं. लेकिन इसके लिए प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव मंगाए जाते हैं. इसमें कई बार कोई न कोई आपत्ति लग जाती है, जिससे मनमर्जी नहीं चल पाती. लेकिन इस बिल के लागू होने से प्रस्ताव मंगाने या भेजने की जरूरत नहीं रहेगी और सरकार जब चाहेगी तब मास्टर प्लान में बदलाव कर सकेगी.

बड़ा सवाल ये है कि जब विधानसभा चुनाव में  8-9 महीने से भी कम वक्त बचा है, तब भी सरकार ऐसे घातक फैसले क्यों कर रही है. पिछले दिनों भ्रष्ट लोकसेवकों को बचाने वाले कानून पर भी राजे सरकार अंगद के पांव की तरह अड़ गई थी. हालांकि बीजेपी के ही विधायक घनश्याम तिवाड़ी के तंज के बाद ही ये बिल वापस लेने की घोषणा की गई. तिवाड़ी ने कहा था कि समय की कमी की वजह से ये कानून लागू तो हो नहीं पाएगा, ऐसे में सरकार बुराई का ठीकरा भी क्यों लेने पर तुली है. यही बात रीजनल एंड अरबन प्लानिंग बिल पर भी लागू होती है. इसमें भी बीजेपी के हिस्से वही आएगा जैसी कहावत है- खाया पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना.

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