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193 सीटों के एलान के बावजूद इंदौर पर सस्पेंस , महू पर बीजेपी का मंथन जारी

मध्यप्रदेश में अब उम्मीदवारों की लोकप्रियता पर सोशल इंजीनियरिंग भारी पड़ रही है और यही वजह है कि इंदौर जैसे शहर में 9 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम की घोषणा में इतना मंथन हो रहा है

Updated On: Nov 06, 2018 03:56 PM IST

FP Staff

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193 सीटों के एलान के बावजूद इंदौर पर सस्पेंस , महू पर बीजेपी का मंथन जारी
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मध्यप्रदेश की सियासत में मालवा अंचल की बड़ी भूमिका है. मालवा में इंदौर की सियासी अहमियत है. इंदौर में विधानसभा की 9 सीटें हैं. केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के दो चर्चित चेहरे इंदौर की नुमाइंदगी करते हैं. लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन और बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय. मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में इन दौनों की हैसियत और दखल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 193 टिकटों के ऐलान के बावजूद इंदौर की सीटों पर बीजेपी अंतिम निर्णय नहीं ले सकी थी. इसकी बड़ी वजह ये है कि सुमित्रा महाजन और कैलाश विजयवर्गीय अपनी सुरक्षित माने जाने वाली सीटों पर बेटों को खड़ा करना चाहते हैं.

KAILASH

कैलाश विजयवर्गीय

अपने बेटों को राजनीतिक विरासत सौंपने के लिए कैलाश विजयवर्गीय इंदौर की 2 नंबर की सीट को सबसे सुरक्षित मानते हैं. वो यहीं से अपने बेटे आकाश विजयवर्गीय को टिकट दिलाना चाहते हैं. कहा तो ये तक जा रहा है कि अपने बेटे को टिकट दिलाने के लिए कैलाश विजयवर्गीय अपनी दावेदारी तक छोड़ने को तैयार हैं. जबकि कैलाश विजयवर्गीय के करीबी माने जाने वाले  रमेश मेंदोला यहां से विधायक हैं. बड़ी संभावना है कि रमेश मेंदोला को ब्राह्मण उम्मीदवार होने की वजह से ब्राह्मण बहुल इंदौर की 3 नंबर सीट से चुनाव लड़ाया जा सकता है.

महू की सीट से कैलाश विजयवर्गीय लगातार जीतते आए हैं. इस बार फिर कांग्रेस ने महू सीट से अंतर सिंह दरबार को अपना उम्मीदवार घोषित किया है. हालांकि दरबार पिछला चुनाव यहां से हार गए थे. कैलाश विजयवर्गीय ने दरबार को 12 हजार 76 वोटों से हराया था. इसके पहले भी वो साल 2008 में यहां से कैलाश विजयवर्गीय के हाथों हार चुके थे. जबकि इससे पहले 2008 में भी भाजपा के कैलश विजयवर्गीय ने अंतरसिंह दरबार को 9700 वोट से पराजित किया था.

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दो बार की हार के बावजूद कांग्रेस को अंतरसिंह दरबार के मुकाबले कोई दूसरा उम्मीदवार नहीं दिखा. दरअसल पिछले चुनाव में हार का अंतर ज्यादा बड़ा नहीं था. वहीं चुनाव हारने के बावजूद अंतर सिंह दरबार ने आम जनता के बीच जनसंपर्क को कम नहीं किया.  इस बार कांग्रेस को राहुल गांधी के रोड शो और रैलियों से उम्मीद है कि मालवा में वोटरों का मिजाज स्विंग कर सकता है. ऐसे में बीजेपी भी यही चाहेगी कि महू की सीट से दो बार विधायक रह चुके कैलाश विजयवर्गीय ही तीसरी बार भी अंतर सिंह दरबार को चुनौती दें. हालांकि कैलाश विजयवर्गीय 1990 से इंदौर की अलग अलग सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन साल 2008 से उन्होंने महू सीट को ही अपनी कर्मस्थली और रणक्षेत्र की तरह विकसित किया है. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर महू के मायाजाल पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कौन सा मंतर फूंकेंगे क्योंकि सवाल यहां टिकटों की दावेदारी का है. सुमित्रा महाजन भी अपने बेटे मंदार महाजन के लिए इंदौर की तीन नंबर सीट से टिकट मांग रही हैं.

Ghaziabad: A bike set on fire by a group of protesters during 'Bharat Bandh' call given by Dalit organisations against the alleged dilution of Scheduled Castes / Scheduled Tribes Act, in Ghaziabad on Monday. PTI Photo (PTI4_2_2018_000026B)

बड़ा सवाल ये भी है कि क्या इंदौर में सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला टिकटों के दावेदारों के आड़े आ रहा है. दरअसल मैदान में सपाक्स, जयश जैसे जातिवादी संगठनों के उतरने से मध्यप्रदेश विधानसभा में चुनावी समीकरण बदल चुके हैं. अब हर विधानसभा क्षेत्र में उम्मीदवार की लोकप्रियता से ज्यादा वोटर के जातिगणित पर जोर दिया जा रहा है. उम्मीदवार की लोकप्रियता के पैमाने का साथ उसके विधानसभा क्षेत्र में समुदाय या जाति वर्ग के लोगों का समर्थन भी देखा जा रहा है. आरक्षण का विरोध कर रही अगड़ी जातियां और सवर्णों ने पहले से ही बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. राज्य में एससी-एसटी एक्ट पर पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले और बाद में संसद में संशोधन के खिलाफ राज्य में जाति की राजनीति गरमा गई है. यहां तक कि अब गुजरात और राजस्थान की तरह ही मध्यप्रदेश में भी पाटीदार और राजपूत नेता टिकट न मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़ने की धमकी दे रहे हैं.

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