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कांग्रेस का निशाना सटीक लग रहा है, बीजेपी संभली नहीं तो घायल हो जाएगी

अगर वक्त रहते कांग्रेस के जातीय समीकरण की काट ढूंढने में बीजेपी फेल हो गई तो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ अगले साल के लोकसभा चुनाव में भी उसकी राह मुश्किल हो जाएगी.

Updated On: Feb 02, 2018 06:43 PM IST

Amitesh Amitesh

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कांग्रेस का निशाना सटीक लग रहा है, बीजेपी संभली नहीं तो घायल हो जाएगी
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जब पूरा देश बजट पर वित्त मंत्री अरुण जेटली का भाषण सुन रहा था, तो दूसरी तरफ, राजस्थान में दो लोकसभा और एक विधानसभा के उपचुनाव के नतीजे आ रहे थे. केंद्र सरकार के इस आखिरी पूर्ण बजट में गांव, गरीब और किसान के लिए सौगातों की बौछार हो रही थी, लेकिन, राजस्थान के गांवों से सत्ताधारी बीजेपी के लिए बुरी खबर आ रही थी.

अपने साथ गांव को जोड़ने में लगी बीजेपी राजस्थान के गांवों में हुए उपचुनाव में हार गई. अलवर और अजमेर लोकसभा सीट के साथ-साथ मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी को कांग्रेस के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा. गौरतलब है कि इन तीनों सीटों पर बीजेपी का ही कब्जा था.

वसुंधरा के खिलाफ नाराजगी

Vasundhara Raje

राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के काम करने के तरीके और पार्टी के भीतर की गुटबाजी को लेकर पहले से ही बीजेपी के नेता भी दबी जुबान से ही सही इस तरह की अनहोनी के कयास लगा रहे थे. लेकिन, इस दुर्गति का अंदाजा उनको भी नहीं रहा होगा. अब हार के बाद समीक्षा शुरू हो गई है. महारानी के काम करने के अंदाज पर भी सवाल हैं तो ठीकरा राजस्थान में जातीय गणित पर भी फोड़ा जा रहा है.

यह बात सही है कि राजस्थान में वसुंधरा राज को वहां की जनता ने 200 में से 163 सीटों पर विजयी बनाकर अबतक का सबसे बड़ा जनादेश दिया था. लेकिन, यह हकीकत भी उतनी ही कड़वी है कि वसुंधरा ने एक फिर से पुरानी गलतियों से सबक लेने के बजाए महारानी के ही अंदाज में अपना काम जारी रखा. इससे पार्टी के भीतर भी कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी सामने आई और पार्टी के भीतर गुटबाजी भी बढ़ी.

लेकिन, राजस्थान की जातीय समीकरण से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. राजस्थान में बीजेपी की हार के पीछे मौजूदा दौर में वहां का जातीय समीकरण भी है जो महारानी के खिलाफ जा रहा है.

राजस्थान में बीजेपी से राजपूत नाराज

सबसे पहले बात राजपूत समाज की करें तो अबतक वो खुलकर महारानी के साथ यानी बीजेपी के साथ रहा है. लेकिन, राजपूत समाज के भीतर से ही अब बीजेपी के खिलाफ आवाजें उठनी शुरू हो गई हैं. आनंद पाल एनकाउंटर के मसले को लेकर भी राजपूत समाज के भीतर नाराजगी देखने को मिली थी.

भले ही आनंदपाल इस समाज का आईकॉन न रहा हो, लेकिन, इस मसले को जिस तरह से राजनीतिक रंग दिया गया उसे ठीक तरह से निपटने में  वसुंधरा राजे की सरकार नाकाम रही. लिहाजा समाज का एक बड़ा तबका अपनी नाराजगी दिखा रहा है.

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रही-सही कसर पद्मावत फिल्म के वक्त पैदा हुए विवाद ने पूरी कर दी. पद्मावत फिल्म के प्रदर्शन और इस पूरे मसले पर हुए विवाद के वक्त भी करणी सेना के नेतृत्व में जिस तरह से विरोध-प्रदर्शन किया गया उसका भी असर देखने को मिला. इस मसले को भी राजस्थान की बीजेपी सरकार ठीक ढंग से समझाने में नाकाम रही. इसका भी फायदा कांग्रेस को ही मिला. हालांकि सूत्र बताते हैं कि करणी सेना के इस पूरे खेल के पीछे भी कांग्रेस की शह थी. जिसका उसको फायदा मिलता दिख रहा है.

गुर्जरों ने किया कांग्रेस का रुख

gurjar agitation

इसके अलावा राजस्थान में गुर्जर आरक्षण की तरफ से चलाए जा रहे आंदोलन का भी असर देखने को मिल रहा है. बीजेपी की तरफ से लगातार गुर्जरों को आरक्षण के दायरे में लाने का वादा किया जाता रहा. लेकिन, अबतक ऐसा हो न सका. कई कानूनी पचड़े में फंसकर बीजेपी का वादा अबतक वादा ही रह गया है. इस पर अमल नहीं हो पाया है. लिहाजा, उनकी तरफ से भी नाराजगी देखने को मिल रही है.

कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट खुद गुर्जर समुदाय से हैं. लिहाजा, उनके नेतृत्व में फिर से बीजेपी से नाराज गुर्जर समुदाय कांग्रेस की तरफ रुख कर रहा है. इसका असर उपचुनाव के दौरान भी देखने को मिल रहा है.

हालांकि बीजेपी ने हिंदुत्व की राजनीति के जरिए कांग्रेस के जातिवादी समीकरण की काट ढूंढने की कोशिश की, बीजेपी के कई नेताओं की तरफ से पहलू खान के मुद्दे को भी उठाया गया. लेकिन, कम से कम राजस्थान में यह पूरा मुद्दा बेअसर रहा.

राजस्थान के बाहर भी बीजेपी को नुकसान

हालांकि यह हाल राजस्थान का ही नहीं देश के दूसरे राज्यों का भी है. देश के दूसरे राज्यों में भी जातिवादी राजनीति से बीजेपी को ही घाटा हो रहा है. अभी हाल ही में खत्म गुजरात चुनाव में पाटीदारों की नाराजगी का असर दिखा. हार्दिक पटेल के नेतृत्व में चलाए जा रहे पटेल आंदोलन और उसके बाद की नाराजगी को भुनाने की कांग्रेस ने पूरी कोशिश की. हार्दिक पटेल के साथ कांग्रेस का समझौता भी हुआ, इसका असर भी दिखा. बीजेपी जैसे-तैसे सरकार बना पाई.

गुजरात में बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड को कांग्रेस के जातीय समीकरण से तगड़ी चुनौती मिली. राहुल गांधी ने सॉफ्ट हिंदुत्व का कार्ड चलकर ध्रुवीकरण रोकने में काफी हद तक सफलता भी पा ली.

दलित-मुस्लिम गठबंधन की तैयारी में कांग्रेस

rahul gandhi

कुछ दिनों पहले ही महाराष्ट्र के कोरेगांव में दलितों के साथ हुई हिंसा की घटना केबाद भी कांग्रेस ने कड़ा रुख अपना लिया. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे संघ-बीजेपी की साजिश तक बता दिया. यानी दलितों के मुद्दे के सहारे भी कांग्रेस की कोशिश बीजेपी को घेरने की है. कांग्रेस को लगता है कि बीजेपी के हिंदुत्व की काट के तौर पर दलितों के साथ-साथ मुस्लिम समीकरण पूरे देश में एक मजबूत वोट बैंक के तौर पर उसके साथ आ सकता है.

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दरअसल, कांग्रेस की रणनीति का ही पार्ट है जिसके तहत वो सॉफ्ट हिंदुत्व के साथ-साथ जातीय समीकरण को साधने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस को लग रहा है कि इसससे अलग-अलग जातियों में बंटे समाज का वोट उसे ही नसीब होगा और सॉफ्ट हिंदुत्व के सहारे बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे को भी रोका जा सकेगा.

2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त मोदी लहर में सभी जातीय समीकरण ध्वस्त हो गए थे. लेकिन, अब एक बार फिर से कोशिश जातीय किले को ही मजबूत करने की है.

बीजेपी के लिए खतरे की घंटी

PM Narendra Modi interacts with NCC cadets, NSS Volunteers and Tableaux Artists

पहले गुजरात और फिर राजस्थान में कांग्रेस को मिली इस सफलता के चलते उसका मनोबल बढ़ा हुआ है. आगे भी उसकी वही रणनीति रहने वाली है. लेकिन, यह वक्त बीजेपी के लिए चेतावनी का है. राजस्थान के परिणाम ने इस साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है.

अगर वक्त रहते कांग्रेस के जातीय समीकरण की काट ढूंढ़ने में बीजेपी फेल हो गई तो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ अगले साल के लोकसभा चुनाव में भी उसकी राह मुश्किल हो जाएगी.

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