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बीजेपी को महंगी पड़ सकती है 'पेरियार से लेनिन की तुलना'

पेरियार सही मायनों में बागी थे, जिन्होंने लोगों को आत्मसम्मान के साथ जीना सिखाया और नई राजनीतिक सोच की बीज डाली, जिसने राज्य में राष्ट्रीय पार्टियों को अप्रसांगिक कर दिया

Updated On: Mar 08, 2018 03:10 PM IST

G Pramod Kumar

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बीजेपी को महंगी पड़ सकती है 'पेरियार से लेनिन की तुलना'

अगर सीपीएम और वामपंथी हलकों को छोड़ दिया जाए, तो त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति को कथित तौर पर बीजेपी कार्यकर्ताओं द्वारा तोड़े जाने को लेकर देश के अन्य हिस्सों में ज्यादा आक्रोश नहीं दिखा. हाल में त्रिपुरा विधानसभा के चुनाव हुए हैं, जहां बीजेपी को जबरदस्त जीत मिली है. इसके बाद यह घटना हुई है. हालांकि, द्रविड़ों के नायक ई वी रामास्वामी यानी 'पेरियार' को निशाना बनाने के लिए तमिलनाडु में जीत को लेकर इस तरह का बेतुका जश्न मनाना आग से खेलने जैसा है.

लेनिन न तो भारत के नागरिक थे और न ही देसी विचारधारा के नायक हैं. दरअसल, वह एक आयातित राजनीतिक सिस्टम का चेहरा हैं, जो पूरी दुनिया में बुरी तरह नाकाम रहा है. उनकी मूर्तियों को गिराया जाना वैश्विक स्तर पर कम्युनिस्ट विरोधी भावनाओं का लक्षण भी है.

सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के कम्युनिस्ट निजाम के धीरे-धीरे पतन के बाद यह प्रचलन देखने को मिला है. इसके मुकाबले पेरियार तमिल लोगों की शाश्वत सामाजिक-राजनीतिक भावना से जुड़े हैं, जो तमिलवासियों के आत्म सम्मान और किसी भी तरह के प्रभुत्व या दबदबे के प्रतिरोध का प्रतीक है. वह द्रविड़ विचाराधारा का भी प्रतीक हैं, जो न सिर्फ तमिलनाडु के लोगों बल्कि दक्षिण भारत के तमाम अन्य राज्यों के लोगों को भी प्रेरित करता है. 'उत्तर भारत के दबदबे' के प्रतिरोध के मामले में यह विचारधारा खास तौर पर प्रासंगिक हो जाती है.

'पेरियार' के बिना तमिलनाडु में राजनीति करना नामुमकिन

इस बात में कोई शक नहीं है कि आज भी उनकी राजनीतिक विचारधारा, बगावत की प्रकृति और धार्मिक आस्थाओं से लेकर महिलाओं के अधिकारों समेत तमाम मसलों पर क्रांतिकारी नजरिया है. यह आज के स्तर के हिसाब से बेहद प्रगतिशील नजर आता है.

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हालांकि, संसदीय लोकतंत्र से जुड़े राजनीतिक मकसद हासिल करने की खातिर उनके समर्थकों ने इससे काफी हद तक समझौता कर लिया है. बहरहाल, एक नायक के तौर पर उनका नाम सब लेते हैं. तमिलनाडु में उनकी यादों का जिक्र किए बिना राजनीति में चलना नामुमिकन है. चाहे वह जयललिता हो, करुणानिधि या हाल में राजनीति में प्रवेश करने वाले कमल हसन.

दरअसल, पेरियार सही मायनों में बागी थे, जिन्होंने लोगों को आत्म सम्मान के साथ जीना सिखाया और नई राजनीतिक सोच की बीज डाली, जिसने राज्य में राष्ट्रीय पार्टियों को अप्रसांगिक कर दिया.

फासीवादी साजिश की बू

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराए जाने को उन्मत्त भीड़ की कारगुजारी बताया जा सकता है, जिसका मकसद सीपीएम को डराना हो सकता है. हालांकि, इसके बाद पेरियार की मूर्ति को लेकर भी इस तरह की धमकी दिया जाना एक साजिश की तरफ इशारा करता है.

बेशक यह साजिश अभी पूरी तरह से परिपक्व नहीं हुई है. दरअसल समाज के इन दोनों नायकों में एक बात कॉमन थी-फासीवादी विचारधारा का विरोध.

अगर यूरोपीय फासीवादी कम्युनिस्टों को अपना मुख्य दुश्मन मानते थे तो मुमकिन है कि उनके भारतीय समकक्षों के पास पेरियार को नापसंद करने की भी इसी तरह की वजहें हों.

दरअसल, पेरियार का भी मानना था कि आस्था और आस्था आधारित भेदभाव ही सभी तरह कीअसमानता की मूल वजह है. वह हिंदुत्व के खिलाफ थे, क्योंकि उनका मानना था कि यह सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देता है. उन्होंने लोगों से ईश्वर की अवधारणा को खारिज करने को कहा.

साथ ही, खुद का सम्मान करने और सिर्फ मानवता में भरोसा करने की नसीहत दी. पेरियार ने लोगों से तर्कवादी बनने और विज्ञान में यकीन रखने को भी कहा. और सबसे अहम उन्होंने मनुस्मृति और पेरियापुराणम (शैवों का पवित्र ग्रंथ) जलाया, हिंदू देवी-देवताओं से जुड़ी मूर्तियों तोड़ीं और महिलाओं के अधिकारों के लिए खड़े हुए. ऐसे में उनकी विचारधारा का आस्था आधारित सामाजिक रीति-रिवाजों से भी टकराव हुआ.

क्या है इस खीझ की वजह?

लिहाजा, पेरियार की मूर्ति को जमींदोज करने की हसरत रखने वाले तमिलनाडु के बीजेपी नेता एच राजा की खीझ बेवजह नहीं है. हालांकि, इसे सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करना बीजेपी के चुनावी जीत की प्रवृत्ति से धोखे जैसा है और यह सामाजिक-राजनीतिक अपरिपक्वता का नमूना है.

रजनीकांत की 'आध्यात्मिक राजनीति' या हिंदुत्व को बढ़ावा देने के लिए ऐसे छद्म आइडिया का तमिलनाडु में सफल होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है, क्योंकि हिंदू राष्ट्रवाद के मुकाबले इसका क्षेत्रीय राष्ट्रवाद ज्यादा मजबूत है. गौरतलब है कि रजनीकांत ने बाद में 'आध्यात्मिक राजनीति' को लेकर सफाई पेश करते हुए इसे 'ईमानदार और धर्मनिरपेक्ष' बताया था. पेरियार के कारण ज्यादातर तमिलवासियों की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और आत्म सम्मान पहले है.

इसलिए, इसमें बिल्कुल भी हैरानी वाली बात नहीं थी कि तमिलनाडु के सभी राजनेताओं ने राजा के बयान की एक सुर में खिलाफत की. डीएमके के एम के स्टालिन ने तो राजा को गुंडा एक्ट के तहत जेल में बंद करने तक की मांग कर डाली. बीजेपी या राजा शायद अलग किस्म की गोलबंदी (धार्मिक आस्था वाले लोगों बनाम इससे दूर रहने वाले लोगों, अरुण शौरी ने अपनी एक किताब में आस्था के आधार पर पेरियार के खिलाफ केरल के समाज सुधारक नारायण गुरू को पेश करने की नाकाम कोशिश की थी) के लिए जायजा ले रही होंगी.

हालांकि, साफ तौर पर यह मामला नाकाम रहा और यह आगे भी सफल नहीं होगा. क्योंकि पेरियार ऐसे शख्स थे, जिन्होंने हिंदू धर्म को लेकर तर्कसंगत ढंग से गांधी के विचारों का विरोध किया, जाति की दुश्वारियों से बचने के लिए अंबेडकर के धर्मांतरण के आह्वान को खारिज किया और यहां तक कि साम्यवाद के अपनी शुरुआती प्रेम को भी खत्म कर दिया. दरअसल, उनका मानना था कि भारत में वर्ग से ज्यादा जाति अहम है. भाजपा नेता का दांव पड़ सकता है उल्टा

क्या हैं सकारात्मक पहलू?

शायद, राजा के बेमतलब उत्साह के कुछ सकारात्मक पहलू भी हो सकते हैं और पेरियार के विचारों को नई रोशनी मिल सकती है. उनके विचार और काम करने का तरीका आज भी पहले जैसे ही प्रासंगिक हैं. उनके सामाजिक-राजनीतिक विचार समानता और आत्म सम्मान को लेकर किसी भी तरह का समझौता नहीं करने की उनकी सोच से निकलकर सामने आए. साथ ही इस बारे में प्रचार-प्रसार की उनकी शैली बेबाक और ऊर्जावान थी.

उन्होंने औसतन सालाना 250 विचारोत्तेजक भाषण दिए और जमकर कलम भी चलाई. इसका मकसद लोगों को एक साथ शिक्षित, एकजुट और तमाम बेड़ियों से मुक्त करना था. उनके भाषण अक्सर बिल्कुल बेलौस और बेबाक होते थे. तमिलनाडु में राजनीति में बड़ी सफलता हासिल करने की हसरत रखने वाला कोई भी शख्स या संगठन इस विचार को नजरअंदाज नहीं कर सकते.

राजनीति को पेशा बना कर काम कर रहे उनके अनुयायियों ने शायद भले ही जाति आधारित भेदभाव के पूरी तरह से उन्मूलन के मूल को लेकर समझौता कर लिया हो, लेकिन जब भी वे मुश्किल में होते हैं, तो उसी दर्शन की ओर वापस लौटते हैं. यहां तक कि अपनी वैचारिक वैधता को फिर से हासिल करने के लिए इसी शॉर्ट कट को अपनाते हैं.

राजनीतिक इतिहासकार के कन्नन तमिलनाडु के पहले मुख्यमंत्री और पेरियार के सबसे मशहूर शिष्य सी एन अन्नादुरई की जीवनी अन्ना में लिखते हैं, 'उनका काम मानवीय मूल्यों के तकरीबन पूरे दायरे तक फैला था.'

मिसाल के तौर पर एक सदी पहले महिलाओं के समानता के अधिकार को लेकर उनकी साफ राय समानता में उनके मौलिक भरोसे का मजबूत प्रमाण है. जैसा कि कन्नन अपनी किताब में कहते हैं, 'पेरियार ने कहा कि पतिव्रता होने की अवधारणा महिलाओं को परेशान करने वाली है. महिलाओं को स्वतंत्र होने की जरूरत है, न कि बच्चे पैदा करने की.

नौकरियों में उनकी 50 फीसदी हिस्सेदारी होनी चाहिए. 1926 में उन्होंने बिना किसी पुजारी या कोई आयोजन के शादी की शुरुआत की, तलाक और महिलाओं के लिए संपत्ति के अधिकार मंजूरी दी. उन्होंने काफी विरोध के बावजूद 1909 में अपनी विधवा भतीजा से शादी की. वह विवाह को अंतरिम व्यवस्था मानते थे और महिलाओं की सच्ची आजादी के लिए विवाद संस्था को खत्म करने की मांग की.'

मुमकिन है कि लेनिन की मूर्ति को गिराया जाना राजनीतिक बर्बरता की मिसाल के तौर पर लोगों की यादाश्त से हट जाए, लेकिन इस मौके का इस्तेमाल कर पेरियार को गरियाने से दांव उल्टा पड़ जाएगा और उनकी कहानियां फिर से लौट आएंगी.

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