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कश्मीरः घाटी में बिना वोटिंग के ही BJP की जीत तय

13 सीटों पर बीजेपी को आसान जीत मिल चुकी है, जबकि बाकी बची चार सीटों पर प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई नहीं है.

Updated On: Oct 07, 2018 05:32 PM IST

FP Staff

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कश्मीरः घाटी में बिना वोटिंग के ही BJP की जीत तय

दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले में 17 नगरपालिका वार्ड हैं. आतंकवाद प्रभावित इस जिले में आने वाले पंचायत चुनाव में एक पार्टी को छोड़ किसी ने अपने उम्मीदवार जरूर खड़े नहीं किए. लेकिन नतीजे घोषित हो चुके हैं. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अकेली ऐसी पार्टी थी, जिसके उम्मीदवारों ने नामांकन किया. 13 सीटों पर बीजेपी को आसान जीत मिल चुकी है, जबकि बाकी बची चार सीटों पर प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई नहीं है.

जब राज्य निकाय चुनावों की योजना बना रहा था, तब आतंकवादियों ने चुनावों के बहिष्कार की घोषणा करते हुए लोगों को चुनाव में भाग नहीं लेने की चेतावनी दी थी. धमकियों और सामाजिक-राजनीतिक हालात के बीच पार्टियों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा करना मुश्किल हो गया.

निर्विरोध जीत के बाद चार महिला उम्मीदवारों सहित बीजेपी से सभी 13 उम्मीदवार जम्मू में पार्टी कार्यालय पहुंचे. उस चुनाव में अपनी जीत का जश्न मनाया, जो हुआ ही नहीं. कश्मीर में 598 नगरपालिका वार्ड में से 178 पर कोई नामांकन नहीं हुआ. 190 वार्डों पर केवल एक उम्मीदवार ने नामांकन कराया, जिनमें से अधिकांश बीजेपी उम्मीदवार हैं. राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर सिदिक वाहिद ने इन चुनावों को 'नियुक्ति' बताया है.

शोपियां के अतिरिक्त कुछ अन्य स्थान हैं जैसे पुलवामा के कुछ क्षेत्र, अनंतनाग एव कुलगाम जहां बीजेपी आसान जीत की उम्मीद कर रही है. बची हुई सीटों पर उनका मुकाबला कांग्रेस एवं निर्दलीय उम्मीदवारों से है. कांग्रेस आरोप लगा रही है कि बीजेपी जिन स्थानों पर निर्विरोध तरीके से जीत रही है, सरकार ने वहां उनके उम्मीदवारों को सुरक्षा प्रदान नहीं की.

जम्मू-कश्मीर के कांग्रेस अध्यक्ष जीए मीर ने कहा, "देवसार, शोपियां और पुलवामा क्षेत्र में सुरक्षा की व्यवस्था बहुत खराब है. हमने कई बार सुरक्षा की मांग की लेकिन सरकार ने हमारी मांग नहीं सुनी." हालांकि सरकार का दावा है कि वो चुनाव के लिए चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था का बंदोबस्त करेगी.

हाल ही में श्रीनगर में राज्य के मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यम ने प्रेस कॉन्फ्रेस कर कहा था, "केंद्र ने अर्द्धसैनिक बलों की 400 अतिरिक्त कंपनियों को घाटी में पहुंचा दिया है." राज्य की दो प्रमुख पार्टियों पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) ने पूरे राज्य में इन चुनावों के बहिष्कार का ऐलान किया है. दोनों पार्टियों ने अनुच्छेद 35-A पर केंद्र के स्टैंड के कारण चुनाव के बहिष्कार का निर्णय लिया है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता आगा रुहुल्ला मेहदी ने कहा, "भारत सरकार को जम्मू-कश्मीर के लोगों को इस बात का आश्वासन देना चाहिए कि अनुच्छेद 35-A बना रहेगा. बहिष्कार के रूप में हम प्रदर्शन कर रहे हैं."

बीजेपी को मिलेगी जमीनी बढ़त

बीजेपी के राज्य अध्यक्ष रविन्द्र रैन ने शोपियां में मिली आसान जीत को 'एेतिहासिक जीत' करार दिया है. अब राज्य में शहरों और कस्बों में बीजेपी के राज वाली नगरपालिकाएं होंगी. प्रेक्षकों का विश्वास है कि पीडीपी और एनसी का चुनावों का बहिष्कार राज्य में बीजेपी की पकड़ बनाने में सहायक होगा.

डब्लिन सिटी यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के कश्मीरी स्कॉलर ताहिर फिराज कहते हैं, "बीजेपी के जीते हुए उम्मीदवार वहां के लोगों एवं कश्मीर से जु़ड़े समूहों को अपनी तरफ मिलाकर खुद के लिए रास्ता तैयार कर सकते हैं. एक बार लोगों को वो पसंद आ गए तो फिर उन्हें हटाना मुश्किल हो जाएगा."

जमीनी स्तर पर सत्ता पास होने के कारण बीजेपी को पूरे राज्य में अपना प्रचार करने के लिए बेहतर स्थिति में होगी. फिराज ने कहा, "एक बार बीजीपी स्थानीय निकायों पर नियंत्रण कर लेगी तो वे अधिक शक्ति जुटाएंगे जो उन्हें उनके अगले लक्ष्य विधानसभा चुनावों में कश्मीर में बीजेपी सरकार को हासिल करने में मदद करेगी.

जमीनी स्तर पर क्षेत्रीय पार्टियों के कार्यकर्ताओं में निराशा का माहौल देखा जा सकता है. उन्हें लग रहा है कि अगर बीजेपी सत्ता में आ जाती है तो फिर उनके मुद्दों को सुनने के लिए कोई नहीं होगा. नाम ना बताने की शर्त पर कश्मीर के एक पीडीपी कार्यकर्ता ने कहा, "बीजेपी का पार्षद कभी हमारे स्थानीय मुद्दों को उठाने का कष्ट नहीं उठाएगा. वह दिल्ली में अपने बॉस को खुश करने की अधिक कोशिश करेगा."

एनसी-पीडीपी के प्रॉक्सी उम्मदीवार

ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि पीडीपी और एनसी ने अपने प्रॉक्सी उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, हालांकि वो इससे इनकार कर रहे हैं. श्रीनगर ऑफिस में बीजेपी के चुनाव इंजार्ज फैयाज अहमद कहा कि बीजेपी के घोषणापत्र में दावा किया गया है कि पार्टी जल्द ही पीडीपी और एनसी के लिए प्रॉक्सी उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की लिस्ट जारी करेगी. कांग्रेस ने भी इस तरह का दावा किया है.

ऐसा ही कथित मामला उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में पीडीपी सांसद फैयाज अहमद मीर के भाई रियाज अहमद मीर का है. रियाज ने पिछले चुनाव में अपनी भाई के लिए प्रचार किया था. रियाज ने जिस दिन अपना नामांकन भरा, पार्टी ने उन्हें उसी दिन बर्खास्त कर दिया. हालांकि पीडीपी कार्यकर्ता उनके लिए वोट मांग रहे हैं. कुपवाड़ा में बीजेपी कार्यकर्ता जोवेद अहमद ने न्यूज18 को बताया कि पार्टी की तरफ से उन्हें रियाज के लिए प्रचार करने का निर्देश मिला है.

बहिष्कार की राजनीति

पीडीपी और एनसी स्थानीय चुनाव के बहिष्कार को भविष्य की राजनीति के साथ नहीं जोड़ रही हैं. दोनों पार्टियों का कहना है कि वे अब भी मुख्यधारा के राजनीतिक दल हैं. पीडीपी प्रवक्ता रफी मीर ने कहा, "हमने राजनीतिक व्यवस्था का बहिष्कार नहीं किया. चुनाव के लिए जमीनी स्तर पर अनुकूल वक्त नहीं है. हमने मांग की थी कि अनुच्छेद 35-A को सुरक्षित रखने के लिए केंद्र सरकार सख्त स्टेंड ले."

चुनावों की विश्वसनियता पर मीर ने कहा, "अगर उम्मीदवार अपने लिए प्रचार करने में असमर्थ हैं तो यह कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं है. यहां तक कि वे अपने परिवारों के साथ भी नहीं रह सकते हैं."

प्रॉक्सी उम्मीदवारों को उतारने के सवाल पर उन्होंने कहा कि अगर हमने उम्मीदवार उतारे होते तो बीजेपी को निर्विरोध जीत नहीं मिलती. नेशनल कॉन्फ्रेंस के मेहदी ने कहा, "आम लोगों ने कश्मीर के इन चुनावों को खारिज कर दिया है. यहीं कारण है कि उम्मीदवार निर्विरोध तरीके से जीत रहे हैं."

उन्होंने बीजीपी उम्मीदवारों की निर्विरोध जीत को पार्टी का 2019 के चुनावों के लिए शो ऑफ करार दिया. उन्होंने कहा कि बीजेपी ने कश्मीर में लोकतंत्र को खतरे में डाल दिया है.

हालांकि कांग्रेस बहिष्कार को सेक्युलर ताकतों के लिए नुकसान के तौर पर देख रही है. कांग्रेस के जीए मीर ने कहा, "दिक्कत ये है कि बीजेपी को जहां आसान जीत मिल रही है वहां पीडीपी और एनसी पारंपरिक रूप से मजबूत रहे हैं."

मीर ने कहा कि अगर हम भी चुनावों का बहिष्कार करते तो सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने का कांग्रेस का दावा खोखला पड़ जाता. उन्होंने विश्वास जताया कि सेक्युलर ताकतों के साथ आने से बीजेपी को बैकफुट पर रखा जा सकेगा.

{साभार: न्यूज 18 के लिए आकाश हसन (कश्मीर बेस्ड स्वतंत्र पत्रकार) की रिपोर्ट}

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