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बीजेपी में बदलाव का दौर शुरू, क्या इससे मिलेगी जीत?

बीजेपी ने फिलहाल 3 प्रदेशाध्यक्ष बदले हैं. राजस्थान से अशोक परनामी, मध्यप्रदेश से नंदकुमार सिंह और आंध्र प्रदेश से के हरिबाबू को प्रदेश से हटाकर केंद्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया गया है

Updated On: Apr 19, 2018 12:19 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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बीजेपी में बदलाव का दौर शुरू, क्या इससे मिलेगी जीत?

आखिर वो हो ही गया, जिसकी पिछले 3 महीने से जबरदस्त चर्चा चल रही थी. राजस्थान और मध्यप्रदेश में बीजेपी ने अपने सिपहसालारों को बदल दिया. मध्य प्रदेश में पार्टी की कमान जबलपुर सांसद राकेश सिंह को दी गई है. राजस्थान में प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी ने भी इस्तीफा दे दिया है. यहां कुछ कारणों से बुधवार को नए सेनापति की घोषणा नहीं की जा सकी.

वैसे तो माना जा रहा है कि नए प्रदेशाध्यक्ष के तौर पर जोधपुर सांसद और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत का नाम लगभग तय है. लेकिन लगता नहीं कि शेखावत के नाम पर आम सहमति है. फिलहाल उनके नाम की घोषणा न होने के पीछे तर्क यही दिया गया है कि वे विदेश में हैं. लेकिन बीजेपी दफ्तर के लोग कई दूसरी कहानियां भी सुनाते हैं.

प्रदेशाध्यक्ष पद पर जातिवादी गुणा-भाग

वसुंधरा राजे ने राजपूतों की नाराजगी दूर करने के नाम पर गजेंद्र शेखावत का नाम आगे बढ़ाया है. आनंदपाल एनकाउंटर के बाद से नाराज चल रहे बीजेपी के इस कोर वोटर समुदाय को मनाने की कई कोशिशें हो चुकी हैं. फिल्म पद्मावत के विरोध को समर्थन भी इसीलिए दिया गया था. लेकिन अजमेर, अलवर और मांडलगढ़ उपचुनाव में देखा गया कि राजपूतों ने बीजेपी को सबक सिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

वसुंधरा राजे के तर्कों के बाद संघ भी गजेंद्र शेखावत के नाम पर सहमत हो गया. हालांकि बुधवार देर रात तक खुद शेखावत को इसके लिए मनाने के दौर चल रहे थे. बीजेपी आने वाले चुनाव में जातिगत समीकरणों के मद्देनजर ही बदलाव करना चाह रही है. इसी के तहत कई बार वसुंधरा को हटाकर जयपुर ग्रामीण सांसद और केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को मुख्यमंत्री बनाने की चर्चाएं चलती हैं.

जातीय समीकरणों को साधने के लिए ही अरसे से उपेक्षित रहे मदन लाल सैनी को राज्यसभा में भेजा गया. कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के चलते गुर्जर वोटों के छिटकने से होने वाले नुकसान की भरपाई करने के लिए मीणा वोटों को साधा गया है. किरोड़ी लाल मीणा की घरवापसी इसीलिए कराई गई है. अब प्रदेशाध्यक्ष के लिए किसी दलित या जाट के नामों को भी टटोला गया है. हालांकि दलित के नाम पर विचार किए गए अर्जुन मेघवाल पर सहमति नहीं बन पाई.

अर्जुन मेघवाल.

अर्जुन मेघवाल.

अर्जुन ने क्यों नहीं उठाया गांडीव!

पिछले कुछ समय से बीकानेर सांसद और केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल के प्रदेशाध्यक्ष बनने की चर्चाएं चल रही थी. मौजूदा राजनीतिक वातावरण इसे और पुष्ट कर रहा था. वे अनुसूचित जाति से हैं और बीजेपी उन्हें प्रदेशाध्यक्ष बनाकर दलितों के नाम पर राजनीति कर रहे विपक्ष के हथियारों की काट कर सकती है. फिर अर्जुन मेघवाल संघ से भी जु़ड़े रहे हैं. ऐसे में संघ पर लग रहे ब्राह्मणवाद के आरोप भी बेबुनियाद साबित किए जा सकते हैं.

लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. इसके पीछे कई बातें बताई जा रही हैं. अव्वल तो ये कि अर्जुन मेघवाल के नाम पर खुद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने वीटो कर दिया. इसी महीने के पहले हफ्ते में राजे और अमित शाह के बीच संगठन और सरकार में परिवर्तन को लेकर चर्चा हुई थी. शाह की तरफ से ही मेघवाल का नाम आगे किया गया. लेकिन राजे उनके नाम पर सहमत नहीं हुई. दरअसल, अर्जुन मेघवाल राजे विरोधी खेमे के माने जाते हैं. ऐसे में वे नहीं चाहतीं कि चुनाव से पहले पार्टी में 2 शक्ति केंद्र बन जाएं या उनके विरोधी एकजुट हों.

दूसरा कारण ये बताया जा रहा है कि खुद अर्जुन मेघवाल भी प्रदेशाध्यक्ष बनकर 'संभावित हार' का ठीकरा अपने माथे नहीं फुड़वाना चाहते थे. राजस्थान में राजनीतिक गलियारों से लेकर चाय पर चर्चाओं तक आने वाले चुनाव में बीजेपी की संभावनाएं कम ही आंकी जा रही हैं. ऐसे में अपने उभरते करियर पर मेघवाल ब्रेक नहीं लगवाना चाह रहे थे. मेघवाल ने संगठन में जाने के बजाय सरकार में बने रहना ही ज्यादा मुफीद समझा.

मध्य प्रदेश में परिवर्तन के पीछे वसुंधरा की शह-मात

बीजेपी ने फिलहाल 3 प्रदेशाध्यक्ष बदले हैं. राजस्थान से अशोक परनामी, मध्यप्रदेश से नंदकुमार सिंह और आंध्र प्रदेश से के हरिबाबू को प्रदेश से हटाकर केंद्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया गया है. आंध्र में हाल ही में तेलुगुदेशम से गठबंधन टूटा है, ऐसे में वहां नए समीकरण बनाए जाने हैं. राजस्थान और एमपी में परिवर्तन की वजह उपचुनावों में मिली बड़ी शिकस्त हैं.

amit shah in mumbai

हालांकि बताया जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल मध्यप्रदेश में बदलाव का उतना इच्छुक नहीं था, जितना कि राजस्थान में. इस महीने की शुरुआत में वसुंधरा राजे को अमित शाह ने परिवर्तन के लिए कहा था. ये बदलाव पहले संगठन में होता और फिर सरकार में. ये आदेश राजे को असहज करने वाले थे. आखिर राजस्थान में सरकार के अंदर तो उन्हें चुनौती देने वाला कोई है ही नहीं, संगठन में भी अशोक परनामी की स्थिति वैसी ही थी जैसी सोनिया के सामने मनमोहन सिंह की.

प्रदेशाध्यक्ष बदलकर वसुंधरा राजे को 'कंट्रोल' करने की कोशिशें उलटे अमित शाह के लिए चेक एंड मेट जैसे हालात बन गए. राजे ने शाह से कहा कि परिवर्तन का आधार अगर उपचुनाव में हार है तो फिर राजस्थान में ही ऐसा क्यों, एमपी और यूपी जैसे राज्यों में क्यों नहीं ? इसके बाद मजबूरन मध्य प्रदेश में भी संगठन में बदलाव करना पड़ा.

राजस्थान मंत्रिमंडल में फेरबदल संभव

वसुंधरा ने शाह को एक बाजी में तो मात दे दी. लेकिन शाह कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. अब उन्होने वसुंधरा राजे का कॉकस तोड़ने के लिए राज्य मंत्रिमंडल में जल्द फेरबदल करने को कह दिया है. माना जा रहा है कि जल्द ही मंत्रिमंडल में नए चेहरे देखने को मिल सकते हैं. चिकित्सा, पीडब्लूडी और शहरी विकास विभाग विशेष तौर पर निशाने पर हैं.

संभावनाएं जताई जा रही हैं कि दलितों की नाराजगी दूर करने के लिए पिछड़े समुदायों को ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है. 2 अप्रैल की रैली के बाद दलितों को साधने की कोशिशें तेज हो गई हैं. इसी हफ्ते वसुंधरा राजे ने एसी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जारी हुए एडीजी के आदेश को भी रद्द किया है.

वसुंधरा राजे से खफा चल रहे सांगानेर विधायक घनश्याम तिवाड़ी को साधा नहीं जा सका है. उन्होने अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. लिहाजा, परशुराम जयंती पर अवकाश घोषित किए जाने का उद्देश्य भी ब्राह्मण वोटों को छिटकने से बचाना ही बताया जा रहा है. हो सकता है मंत्रिमंडल के संभावित फेरबदल में किसी ब्राह्मण विधायक को बड़ा पद दे दिया जाए. हो सकता है राजे गुट के अरुण चतुर्वेदी का कद बढ़ाया जाए. बहरहाल, देखने वाली बात ये होगी कि सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर किए जा रहे ये जातिवादी प्रपंच कारगर कितने हो पाते हैं.

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