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2019 में मोदी वाली बीजेपी के खिलाफ कैसे बनेगा महागठबंधन?

सच्चाई अब यही है कि बीजेपी कांग्रेस को बहुत पीछे छोड़ भारत में सबसे अहम पार्टी बन चली है

Ambikanand Sahay Updated On: Apr 08, 2017 07:34 AM IST

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2019 में मोदी वाली बीजेपी के खिलाफ कैसे बनेगा महागठबंधन?

ज्यादा दिन नहीं हुए ‘कॉमन नॉनसेंस’ नाम की मशहूर किताब को छपे हुए. इसके लेखक हैं जाने-माने अमेरिकी पत्रकार एंडी रूनी.

रूनी ने एक दिलचस्प बात कही है कि जब आपको लगे कि किसी बात को सही-सही पकड़ पाने के आसार 50 फीसद हैं और 50 फीसद ही संभावना है कि उस बात को ठीक-ठीक समझने से आप चूक जाएंगे तो ऐसे हालात में 90 फीसद आसार होते हैं कि आप जिसे तीतर समझ रहे हैं वह बटेर निकले. यानी आप बात को एकदम ही गलत समझें. रुनी इसे ‘फिफ्टी-फिफ्टी-नाइंटिन’ का नियम कहते हैं.

दरअसल रूनी का यह नियम हिंदुस्तान में नए सिरे से मौजूं हो उठा है क्योंकि लोग-बाग फिलहाल अक्सर यह अटकल लगाते दिख पड़ते हैं कि क्या सेक्युलर ‘महागठबंधन’( विपक्षी पार्टियों का महागठजोड़ ) 2019 के चुनावों में मोदी-योगी की जोड़ी को हरा पाएगा?

यह अटकल एक सीधे-सादे गणित के आधार पर लगाई जाती है. ये गणित है कि समाजवादी पार्टी (21.8 फीसद), बहुजन समाज पार्टी (22.2 प्रतिशत) और कांग्रेस (6.2 प्रतिशत) के वोट-शेयर को आपस में मिला दें तो यह 2017 के यूपी के चुनावों में बीजेपी को मिले 39.7 फीसद वोटों से ज्यादा बैठता है.

महागठबंधन होता तो, कुछ और होती तस्वीर

कल्पना के लिए ही सही अगर यह मान लें कि एसपी, बीएसपी और कांग्रेस ने एक महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा होता तो इस महागठबंधन को 313 सीटों पर जीत हासिल होती और भगवा-खेमे को बस 90 सीटें मिलती! लेकिन ऐसा नहीं हुआ और हम सब खूब जानते हैं कि आखिर ऐसा क्यों ना हो सका.

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वोटों के गणित की इसी संभावना की पूंछ पकड़कर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस हफ्ते की शुरुआत में कांग्रेस और वामदलों से कहा कि वे बीजेपी-विरोधी मोर्चा बनाने के लिए आगे आएं.

इसी से मिलते-जुलते भाव लालू यादव के भी थे जिन्होंने राहुल गांधी, शरद पवार, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और कुछ अन्य नेताओं को टैग करते हुए एक ट्वीट किया.

लेकिन वोटों के अंकगणित में जो मुमकिन दिख रहा है वह सियासी जमीन पर कई वजहों से नामुमकिन भी हो सकता है. सवाल उठेगा कि वह महाबली कौन है जिसके नेतृत्व में एक-दूसरे की विरोधी पार्टियां बीजेपी के खिलाफ एक मंच पर आएं.

दूसरे, इन पार्टियों के पास कोई वाजिब और जरुरी संदेश होना चाहिए, ऐसा संदेश जो लोगों के दिलों-दिमाग में उतरे. और इस सिलसिले की तीसरी बात यह कि जिस पार्टी के खिलाफ आप मोर्चा खोलना चाहते हैं वह अपने नेता के करिश्माई ताकत पर निर्भर होनी चाहिए. एक बार उस नेता के छवि का फूला हुआ गुब्बारा फूटा कि पार्टी का भविष्य जमीन पर लोटता नजर आयेगा.

यहां इस बात की दो मिसाल दी जा सकती है:

पहली मिसाल 1974 से 1977 के वक्त की है जब तत्कालीन जनसंघ, ज्योति बसु की सीपीआई(एम) और अलग-अलग झोले-झंडे वाली समाजवादी पार्टियां जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में अपने साझे सियासी शत्रु इंदिरा गांधी को हराने के लिए एकजुट हुई थीं.

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और ये पार्टियां सचमुच इंदिरा गांधी को राजसिंहासन से बेदखल करने में कामयाब रहीं. लेकिन इन पार्टियां का खूब सुलझा हुआ और बखूबी प्रचारित संपूर्ण क्रांति का मकसद बेमौत मरा और उसका कोई नामलेवा ना रहा. इंदिरा गांधी ढाई साल के भीतर फिर से राजसिंहासन पर सवार हो गईं.

दूसरी मिसाल उस वक्त की ली जा सकती है जब बोफोर्स तोप और एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी के सौदे की दलाली की बात सामने आने पर सारा देश आंदोलित हो उठा था. उस वक्त बीजेपी और वामदल समेत कई पार्टियों के बीच सहमति बनी और ये पार्टियां राजा मांडा कहलाने वाले वीपी सिंह को समर्थन देने के लिए एकजुट हुईं.

वीपी सिंह ने उस वक्त अपने बगावती तेवर में राजीव गांधी और कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोला था. वीपी सिंह सियासत के मैदान के कोई महाबली नहीं थे लेकिन उन्हें गैर-कांग्रेसवाद के एक चमकदार प्रतीक के रुप में हाथों-हाथ लिया गया.

विपक्षी दलों ने राजा मांडा कहलाने वाले वीपी सिंह के समर्थन में एक पल की देर नहीं लगाई और 1989 में केंद्र की सत्ता से कांग्रेस को बेदखल करने की इनकी कोशिश कामयाब हुई. लेकिन यह कामयाबी भी ज्यादा दिनों तक नहीं टिकी. दो साल के भीतर ही कांग्रेस फिर से सत्ता में आ गई.

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आइए, अब जरा आज की तस्वीर पर गौर करें:

फिलहाल ऐसा कोई नेता नहीं दिख रहा जो बिखरे पड़े तमाम विपक्षी दलों को एकसाथ ला सके. बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव का साथ बड़ा डांवाडोल जान पड़ता है. यूपी में बीएसपी और एसपी के बीच छत्तीस के आंकड़े का रिश्ता बदस्तूर जारी है.

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ओडिशा में नवीन पटनायक अपने दल में ही एक मुश्किल हालत का सामना कर रहे हैं. महाराष्ट्र में शरद पवार पर बुढ़ापा हावी है, ऐसा लगता है मानो उनका वक्त बीत गया हो. और पश्चिम बंगाल में सियासत के व्यावहारिक तकाजों से ममता बनर्जी की वामदलों से दूरी बदस्तूर कायम है. और इन सबसे अहम बात यह कि कांग्रेस का खेमा अपना आत्मबल इतना गंवा चुका है कि एकबारगी इस गिरावट पर यकीन करना मुश्किल है.

पार्टियों का फूट है जिम्मेदार

विपक्ष की सियासत के ऐतबार से देखें तो राजनीति के रणक्षेत्र यूपी में हालत और भी ज्यादा पतली दिखती है. वहां चुनावों के बाद मुलायम सिंह यादव अपने बेटे अखिलेश पर आरोप लगा रहे हैं कि तुमने मेरा अपमान किया.

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात पर हामी भरते हुए कहा, 'यह बात सही है कि जो बाप का नहीं हुआ वो किसी का नहीं हो सकता.' जाहिर है, नेताजी कहलाने वाले मुलायम सिंह यादव गहरी पीड़ा में हैं.

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उनके भाई शिवपाल यादव और बहू अपर्णा यादव ने लगे हाथ लखनऊ में योगी आदित्यनाथ से भेंट-मुलाकात का सिलसिला चला लिया. लखनऊ में अफवाह गर्म है कि ये दोनों यूपी के नए मुख्यमंत्री से अपने रिश्ते बनाने पर लगे हैं. या यह भी हो सकता है कि दोनों बीजेपी में जाना चाहते हों. आगे ये मुलाकातें क्या गुल खिलाने वाली हैं, यह बात पक्के तौर पर कोई नहीं कह सकता.

बीजेपी ही है अहम पार्टी

अब जरा इस तस्वीर की तुलना बीजेपी के बढ़ते हुए फलक से कीजिए और नजर दौड़ाइए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अलग-अलग शाखाएं नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के साथ कैसी बेहतरीन तालमेल से काम कर रही हैं.

MODI National Executive meeting

कार्यकर्ताओं के दम पर सत्ताधारी दल अरबी घोड़े की तरह अपनी राह पर सरपट दौड़ता चला जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि सोने पर सुहागा का काम कर रही है.

बेशक इंदिरा गांधी और नरेन्द्र मोदी के काम करने की शैली में बहुत कुछ समानता है लेकिन दोनों अलग-अलग हस्ती हैं.

इंदिरा गांधी ने अपने पार्टी का दबदबा तोड़ा, दबदबा बनाने वाले पार्टी के ढांचे को ढहा दिया, जबकि मोदी और शाह की जोड़ी पूरे देश में पार्टी की मशीनरी का विस्तार कर रही है, उसे और मजबूत बना रही है.

चाहे कोई पसंद करे या नापसंद लेकिन सच्चाई अब यही है कि बीजेपी कांग्रेस को बहुत पीछे छोड़ भारत में सबसे अहम पार्टी बन चली है और महागठबंधन का भविष्य बड़ा बेरंग और उजाड़ जान पड़ता है- अब से पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बेरंग और उदास.

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