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क्या बीजेपी राहुल गांधी को ताकतवर बना रही है?

राहुल गांधी अभी भी अनुभवहीन हैं लेकिन बीजेपी नेताओं ने जिस तरह उनके भाषण पर पलटवार किया है इससे उनका सियासी कद बढ़ा है

Bikram Vohra Updated On: Sep 16, 2017 06:03 PM IST

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क्या बीजेपी राहुल गांधी को ताकतवर बना रही है?

बीते मंगलवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बर्कले, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में युवा छात्रों के बीच भाषण दिया. लेकिन राहुल गांधी के इस भाषण पर जिस तरीके से बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने पलटवार किया वो समझ से परे है. क्योंकि 2014 के चुनावों में जिस कांग्रेस को जनता ने पूरी तरह नकार दिया था उसके उपाध्यक्ष के एक भाषण पर ऐसा पलटवार कर, सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी ने इसे फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

अरुण जेटली और स्मृति ईरानी जैसे नेता राहुल गांधी के भाषण पर इस कदर प्रतिक्रिया दे रहे हैं मानों उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के जनरल बॉडी में देश की नीतियों से संबंधित कोई महत्वपूर्ण बयान दे दिया हो. या फिर सत्तारुढ़ सरकार के विशेषाधिकारों को दबाने का प्रयास किया हो.

अपनी दादी और पिता के मुकाबले राहुल गांधी में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने की काबिलियत अभी भी नहीं आई है. राजीव गांधी ने इस हुनर को बहुत हद तक सीखा था क्योंकि व्हाइट हाउस प्रेस कॉर्प्स और फिर जेनेवा के आईएलओ में दिए गए उनके भाषण का जिक्र आज भी होता है.

हालांकि राहुल गांधी अभी भी अनुभवहीन हैं. लेकिन बीजेपी नेताओं ने जिस तरह उनके भाषण पर पलटवार किया है इससे उनका सियासी कद बढ़ा है. क्योंकि अवमानना की शक्ति को समझने में बीजेपी फिलहाल असमर्थ है. लेकिन अवमानना न सिर्फ बदला बल्कि विनाश का सूक्ष्म रूप होता है. हमने कांग्रेस का मनोबल धाराशायी देखा है.

बीजेपी द्वारा बेमतलब की आलोचना से चर्चा में बने हैं राहुल

लेकिन जब पार्टी को पूरी तरह से केंद्रीय चर्चा से बाहर होना चाहिए था, बावजूद इसके इस सप्ताह पार्टी ने कम से कम राष्ट्रीय परिदृश्य पर न्यूनतम वापसी कर ली है. और ऐसा सिर्फ एनएसयूआई की चुनावी जीत की वजह से ही नहीं हुआ. बल्कि किसी मच्छर को मारने के लिए तोप का इस्तेमाल करने की घबराहट जैसी स्थिति का भी ये नतीजा है.

राहुल गांधी के भाषण को पसंद या फिर उसकी आलोचना करने का कोई औचित्य नहीं है. सियासत में वंशवाद पर राहुल गांधी के बयान की आलोचना कर बीजेपी नेतृत्व ने दरअसल ये फिर से साबित कर दिया है कि गांधी खानदान से इतर उनकी राजनीतिक सोच आगे नहीं बढ़ पा रही है. पब्लिसिटी की मंशा से ही सही, लगातार उनके बयानों का मजाक बना कर बीजेपी नेता असल में उन्हें लोगों की चर्चा के बीच जिंदा रखने का काम कर रहे हैं.

Rahul inaugurates Indira Canteen

अनजाने में ही सही, वो कांग्रेस उपाध्यक्ष को इस कदर मजबूत कर रहे हैं कि राहुल अब प्रधानमंत्री पद की दावेदारी तक ठोंकने लगे हैं. आप चाहे जितना हंस लें, लेकिन बीजेपी अगर लगातार ऐसा ही करती रही तो सियासत में उपेक्षित के प्रति प्रेम पनपने में देर भी नहीं लगेगा.

बदलती हुई स्थितियों को कोई भी समझ सकता है कि एक ऐसे व्यक्ति के लिए सहिष्णुता अब बढ़ती जा रही है जिसका मजाक कभी एक वर्ग ने जोकर कह कर उड़ाया था.

राहुल गांधी के पिता एक पायलट थे जो अपनी सरकार किचन कैबिनेट के जरिए चलाया करते थे. वो कभी चाइनीज डिनर पर तो कभी देहरादून विमान उड़ा कर जाया करते थे. सत्ता के शुरुआती दिनों में उनकी भी खूब आलोचना हुई कि उन्हें देश की समस्याओं का इल्म तक नहीं है. लेकिन धीरे-धीरे वो सियासत की बारीकियों को सीखते गए. और दूसरी बार में वो बतौर एक मजबूत नेता बन कर उभरे.

अंडरडॉग बन सकता है शिकारी

ये कोई नहीं कह रहा कि राहुल गांधी एक पावरहाउस हैं. बावजूद बीजेपी उनके पैवलोवियन कंडीशनिंग को लेकर प्रतिक्रिया देने से खुद को रोक नहीं पाती है.

अक्सर पार्टी इस कदर उत्तेजनापूर्ण आलोचना में जुट जाती है जैसे कि इंदिरा गांधी ऊपर से अवतरित होकर उनके सारे सवालों का जवाब देने आएंगी. यही वजह है कि एक ऐसे भाषण पर जिसकी कोई राजनीतिक अहमियत नहीं है उस पर बेवकूफाना पलटवार करना कहीं से उचित नहीं ठहराया जा सकता है. साफ है कि पुराना हैंगओवर अभी बना हुआ है और बनावट में यह वंशवादी है.

कांग्रेस अध्यक्ष का भाषण अच्छा और किसी को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं था. और तो और उनके भाषण में खुद की आलोचना करने का ह्यूमर भी शामिल था. तो फिर विरासत की सियासत को लेकर इतना हो हल्ला क्यों? मौजूदा परिस्थितियों में आखिर इसे थोड़ी भी प्राथमिकता देने का प्रश्न क्यों उठता है. उन्होंने वो बातें रखीं जो वो सोचते हैं. उन्होंने देश का अपमान नहीं किया. फिर इसे लेकर इतनी तीक्ष्ण प्रतिक्रिया क्यों?

यह भी पढ़ें: बर्कले में राहुल गांधी के तेवर कांग्रेस के अच्छे दिनों की आस दिखाते हैं

ऐसा नजर आता है कि राहुल सियासी चालाकी सीख रहे हैं. पिछले तीन वर्षों के बेहद प्रतिकूल सियासी परिस्थितियों के बीच उन्होंने खुद का बचाव किया है. तो मजाक का पात्र बनने से लेकर अब वो सियासी पलटवार भी करने लगे हैं.

कुछ दिनों पहले यह बयान देना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास कंप्यूटर पर बैठे 100 लोग ऐसे हैं जिनका काम सिर्फ उनकी छवि को खराब करना है. निश्चित तौर ये बढ़ा चढ़ा कर की गई टिप्पणी थी.

लेकिन जिन्हें लोग सोशल मीडिया पर पप्पू के नाम से पुकारते हैं उन पर ये मास्टर स्ट्रोक था क्योंकि इस बयान का मजबूती से खंडन भी नहीं किया गया. और राहुल के लिए खुद को मजाक का पात्र बना कर पेश करना उनके हितों को साधता दिखता तो इसका सियासी संदेश भी लोगों तक पहुंचा.

ये समय बीजेपी के तरीकों में बदलाव का है. पार्टी को भविष्य की इबारत पर लिखे गए शब्दों को पढ़ने की काबिलियत सीखनी होगी. कहीं ऐसा तो नहीं कि पार्टी जाने अनजाने में सियासत के अंडरडॉग को शिकारी बनने का मौका दे रही हो?

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