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बीजेपी की दलित राजनीति पर कितना असर डालेगा सावित्रीबाई फुले का इस्तीफा

यूपी के एक बड़े दलित चेहरे का छिटकना क्या बीजेपी के लिए झटका माना जाए?

Updated On: Dec 08, 2018 09:21 AM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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बीजेपी की दलित राजनीति पर कितना असर डालेगा सावित्रीबाई फुले का इस्तीफा

2012 में सावित्रीबाई फुले पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रही थीं. तकरीबन हर रैली में वो कहा करती थीं कि ‘मैं पैसे कमाकर क्या करूंगी? कहां लेकर जाऊंगी. छोटी सी उम्र में मैंने समाज सेवा के लिए घर छोड़ दिया. मेरा कोई परिवार है नहीं. परिवार ही नहीं है तो पैसे किसके लिए जमा करूंगी.’ जनता के ऊपर उनके इस भाषण का असर होता. इस असर को और गहरा करने के लिए वो आगे अपने बचपन के हौसले की कहानी बयान करने लगतीं.

‘गरीब घर से थी. छह साल की उम्र में ही मां-बाप ने शादी कर दी. किशोरावस्था में एक विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए घर से भागकर लखनऊ पहुंच गई. हंगामा हुआ, लाठियां चलीं और पुलिस ने उठाकर जेल में डाल दिया. जेल से निकलते ही ससुराल जाकर ऐलान कर दिया. मेरा जन्म तो समाजसेवा के लिए हुआ है. घर से बंधकर नहीं रह सकती. इसके बाद शादी तोड़कर अपने समाज में अलख जगाने के लिए अपनों के बीच पहुंच गई.’

सावित्रीबाई फुले की ऐसी संघर्षशील जिंदगी की कहानी का जनता के ऊपर अच्छा प्रभाव पड़ता. लोगों को लगता कि वो अपने सामने एक दूसरी मायावती को देख रहे हैं. मायावती की तरह की कदकाठी, उन्हीं की तरह कंधे तक कटे बाल, उन्हीं से मिलती-जुलती जिंदगी की कहानी, उन्हीं की तरह अपने दलित समाज के लिए कुछ करने की चाह. 2012 में जब वो बीजेपी की तरफ से बहराइच के बलहा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रही थीं तो लोगों को लग रहा था कि अब बीजेपी को भी एक मायावती मिल गई है.

3 लाख वोटर्स वाले बलहा विधानसभा क्षेत्र में सावित्रीबाई फुले ने करीब 20 हजार वोटों के अंतर से बीएसपी उम्मीदवार किरन भारती को शिकस्त दी थी. इसके दो साल बाद ही वो विधायक से एक ही झटके में सांसद बन गई. 2014 के लोकसभा चुनाव में बहराइच लोकसभा क्षेत्र से बीजेपी को ढंग के उम्मीदवार तक नहीं मिल रहे थे. इस सुरक्षित सीट से बीजेपी ने सावित्रीबाई फुले पर दांव आजमाया. मोदी की जबरदस्त लहर में फुले ने करीब एक लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की. इसके बाद तो सावित्रीबाई फुले यूपी में बीजेपी के बड़े दलित चेहरे के तौर पर सामने आ गईं.

क्या बीजेपी से दूर हो रहे हैं दलित और पिछड़े?

6 दिसंबर को सावित्री बाई फुले ने बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. यूपी में बीजेपी के एक बड़े दलित चेहरे ने पार्टी से किनारा कर लिया. इससे बीजेपी पर क्या असर पड़ेगा? क्या ये बीजेपी से दलितों और पिछड़ों के दूर जाने का संकेत है?  या फिर इसे एक दलित नेता की व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा के पूरा नहीं होने पर किसी और राजनीतिक ठौर की तलाश वाला मामूली कदम माना जाए? जैसा कि आजकल हर दूसरा राजनेता कर रहा है. चिंता की एक बात ये भी है कि फुले की ही तरह पूर्वांचल से पिछड़ों के नेता और योगी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर अपनी पार्टी के साथ जब-तब बीजेपी का विरोध करते रहते हैं.

savitri bai fule

सावित्री बाई फुले का राजनीतिक करियर ज्यादा लंबा नहीं रहा है. 38 साल की उम्र राजनीति में ज्यादा बड़ी होती भी नहीं है. वो 2012 में पहली बार विधायक बनीं और 2014 में पहली बार सांसद. उनका परिवार कांशीराम के संगठन बामसेफ से जुड़ा था. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में सावित्री बाई फुले ने बताया था कि बचपन में एक बार उन्हें बहराइच में हुई मायावती की एक रैली में जाने का मौका मिला था. वहां पर उनके पारिवारिक गुरु अछेवरनाथ कनौजिया ने मंच पर उनसे भाषण दिलवा दिया. मायावती काफी प्रभावित हुई थीं. इसके बाद घर आते ही पिताजी बोले कि जब मायावती मुख्यमंत्री बन सकती हैं तो उनकी बेटी क्यों नहीं? इसी के बाद परिवार ने उन्हें अछेवरनाथ कनौजिया को गोद दे दिया.

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यहीं से उनकी जिंदगी बदलनी शुरू हुई. सावित्री बाई फुले ने अपने पिता, फिलॉस्फर और गुरु अछेवरनाथ कनौजिया के बताए रास्ते पर चलते हुए दलित राजनीति में कदम रखा. वो बीएसपी से जुड़ी रहीं. लेकिन 2000 में एक लोकल मुद्दे पर झगड़े की वजह से मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया. इसके बाद उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया. जब तक बीएसपी में थीं नीले रंग के कपड़े पहनती थीं. बीजेपी में आते ही सबसे पहला भगवा वस्त्र धारण किया और इसी वेश भूषा में अपनी दलित राजनीति चमकाने लगीं.

बीजेपी से लगातार नाराज चल रही थीं सावित्रीबाई फुले

बीजेपी में आकर सावित्रीबाई फुले ने कम ही वक्त में अच्छी प्रगति की. 2 साल में विधायक से सांसद बनने के बाद अगले ही साल में वो अपने लिए बड़ी भूमिका की तलाश में जुट गई, जो पूरी हुई नहीं इसलिए वो लगातार पार्टी से नाराज चल रही थीं. दरअसल उनके सांसद बनने के बाद 2014 में बलहा विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में वो अपने गुरु अछेवरनाथ कनौजिया के लिए टिकट की डिमांड कर रही थी. लेकिन पार्टी में उनकी सुनी नहीं गई और टिकट पूर्व मंत्री अक्षयवरलाल गौड़ को दे दिया गया. हालांकि उपचुनावों में बीजेपी के अक्षयवरलाल गौड़ समाजवादी पार्टी के वंशीधर बौध के हाथों हार गए.

अपने गुरु को टिकट दिलवाने में नाकाम रहीं सावित्रीबाई फुले ने 2017 के विधानसभा चुनावों में एक बार फिर कोशिश की कि किसी भी तरह से इस बार उनके गाइड अछेवरनाथ कनौजिया को टिकट मिल जाए. लेकिन 2017 के चुनाव में उनकी मांग की अनदेखी करते हुए बीजेपी से फिर अक्षयवरलाल गौड़ को टिकट मिला. बीजेपी ने बहराइच की सभी विधानसभा सीटों पर शानदार प्रदर्शन किया. बलहा सीट समेत पार्टी ने 6 सीटों पर कामयाबी के झंडे गाड़े.

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सावित्रीबाई फुले का दर्द दोहरा था. वो बीजेपी की यूपी में बड़ा दलित चेहरा थीं. लेकिन ना तो वो एक टिकट का जुगाड़ कर पाईं और ना ही सांसद से आगे का कोई रास्ता तय कर पाईं. दलित चेहरे की वजह से उन्हें उम्मीद थी कि शायद उनके लिए मंत्रिमंडल में कोई जगह निकल आए. लेकिन ऐसा हो न सका. पिछले एक साल से वो लगातार कई मौकों पर पार्टी के खिलाफ बगावत के सुर बुलंद किए हुए थीं.

1 अप्रैल को 2017 को उन्होंने लखनऊ में संविधान बचाओ रैली की. इस रैली में उन्होंने कहा कि बाबा साहेब आंबेडकर के बनाए संविधान की अवहेलना हो रही है. आरक्षण को खत्म करने की साजिशें चल रही हैं. दलितों की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है. इसके बाद से लगातार वो दलित मुद्दों पर अपनी ही सरकार को घेरती आ रही थीं.

सावित्रीबाई फुले के सामने और कोई रास्ता नहीं था

ये करीब-करीब पक्का हो चला था कि 2019 में उन्हें बहराइच से टिकट नहीं मिलने जा रहा है. इसी आशंका को देखते हुए उन्होंने पहले ही ऐलान कर दिया था कि 6 दिसंबर को वो बड़ा ऐलान करने वाली हैं. और इसी दिन उन्होंने बीजेपी से आखिरी विदाई ले ली. अब वो कह रही हैं कि अगला धमाका 23 दिसंबर को होगा. हो सकता है कि इस दिन वो बीएसपी में शामिल हो जाएं.

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बहराइच लोकसभा की सुरक्षित सीट है. साढ़े तीन लाख की आबादी वाले इस सीट पर करीब 33.53 फीसदी मुसलमान हैं और 16.50 फीसदी अनुसूचित जाति के लोग. 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के साथ इसी समीकरण ने सावित्री बाई फुले के लिए शानदार जीत का रास्ता तैयार किया. अब परिस्थितियां अलग हैं.

सावित्री बाई फुले का बीजेपी से अलग होने के बाद इतना बड़ा कद नहीं रह जाता कि वो 2014 वाला असर डाल सकें. और अगर वो बीएसपी में भी शामिल होती हैं तो जिस तरह भगवा धारण करके उन्हें मुखर होकर अपनी बात कही है वही बीएसपी में स्वीकार हो पाएगा, मायावती के सामने चल पाएगा ये कहना मुश्किल है. हालांकि इस कठिन माहौल में एक दलित नेता का छिटकना बीजेपी के लिए झटका जरूर है.

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