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योगी के बाद बीजेपी का नया जातीय गणित

 योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद कैसे बदलेगा बीजेपी के भीतर का समीकरण ?

Amitesh Amitesh Updated On: Mar 20, 2017 03:35 PM IST

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योगी के बाद बीजेपी का नया जातीय गणित

यूपी की गद्दी पर योगी के विराजमान होने के बाद भले ही सीएम पर कयासबाजी खत्म हो गई लेकिन एक चर्चा जरूर शुरू हो गई है. चर्चा है यूपी के भीतर बीजेपी के सियासी समीकरण को लेकर. योगी की ताजपोशी ने बीजेपी के भीतर के सियासी समीकरण को बदल कर रख दिया है.

योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला भी सियासी और सामाजिक समीकरण को साधने के लिहाज से लिया गया है. हिंदुत्व के प्रतीक योगी आदित्यनाथ की छवि एक प्रखर हिंदूवादी और फायरब्रांड नेता की रही है. लेकिन हकीकत तो यही है कि योगी आदित्यनाथ भी ठाकुर जाति से आते हैं. यूपी की सियासत को नजदीक से समझने वाले इस बात को बखूबी समझते भी हैं.

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मायावती समेत विरोधी दलों के नेताओं की तरफ से योगी आदित्यनाथ की जाति को लेकर प्रचार किया भी जा रहा है. लेकिन सवाल यही उठता है कि क्या योगी अब यूपी के भीतर भी अपने समुदाय के बड़े नेता बनकर उभर जाएंगे.

फिलहाल तो गृह मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ही यूपी के भीतर सबसे बड़े नेता के तौर पर सामने रहे हैं. राजनाथ सिंह मोदी सरकार में गृह मंत्री बनने के पहले तीन बार बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं.

14 साल पहले जब यूपी में बीजेपी की सरकार थी तो भी राजनाथ सिंह ही प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. उसके पहले यूपी सरकार में शिक्षा मंत्री से लेकर यूपी बीजेपी अध्यक्ष की भी जिम्मेदारी राजनाथ सिंह संभाल चुके हैं.लेकिन 45 साल के योगी आदित्यनाथ के यूपी का सरताज बनने के बाद अब योगी हिंदुत्व के साथ-साथ राजपूत जाति के भी नई पीढ़ी के बड़े नेता के रूप में सामने आ जाएंगे.

बीजेपी के भीतर राजनाथ सिंह के अलावा कलराज मिश्रा, कल्याण सिंह और लालजी टंडन जैसे नेता भी रहे हैं जो लगातार बीजेपी के भीतर अपनी अपनी जाति की नुमाइंदगी करते रहे हैं. लेकिन धीरे-धीरे इन नेताओं की धार कुंद होती चली गई .

इनमें गृह मंत्री राजनाथ सिंह को छोड़ दिया जाए तो फिर बाकी पुराने दिग्गज धीरे-धीरे अब अप्रासंगिक होते जा रहे हैं या फिर यूं कहें कि इन नेताओं की जगह दूसरे नेताओं ने ले ली है.

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बात अगर उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा की करें तो यूपी के भीतर नई पीढ़ी में ब्राम्हण चेहरे के रूप में इनको जाना जाता है. लखनऊ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर दिनेश शर्मा लखनऊ के मेयर भी हैं. दिनेश शर्मा उपमुख्यमंत्री बनने के पहले बीजेपी उपाध्यक्ष के तौर पर गुजरात का प्रभार संभाल रहे थे. इन्हें अमित शाह का करीबी माना जाता है.

योगी सरकार में दिनेश शर्मा को उप मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने यूपी के भीतर नई पीढ़ी में इस ब्राम्हण चेहरे को तरजीह दे दी है.

यूपी के भीतर ब्राम्हण चेहरे के तौर पर बीजेपी में कलराज मिश्र सबसे बड़े नेता माने जाते रहे हैं. लेकिन 75 की उम्र पार कर चुके कलराज मिश्र अब अपने सियासी सफर की आखिरी दहलीज पर खड़े हैं.

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यूपी तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भी कर्मभूमि रही है. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के सक्रिय राजनीति से अलग होने और मुरली मनोहर जोशी के मार्गदर्शक मंडल में शामिल होने के बाद बीजेपी के भीतर कोई बड़ा ब्राम्हण चेहरा उभरकर सामने नहीं आ पाया.

अब बीजेपी योगी के सहयोगी के रूप में दिनेश शर्मा को लाकर एक नए ब्राम्हण चेहरा के तौर पर उन्हें उभारने की कोशिश की है.

बीजेपी यूपी में सोशल इंजीनियरिंग के दम पर ही सत्ता में आई है. गैर-यादव पिछड़ी जाति से आने वाले कल्याण सिंह को सामने लाकर बीजेपी की तरफ से सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले को तैयार किया गया था. पिछड़े लोध समुदाय से आने वाले कल्याण सिंह के हिंदुत्व के फॉर्मूले ने बीजेपी के परंपरागत सवर्ण वोट के साथ मिलकर बीजेपी को यूपी में सत्ता के शिखर तक पहुंचाया था.

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अब बीजेपी चूंकि इस बार सत्ता में आई है तो उसकी बड़ी वजह गैर-यादव पिछड़े तबके का भरपूर समर्थन मिलना है. लिहाजा बीजेपी की कोशिश है कि कल्याण सिंह की तर्ज पर कोई दमदार नेता मिले जो उसके समीकरण में फिट बैठ सके. कल्याण सिंह फिलहाल राजस्थान के गवर्नर हैं और सक्रिय राजनीति से बाहर भी.

केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने कोशिश की है कि गैर-यादव पिछड़े तबके में से एक नेता के तौर पर मौर्य को स्थापित किया जाए.

पार्टी योगी आदित्यनाथ, दिनेश शर्मा और केशव मौर्य को सामने लाकर एक नए नेतृत्व को अब आगे बढाने की कोशिश कर रही है. लेकिन इस फैसले ने बीजेपी के भीतर के समीकरण  को बदल दिया है. आने वाले दिनों में इसका असर भी जरूर दिखेगा.

 

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