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राजस्थान: राजे ही बीजेपी हैं और बीजेपी ही राजे लेकिन फैसला तो तय है

राजस्थान में बीजेपी न तो वसुंधरा के बिना चुनाव जीत सकती है और न ही उनके नेतृत्व में जीतने की उम्मीद दिखाई दे रही है

Updated On: Feb 08, 2018 10:54 AM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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राजस्थान: राजे ही बीजेपी हैं और बीजेपी ही राजे लेकिन फैसला तो तय है

राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे इस वक्त जिस सियासी स्थिति में हैं, उससे मशहूर अमेरिकी लेखक जोसेफ हेलर को जरूर प्रेरणा मिलती. वो यकीनन अपनी मशहूर कहानी कैच-22 का सियासी अंक लिख डालते. जोसेफ हेलर की मशहूर कहानी कैच-22 में लिखा है 'जब तक आप को पागल नहीं घोषित कर दिया जाता, तब तक आप लड़ाकू जहाज उड़ाना बंद नहीं कर सकते. और जब तक आप फाइटर प्लेन उड़ाना बंद नहीं करते, तब तक आपको पागल नहीं करार दिया जा सकता.'

वसुंधरा की स्थिति बदल रही है

राजस्थान के सियासी हालात ठीक ऐसे ही हैं. बीजेपी वसुंधरा राजे की अगुवाई में चुनाव नहीं जीत सकती. लेकिन, पार्टी उनके बगैर भी राजस्थान में विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकती. बीजेपी के एक दिग्गज नेता ने फ़र्स्टपोस्ट से ठीक ही कहा-'वसुंधरा हमारा सबसे मजबूत मोहरा हैं. वही हमारी सबसे कमजोर कड़ी भी हैं.'

पिछले हफ्ते दो ऐसी घटनाएं बीजेपी में हुईं, जो एक-दूसरे से ठीक उलट थीं. एक बीजेपी नेता ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को चिट्ठी लिखकर वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग की. एक दौर ऐसा भी था, जब ऐसा सोचना भी नामुमकिन था. इसके एक दिन बाद राज्य में बीजेपी के अध्यक्ष अशोक परनामी ने एलान किया कि इस साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव वसुंधरा राजे की अगुवाई में लड़े जाएंगे. खुद परनामी की कुर्सी खतरे में है और वो वसुंधरा की अगुवाई में चुनाव लड़ने का एलान कर रहे हैं. परनामी ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि 'उन्हें हटाए जाने की अटकलों में कतई दम नहीं है.'

हाल ही में आए अलवर और अजमेर लोकसभा सीटों और मांडलगढ़ विधानसभा सीट के उपचुनाव के नतीजों ने बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दी है. बीजेपी के लिए वसुंधरा राजे गले की फांस बन गई हैं. तीनों सीटों को मिला लें तो कुल 17 विधानसभा सीटें और 40 लाख वोट होते हैं. सभी 17 विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी पीछे रही थी. अलवर लोकसभा सीट को बीजेपी ने 2014 में 2.65 लाख वोट से जीता था. उप चुनाव में बीजेपी को पिछली बार से 25 फीसद वोट कम मिले. पार्टी को इस सीट पर शर्मनाक हार झेलनी पड़ी. ज्यादातर विधानसभा सीटों पर बीजेपी को पिछली बार के मुकाबले दस फीसद तक कम वोट मिले.

Photo. news india 18.

वसुंधरा के सिवा कोई और नेता नहीं है नजर में

उप चुनाव के नतीजों से पार्टी के नेताओं में आम राय है कि वोटर को लुभाने के लिए, सरकार के प्रति उसकी नाराजगी दूर करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है. इन ठोस कदमों में से एक राज्य में नेतृत्व बदलने का विकल्प भी है. मगर, बीजेपी के साथ दिक्कत ये है कि उसके पास कोई दूसरा नेता नहीं. राजस्थान में वसुंधरा राजे ही बीजेपी हैं और बीजेपी वसुंधरा राजे है. पार्टी के दूसरी कतार के नेताओं में कोई उतना कद्दावर नहीं दिखता. ज्यादातर ऐसे नेता हैं, जिनके लिए अपनी सीट जीतना भी चुनौती ही होगी. वसुंधरा राजे के सिवा कोई ऐसा नेता नहीं, जो पूरे राजस्थान में हर समुदाय को लुभा सके.

बीजेपी के लिए हालात और मुश्किल इसलिए हो जाते हैं कि वसुंधरा राजे को हटाने का मतलब होगा, पार्टी में दो-फाड़ होना. बंटी हुई पार्टी के लिए तो चुनाव जीतना और भी मुश्किल होगा. बीजेपी को ये डर कर्नाटक में 2013 में बी एस येदियुरप्पा को हटाने के बाद से हुई हालत के बाद लगातार सताता रहता है. वसुंधरा राजे ने पहले कई बार पार्टी आलाकमान को अपने तेवर दिखाए हैं. हालांकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के राज में वसुंधरा ने अब तक केंद्रीय नेतृत्व पर आंखें नहीं तरेरी हैं. लेकिन, बीजेपी को पता है कि अगर वसुंधरा राजे को नाराज किया, तो चुनाव में इसका भारी खामियाजा उठाना पड़ सकता है. ठीक उसी तरह जैसे 2013 में कर्नाटक में येदियुरप्पा ने पार्टी का नुकसान किया था.

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कुल मिलाकर, राजस्थान में बीजेपी के पास जीत का कोई तुरुप का इक्का नहीं. पार्टी को मालूम है कि लोग वसुंधरा सरकार से नाराज हैं. अगले विधानसभा चुनाव में हार का डर भी बीजेपी को सता रहा है. यही वजह है कि वसुंधरा राजे से नाराज बीजेपी शायद उनकी अगुवाई में ही चुनाव लड़ने का फैसला करे. सियासी हिसाब-किताब लगाने के बाद पार्टी आलाकमान वसुंधरा राजे की सरकार को ही चलने देने का इशारा कर सकता है. हां, केंद्रीय नेतृत्व वसुंधरा को आगाह जरूर कर सकता है कि 2018 के चुनाव 2019 के लिए सेमीफाइनल जैसे हैं.

पहले भी हो चुका है ऐसा

मगर, बीजेपी के इतिहास पर गौर करें तो, शायद ऐसा न भी हो. साल 2002 में भी बीजेपी विधानसभा चुनाव से पहले ऐसी ही दुविधा की हालत में थी. साल 1998 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के कद्दावर नेता भैरों सिंह शेखावत हताश मालूम होते थे. उस चुनाव में 200 सदस्यों की विधानसभा में बीजेपी महज 33 सीटें जीत सकी थी. जमीनी हकीकत ये थी कि अगर साल 2002 में भी उनकी अगुवाई में ही चुनाव लड़ा जाता, तो हालात कुछ खास बेहतर नहीं होते. मगर, दिक्कत ये थी कि राजस्थान में शेखावत ही बीजेपी के सबसे बड़े नेता थे.

भैरो सिंह शेखावत

भैरो सिंह शेखावत

प्रमोद महाजन की सलाह पर पार्टी ने भैरों सिंह शेखावत को उप-राष्ट्रपति चुनाव का उम्मीदवार बनाकर उन्हें राजस्थान की सियासत से दूर करने की चाल चली. शेखावत का रिटायरमेंट प्लान तैयार होने के बाद उनकी जगह नए नेता के नाम का एलान किया गया. वसुंधरा को वो सबक याद होगा. आखिर उन्होंने ही तो शेखावत की जगह ली थी.

राज्य में बीजेपी के भीतर वैसी ही सियासी सरगोशियां सुनी जा रही हैं. वसुंधरा राजे की जगह इस वक्त केंद्र में मंत्री एक राजपूत नेता का नाम चर्चा में चल रहा है. ठीक उसी तरह जैसे कभी वसुंधरा, राजस्थान की राजनीति में सक्रिय होने से पहले केंद्र में हुआ करती थीं. लेकिन, वसुंधरा राजे का भविष्य क्या होगा, ये सिर्फ मोदी और शाह को पता है. जैसा कि जोसेफ हेलर ने अपनी कहानी कैच-22 के एक किरदार के बारे में लिखा था, 'उनके खिलाफ फैसला तय है. बस आरोप तय होना बाकी है'.

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