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राजस्थान में बीजेपी घोषणा पत्र: लाखों नौकरियों के वादे के बाद क्या बेरोजगार अब चिंता छोड़ दें?

राजनेताओं को समझ लेना चाहिए कि वोट तभी मिल सकता है जब युवा काम पर लगा हो, किसान खेत में जुटा हो और दुकानदार धंधे में बिजी हो.

Updated On: Nov 28, 2018 08:20 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान में बीजेपी घोषणा पत्र: लाखों नौकरियों के वादे के बाद क्या बेरोजगार अब चिंता छोड़ दें?

राजस्थान में अगले शुक्रवार को सबसे बड़े फैसले यानी चुनाव का दिन है. सत्ता में बने रहने और इसे हासिल करने की जंग पूरे चरम पर है. लिहाजा फैसला सुनाने वाले यानी वोटर्स को लुभाने के लिए भी सारे दांव-पेंच आजमाए जा रहे हैं. कांग्रेस से पहले टिकटों की घोषणा करने के बाद बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र को जारी करने में भी देश की सबसे पुरानी पार्टी से बाजी मार ली है. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इसे यूं बयां भी कर रही हैं कि जो पार्टी चुनाव से पहले ही इतनी ढीली है, वो सत्ता में आ गई तो विकास कितना सुस्त कर देगी?

घोषणा पत्र को पहले जारी करने में राजे अपनी पीठ ऐसे थपथपा रही हैं जैसे पिछले 5 साल में राज्य के विकास में चार चांद लग गए हों. या फिर ऐसे कि जैसे पिछले घोषणा पत्र के सारे वादे पूरे कर दिए गए हों. कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष की मानें तो ये घोषणा पत्र पिछले वाले से भी वाहियात और जुमलों से भरा कागज का टुकड़ा मात्र है. खैर, सही-गलत और चुस्ती-सुस्ती का फैसला तो जनता कर ही देगी जब उम्मीदवार सात दिसंबर को सच का सामना करेंगे. फिलहाल हम बीजेपी के घोषणा पत्र का विश्लेषण करते हैं.

घोषणा पत्र से फूटेगा मन में लड्डू?

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तस्वीर वसुंधरा राजे की फेसबुक वॉल से साभार

राजस्थान गौरव संकल्प नाम से जारी बीजेपी के घोषणा पत्र में सभी वर्गों को कुछ न कुछ लुभाने की कोशिश की गई है. बेरोजगारों से लेकर दुकानदारों तक और किसानों से लेकर साधु-संतों तक, कोई वर्ग नहीं छोड़ा गया है जिसके लिए कुछ न कुछ न रखा गया हो. ऐसा लग रहा है कि इसबार बीजेपी की सरकार बन गई तो शायद वास्तव में राम राज्य आ ही जाए.

इसमें कई बातें अनोखी भी हैं. सबसे बड़ी तो बेरोजगारों के लिए हैं. बीजेपी ने 50 लाख से ज्यादा नौकरियां देने की बात कही है. साथ ही, बेरोजगारों को 5 हजार रुपये महीने का भत्ता भी. ये दोनों बातें परस्पर विरोधी लगती हैं. एकतरफ बंपर नौकरियों की बात की जा रही है तो दूसरी तरफ बेरोजगारों को सहायता राशि का वादा भी. सेना भर्ती आयोजित होने से 3 महीने पहले हर उपखंड में बेरोजगारों के लिए ट्रेनिंग कैंप्स की घोषणा भी की गई है. (सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ अपने संसदीय क्षेत्र में ऐसा पहले से करवा रहे हैं और इसके अच्छे नतीजे भी मिले हैं)

किसानों का मुद्दा बीते कुछ साल में सबसे बड़ा मुद्दा बनके उभरा है. राजे सरकार ने अभी सितंबर में ही 29 लाख किसानों के 50 हजार तक के लोन माफ किए हैं. अब 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का वादा किया गया है. इसके लिए एमएसपी को लागत से डेढ़ गुना करने और इस प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बनाने की बात कही गई है. 250 करोड़ के कृषि पर केंद्रित ग्रामीण स्टार्ट-अप फंड का वादा भी किया गया है.

हर जिले में योग भवन का निर्माण और गोरखनाथ पर सिलेबस में पाठ से लेकर स्मारक बनाने तक का वादा किया गया है. ब्राह्मणों को लुभाने के लिए परशुराम बोर्ड का ऐलान किया गया है. घुमंतू जाति बोर्ड, सिलाई कला बोर्ड, स्वर्ण कला बोर्ड, असंगठित श्रमिक कल्याण बोर्ड और न जाने कितने बोर्डों की घोषणा भी इसमें है. भारत माला परियोजना की तर्ज पर हर जिले को 4 लेन के हाईवे से जोड़ने की राजस्थान माला योजना का वादा किया गया है.

पिछले घोषणा पत्र की हकीकत क्या है?

पिछले घोषणा पत्र की 665 में से 630 घोषणाओं को पूरा करने का दावा किया गया है. राजे ने कहा है कि सवा दो लाख युवाओं को नौकरी दे दी गई है. हालांकि पिछले घोषणा पत्र में दावा 15 लाख नौकरियों का किया गया था. लेकिन बाद में कहा गया कि हमने तो 15 लाख लोगों का कौशल विकास कर उन्हे नौकरी के लायक बनाने की बात कही थी. जिन सवा दो लाख लोगों को नौकरी का दावा किया जा रहा है, उसमें भी पेच हैं. इस सरकार में शुरू हुई कई भर्तियां तो अभी तक रेंग रही हैं मसलन, 2014 की कॉलेज लेक्चरार भर्ती या 2015 की पटवारी भर्ती या फिर 2016 की आरएएस परीक्षा को ही देख लीजिए.

राजस्थान में बीजेपी को सबसे ज्यादा खतरा बेरोजगारों के गुस्से का ही सता रहा है. कागजों की बात छोड़ दें तो ग्राउंड लेवल पर वास्तव में वैसा कुछ नहीं हुआ जैसा 2013 में युवाओं ने उम्मीदें लगाई थी. शायद इसीलिए इसबार कहा गया है कि हर साल कम से कम 30 हजार सरकारी नौकरियां ऐसी निकाली जाएंगी जिनकी प्रक्रिया उसी साल पूरी हो जाएगी.

7 मेडिकल कॉलेज खोलने का दावा किया गया है. लेकिन हकीकत ये है कि ये सिर्फ कागजों में ही हैं. न इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप किया गया है और न ही पढ़ने-पढ़ाने की व्यवस्था. हालात ये रहे कि श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए 100 करोड़ देने वाले दानदाता ने सरकारी सुस्ती और लालफीताशाही को देखते हुए अपना दान दिया हुआ चेक भी वापस मांग लिया था.

साढ़े चार साल तक सत्ता में गुजारने के बावजूद किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए विशेष कुछ नहीं किया गया. इनके 50 हजार तक के लोन भी तब माफ किए गए जब किसानों ने लामबंद होकर शेखावाटी में आंदोलन छेड़ दिया. ईस्टर्न राजस्थान कैनाल परियोजना अभी तक कागजों में चल रही है. यमुना लिंक नहर योजना के विस्तारीकरण का सिर्फ सपना ही दिखाया जा सका. मसाला पार्क, मेगा फूड पार्क और कृषि क्षेत्र में करोड़ों के निवेश और लाखों रोजगार के दावे भी GRAM (ग्लोबल राजस्थान एग्रीकल्चर मीट) के आयोजनों से बाहर धरातल पर नहीं आ सके.

जिस रिसर्जेंट राजस्थान-2015 के आयोजन पर ही सरकार ने कई करोड़ रुपए खर्च कर दिए, उसका नतीजा भी सिफर ही दिख रहा है. रिसर्जेंट राजस्थान में 3.90 लाख करोड़ के MoU होने और राजस्थान के औद्योगिक प्रदेश बन जाने के अलावा लाखों रोजगारों का दावा किया गया था. लेकिन हकीकत में इसका 10 फीसदी भी होता नजर नहीं आया है.

नेता का काम वादे करना, जनता का भूलना है!

राजनीतिक गलियारों में माना जाता है कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है. कुछ साल पहले (2013) तब के केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने यूपीए-II के घोटालों पर एक सवाल के जवाब में कहा था- जनता बहुत जल्द भूल जाएगी कि लाखों करोड़ के 2जी या कोयला घोटाले हुए भी थे. शायद कुछ ऐसा ही राजस्थान की राजे सरकार भी मानती है. तभी तो उन्होने पिछले घोषणा पत्र के बारे में कह दिया कि 80% से ज्यादा वादे उन्होने पूरे कर दिए हैं.

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केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस घोषणा पत्र को राजस्थान के विकास का रोड मैप करार दिया है. जबकि कांग्रेस ने इसे झूठ का पुलिंदा बताते राजे को 80% से ज्यादा घोषणाएं पूरी किए जाने पर बहस की चुनौती भी दे डाली है.

बहरहाल, नौकरियों के हालात बेरोजगारों के बीच होती चर्चा से साफ हो जाते हैं. चर्चा के मुताबिक बाकी देश में चयन प्रक्रिया के 3 चरण होते हैं- प्री, मेंस और इंटरव्यू लेकिन राजस्थान में चौथा चरण कोर्ट प्रक्रिया का भी जुड़ जाता है. बीते 5 साल में एक भी भर्ती ऐसी नहीं रही जो कोर्ट केस में न उलझी हो. राज्य में हर साल करीब 8 लाख नए युवा नौकरी के बाज़ार में दस्तक देते हैं. बेरोजगारों को और ज्यादा मौके देने के लिए इसी साल अधिकतम उम्रसीमा बढ़ाकर 40 साल की गई है.

लेकिन राजनेताओं को समझ लेना चाहिए कि वोट तभी मिल सकता है जब युवा काम पर लगा हो, किसान खेत में जुटा हो और दुकानदार धंधे में बिजी हो. फिलहाल तो राजस्थान में तीनों ही खाली नजर आते हैं. ऐसे में उम्मीद जगाकर क्या वोट की उम्मीद की जा सकती है ?

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