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गाय पर राजनीति को बीजेपी ने चमकाया...अब कांग्रेस उसी रास्ते पर चल रही है

लोकसभा चुनाव में कुछ ही महीने बाकी हैं. जाहिर है, इन चुनावों में भी गाय सुर्खियां बटोरेगी, सियासी तवज्जो हासिल करेगी.

Updated On: Feb 07, 2019 07:09 PM IST

Ananya Srivastava

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गाय पर राजनीति को बीजेपी ने चमकाया...अब कांग्रेस उसी रास्ते पर चल रही है

भारत में धार्मिकता की जड़ें बहुत गहरी हैं. यहां पर हर तरह के कुदरती संसाधन की पूजा की जाती है. यहां हजारों नामी और अनाम देवता हैं, जो तरह-तरह के रूप और रंग में पूजे जाते हैं. ऐसे भारत में गाय एक सियासी जानवर है. प्राचीन काल के धार्मिक ग्रंथों में इसे गोमाता कह कर इसे इंसानियत को पोसने वाला जीव बताया गया है. आज गोमाता अखबार की सुर्खियों से लेकर चुनाव के घोषणापत्रों में खूब अहमियत पाती हैं.

फिर भी, जब बुधवार को अखबारों में ये खब छपी कि मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने गोहत्या के आरोपी तीन मुसलमानों पर बेहद सख्त राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा दिया है. हालांकि मध्य प्रदेश में गोहत्या पर पाबंदी है, फिर भी आरोपियों पर रासुका लगाने पर बहुत से लोगों ने सवाल उठाए. उनका कहना था कि गोहत्या के आरोपियों पर इतने सख्त कानून के तहत कार्रवाई प्रशासन की कुछ ज्यादा ही तल्ख प्रतिक्रिया है. बल्कि कई लोगों ने तो इसे आरोपियों के साथ नाइंसाफी तक बता डाला. बीजेपी ने भी अपनी सियासी विरोधी कांग्रेस पर दोगलेपन का आरोप लगाया. बीजेपी का कहना था कि जब उसके राज में गोहत्या के आरोपियों पर सख्ती होती थी, तो यही कांग्रेस गोतस्करों और गोहत्या के आरोपियों पर गैरजरूरी सख्ती करने का आरोप लगाती थी. अब उनकी सरकार है, तो, वो खुद यही कर रहे हैं.

आज उत्तर भारत के तमाम राज्यों में गोरक्षा की राजनीति सभी दलों के एजेंडे में शामिल हो गई है. ये सभी राज्य चुनावी राजनीति के लिहाज से बहुत अहम हैं. इसकी शुरुआत उस वक्त से हुई थी जब हिंदुत्ववादी पार्टी बीजेपी ने पहली बार भारत में अपनी सियासी ताकत का एहसास कराया था.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

अब गाय बहुत बड़ा सियासी प्रतीक बन गई है. इसकी तुलना इफ्तार पार्टियों से की जा सकती है, जो पहले रमजान के महीने में बहुत जरूरी सियासी तमाशा मानी जाती थीं. बीजेपी ने जब से राम मंदिर के बजाय गोमाता की राजनीति शुरू की है, तब से ही गाय एक राजनीतिक हथियार बन गई है. हम ये नहीं कह रहे हैं कि बहुसंख्यक समुदाय की राजनीति करने वाली बीजेपी ने हाल के दिनों में गाय को अपने एजेंडे में शामिल किया है. लेकिन, बीजेपी ने कारसेवकों के बजाय गोरक्षकों को हाल के दिनों में ही तरजीह देनी शुरू की है. अब ये बात किसी से छुपी नहीं है.

2004 में बीजेपी ने अपने विजन डॉक्यूमेंट में राम मंदिर बनाने को प्रमुखता से जगह दी थी. उस दस्तावेज में गोमाता का जिक्र केवल एक लाइन में हुआ था. जिसमें गोमाता और इसकी संतानों की रक्षा का वादा किया गया था. 2009 में बीजेपी के घोषणापत्र में गोमाता पर पूरा एक पन्ना लिखा गया था. 49 पन्ने के दस्तावेज में चार बार गोमाता का जिक्र आया था. लेकिन, अपने शर्मीले मिजाज की तरह ही गोमाता सुर्खियों से दूर ही रहीं.

लेकिन, 2014 के आम चुनाव में पहली बार गोमाता राजनीति में दाखिल हुईं. राजनीति के मैदान में आने के साथ ही गाय की शोहरत में दिन दूना रात चौगुना इजाफा हुआ. हालांकि घोषणापत्र में पिछली बार की ही तरह इस बार भी गोमाता का जिक्र चार बार ही हुआ था. लेकिन, जिस तरह नरेंद्र मोदी ने गोमाता को अपने चुनावी भाषणों में शामिल किया, उससे भारत की राजनीति ही बदल गई.

प्रचार के दौरान मोदी ने कांग्रेस के राज में 'पिंक रिवोल्यूशन' के खतरे का बार-बार जिक्र छेड़ा. ये कांग्रेस की 'हरित क्रांति' का जवाब था, जिस के चलते देश में अन्न का उत्पादन बढ़ा था. लेकिन गुलाबी क्रांति से मोदी का इशारा इस आरोप की तरफ था कि कांग्रेस के राज में मांस का निर्यात बढ़ा है. इस में गोमांस भी शामिल है. इसका नतीजा ये हुआ है कि मुख्य रूप से मुसलमान कसाइयों की खूब तरक्की हुई है. और ये कसाई पूरी ताकत से कांग्रेस का समर्थन करते हैं.

गाय पर इस आक्रामक राजनीति ने उग्र सोच रखने वाले कट्टरपंथी हिंदूवादियों को बीजेपी के पाले में लाने में मदद की. इसे देखते हुए मोदी ने बीफ खाने वालों और न खाने वालों के बीच ध्रुवीकरण की कोशिश की.

मिसाल के तौर पर कुछ बीजेपी नेताओं के बयान देखिए. मसलन, राजस्थान के बीजेपी नेता ज्ञानदेव आहूजा ने कहा, 'जो लोग गाय की तस्करी और गोहत्या करते हैं, अगर वो अपनी हरकतों से बाज नहीं आए तो मैं उन्हें आतंकवादी कहूंगा.'

गोरक्षकों के जुल्म के सवाल पर आहूजा ने कहा, 'लोगों को पीटने या हत्या की घटनाएं सुनियोजित नहीं हैं. ये तो लोगों का कुदरती गुस्सा है. जब पुलिस गोहत्या और तस्करी के मामलों का संज्ञान नहीं लेती है, तो लोगों की नाराजगी इसी रूप में सामने आती है.'

कर्नाटक की विजयापुरा सीट के बीजेपी विधायक बासनगौड़ा पाटिल यत्नाल ने केरल में आई बाढ़ के बाद कहा था कि, 'केरल में लोग खुलेआम गाय की हत्या करते थे? क्या हुआ? एक साल के भीतर ही बाढ़ जैसी आफत उन पर आ गई. जो भी हिंदुओं की धार्मिक आस्थाओं पर चोट करेगा, उसे ऐसा ही अंजाम भुगतना होगा.'

बीजेपी विधायक और मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपी संगीत सोम ने तो धमकी ही दी थी कि अगर दादरी के मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या के मामले में किसी बेगुनाह को फंसाया गया तो वो मुंहतोड़ जवाब देंगे.

इसके मुकाबले कांग्रेस ने गाय पर शर्माते-शर्माते राजनीति शुरू की. देश में 1955 में पहली बार गोहत्या पर पाबंदी कांग्रेस की सरकारों ने लगाई थी. फिर भी, जब कांग्रेस के एक तबके ने गोहत्या पर देशव्यापी पाबंदी की बात की, तो इंदिरा गांधी मजबूती से और सारा नफा-नुकसान जानते हुए भी इसके खिलाफ खड़ी रहीं.

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि 1966 में जब गोहत्या पर पाबंदी को लेकर आंदोलन तेज हुआ, तो इंदिरा गांधी सकते में आ गई थीं. फिर भी, इंदिरा इन मांगों के आगे नहीं फौरन नहीं झुकी थीं. इंडियन एक्सप्रेस के लेख के मुताबिक, उन्होंने कहा कि गोहत्या पर देशव्यापी पाबंदी की मांग पर एक उच्चस्तरीय समिति विचार करेगी.

'किसी भी देश की ताकत इस बात में होती है कि वह खुद क्या कर सकता है ना कि इस बात में कि वह औरों से क्या उधार ले सकता है'

इंदिरा गांधी ने मामले पर विचार के लिए जो समिति बनाई, उस के ज्यादातर सदस्य उनके भरोसेमंद कांग्रेसी नेता, धर्मनिरपेक्षता के समर्थक, केंद्र और राज्य के अफसर थे. ऐसे में इस में कोई अचरज नहीं कि इस समिति ने साफ तौर पर कहा कि गोहत्या पर देशव्यापी पाबंदी गैरजरूरी है. वहीं, 1969 में जब कांग्रेस दो हिस्सों में बंटी तो इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले गुट ने गाय और उसका दूध पीते बछड़े को अपना नया चुनाव चिन्ह चुना.

द स्क्रॉल का एक लेख कहता है कि हिंदुओं और मुसलमानों को लुभाने के लिए सांप्रदायिक प्रतीक चुनने की शुरुआत असल में इंदिरा गांधी ने ही की थी. सियासी इफ्तार पार्टियों की शुरुआत इंदिरा गांधी ने ही की थी. उनके वारिस राजीव गांधी ने राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत की थी. आज भी ये माना जाता है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की बुनियाद असल में राजीव गांधी ने ही डाली थी.

इसके बरक्स कांग्रेस ने शाहबानो मामले में मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने का विरोध करके मुस्लिम वोटरों को ये संदेश देने की कोशिश की कि वो उनके साथ खड़ी है. लेकिन, ये राजनीति का बेहद मुश्किल दौर है. बीजेपी के आक्रामक हिंदुत्व का जवाब देने के लिए कांग्रेस कुछ भी करने को बेकरार दिखती है. हिंदू प्रतीकों का समर्थन हो, पौराणिक और धार्मिक पूजा-अनुष्ठान पर सियासत अब राजनीतिक मजबूरी बन गई है. ध्रुवीकरण के इस दौर में कांग्रेस, बहुसंख्यक समुदाय के वोट हासिल करने के लिए कोई भी कीमत देने को तैयार है.

यही वजह है कि जब भी बीजेपी गाय को लेकर शोर मचाती है, तो कांग्रेस जनता को ये याद दिलाती है कि 24 राज्यों में गोहत्या पर पाबंदी कांग्रेस की सरकारों ने लगाई थी. इनमें बिहार भी शामिल है. जहां 1955 में गोहत्या पर पाबंदी लगी थी. तब तो बीजेपी का गठन तक नहीं हुआ था.

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने तो ये बयान भी दिया कि उनकी पार्टी गोहत्या के खिलाफ देशव्यापी पाबंदी लगाने के लिए कानून बनाने पर चर्चा के लिए तैयार है. उनका बयान इस मौके पर आया जब गोरक्षकों के हाथों कई लोगों की पीट-पीटकर हत्या हुई.

इकोनॉमिक टाइम्स की जिस रिपोर्ट में दिग्विजय सिंह के बयान का जिक्र है, उसी में कांग्रेस के एक और नेता राज बब्बर का भी बयान है. जिन्होंने अपने सियासी सहयोगी लालू यादव के बयान को सही साबित करने की कोशिश की. जब राज बब्बर से लालू यादव ने बयान कि हिंदू भी गोमांस खाते हैं, पर टिप्पणी के लिए कहा गया तो राज बब्बर ने कहा, 'लालू यादव गो हत्या का समर्थन नहीं कर रहे हैं. कोई यादव गायों के खिलाफ कैसे हो सकता है.'

ये बात अक्टूबर 2016 की है. अब आप पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों की बात करें तो हमें बहुत से अखबारों और मीडिया रिपोर्ट्स में कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ़ लौटने का जिक्र दिख जाता है. अक्टूबर 2018 के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने अपनी गांधी टोपी को बीजेपी की गाय राजनीति के रंग में रंग डाला था. पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में वादा किया था कि वो गोमूत्र की मार्केटिंग करेगी, हर पंचायत में गायों के लिए गोशालाएं बनाएगी और इनके लिए अलग फंड की व्यवस्था करेगी. पार्टी ने घायल गायों के इलाज की व्यवस्था करने से लेकर उनके अंतिम संस्कार के इंतजाम तक करने का वादा अपने चुनावी घोषणापत्र में किया था.

Photo Source: @INCIndia

इसके बाद अगर ध्यान दें तो पाएंगे कि राहुल गांधी अपने हिंदू होने का ढोल पीटते फिर रहे थे. वो मंदिरों के चक्कर लगाकर जनता को ये यकीन दिला रहे थे कि उनकी पार्टी हिंदू विरोधी नहीं है. नतीजा ये हुआ कि मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार बेहद सांप्रदायिक हो गया. गोमाता इसका सबसे अहम किरदार बन गईं. कांग्रेस और बीजेपी एक-दूसरे को गायों की घटती संख्या और कसाईखानों की बढ़ती तादाद के लिए जिम्मेदार ठहराती रहीं.

गाय पर इस राजनीति का फायदा ये है कि मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार कम से कम गायों के मामले पर तो अपना हर चुनावी वादा पूरे करने पर अडिग दिखती है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पिछले हफ्ते मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एलान किया कि राज्य में अगले चार महीनों के भीतर एक हजार गोशालाएं बनाई जाएंगी. पशुपालन मंत्री लखन सिंह यादव ने कहा कि राज्य सरकार गायों के कल्याण के लिए फंड जुटाने के लिए लक्जरी कारों और दूसरी महंगी चीजें खरीदेन पर टैक्स लगाने पर विचार कर रही है.

लोकसभा चुनाव में कुछ ही महीने बाकी हैं. जाहिर है, इन चुनावों में भी गाय सुर्खियां बटोरेगी, सियासी तवज्जो हासिल करेगी. गाय को लेकर सियासी आरोप-प्रत्यारोप लगेंगे. और शायद इस बिनाह पर कुछ वोट भी इधर-उधर हों. लेकिन, इस बात की उम्मीद कम ही है कि ये गो माता को एक सियासी जानवर साबित करने से इतर कुछ और नहीं होगा.

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