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BJP सांसद साध्वी ने क्यों छेड़ी अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत

बीजेपी सरकार पर हमला बोलने के बाद सवाल उठता है कि क्या वो पार्टी छोड़ने वाली हैं, किसी ने उन्हें अपने दल में बुलाया है या फिर उनकी कोई और रणनीति है

FP Staff Updated On: Apr 02, 2018 02:18 PM IST

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BJP सांसद साध्वी ने क्यों छेड़ी अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत

बहराइच (यूपी) से बीजेपी सांसद साध्वी सावित्री बाई फुले के कपड़े तो भगवा हैं लेकिन लखनऊ के कांशीराम स्मृति उपवन में आयोजित 'भारतीय संविधान व आरक्षण बचाओ' रैली मंच से मैदान तक नीले रंग से रंगी रही. बीजेपी सांसद की रैली में कांशीराम का चित्र भी लगाया गया था.

इसमें उन्होंने अपनी ही केंद्र और राज्य सरकार पर तीखे प्रहार किए. कहा, कि इस समय पूरे देश में दलित और पिछड़े परेशान हैं. उनका उत्पीड़न बढ़ रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वो पार्टी छोड़ने वाली हैं, किसी ने उन्हें अपने दल में बुलाया है या फिर उनकी कोई और रणनीति है...? न्यूज 18 ने साध्वी फुले से ऐसे ही कुछ सवाल पूछे. पेश है उनसे लंबी बातचीत के खास अंशः

सवाल: आपको सरकार से दिक्कत से क्या है?

साध्वी फुले: आरक्षण को लेकर जो संविधान में व्यवस्था है, सरकार उसे लागू करे, जिससे बहुजन समाज आगे बढ़े और गरीबी दूर हो. आरक्षण पूरी तरीके से लागू हो. पिछड़ी जातियों को अब भी 27 फीसदी आरक्षण नहीं मिल रहा है. आरक्षित वर्ग के पद नहीं भरे जा रहे हैं. इसकी वजह से दलितों और पिछड़ों की मुश्किलें बढ़ रही हैं. हमारी सरकार ने संविधान को लागू नहीं किया. जबकि मैं संविधान लागू करने की मांग को लगातार संसद में उठाते आई हूं. मैंने इसीलिए अब मैदान में आने का फैसला किया. एससी-एसटी एक्ट में बदलाव को लेकर मुझे नाराजगी है, जिसके खिलाफ आज देश भर में आंदोलन है.

सवाल: बीजेपी सरकार में तो पिछड़े और दलित समाज से कई मंत्री हैं, फिर क्यों नाराजगी बढ़ रही है?

साध्वी फुले: मेरी मांग है कि दलित और पिछड़े समाज को संविधान के प्रावधानों के तहत उनके अधिकार दिए जाएं. जातीय जनगणना हो. जो पहले हो चुकी है उसे सार्वजनिक किया जाए. जिससे पता चले कि किस जाति के कितने लोग हैं, इसे देश को बताया जाए. उनकी आर्थिक स्थिति का पता करें. उसी हिसाब से उन्हें हक दिया जाए. जितनी केंद्रीय यूनिवर्सिटी हैं उनमें अनुसूचित जाति का कोई रोस्टर लागू नहीं है. अनुसूचित जाति के बच्चों की स्कूलों में स्थिति दयनीय है. उनका न तो एडमिशन लिया जा रहा है और न उन्हें छात्रवृत्ति ही मिल रही है. अब कुछ भी हो मुझे संविधान और आरक्षण पूरी तरह से लागू करवाना है.

सवाल: मतलब आपकी बात सुनी नहीं गई इसलिए अब पार्टी छोड़ने वाली हैं?

साध्वी फुले: मैं बीजेपी नहीं छोड़ रही, मैं सिर्फ अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रही हूं. अपने समाज के अधिकार की मांग कर रही हूं. पक्ष हो या विपक्ष, मांग तो सरकार से ही की जाती है. अपने अधिकार की मांग करना भी गुनाह है क्या? बहुजन समाज को सम्मानित जीवन जीने का अधिकार संविधान निर्माता भीमराव आंबेडकर ने दिलवाया है, यूपी में उनकी मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं, इसलिए उनके अपमान पर चुप नहीं बैठूंगी.

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सवाल: तो क्या मायावती के बुलाने पर उनके साथ जाएंगी, उनका फोन आया था क्या आपके पास?

साध्वी फुले: मायावती ने मुझे फोन नहीं किया. लेकिन बहुजन समाज के अधिकारों की लड़ाई के लिए तो पूरा देश साथ खड़ा हो जाएगा. मैं खुद सबको आमंत्रित करती हूं ये लड़ाई लड़ने के लिए. मैं तो कहती हूं कि बीजेपी में जितने भी अनुसूचित जाति के लोग हैं, पिछड़े लोग हैं, उन्हें इस लड़ाई के लिए साथ आना चाहिए. मैं उन्हें आमंत्रित करती हूं.

सवाल: यूपी में बीआर आंबेडकर की मूर्तियां तोड़ने की घटनाएं बढ़ रही हैं, क्या आप योगी सरकार के कामकाज से संतुष्ट हैं?

साध्वी फुले: भीम राव आंबेडकर की मूर्ति तोड़ने वाले के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का केस लगाना चाहिए. जब उनकी मूर्ति तोड़ी जा सकती है तो कुछ भी हो सकता है. इसीलिए तो पूरे भारत के दलित दुखी हैं, उनकी सुनवाई नहीं हो रही है. योगी आदित्यनाथ पूरे यूपी की जनता के मुख्यमंत्री हैं न कि किसी एक जाति के.

कौन हैं साध्वी सावित्री बाई फूले?

बहराइच से सांसद चुनी गईं सावित्री बाई फुले भगवा ब्रिगेड में दलित महिला चेहरा हैं. छह साल की उम्र में उन्हें विवाह के लिए मजबूर किया गया था, हालांकि उनकी विदाई नहीं हुई थी. बड़े होने पर उन्होंने ससुराल पक्ष वालों को बुलाकर सन्यास लेने की अपनी इच्छा बताई. फिर अपनी छोटी बहन की शादी अपने पति से कराकर वे बहराइच के जनसेवा आश्रम से जुड़ीं. आठवीं क्लास पास करने पर उन्हें 480 रुपये का वजीफा मिला था, जिसे स्कूल के प्रिंसिपल ने अपने पास रख लिया. इसका सावित्री ने जमकर विरोध किया. फिर स्कूल से उनका नाम काट दिया गया. यहीं से राजनीति की शुरुआत करने वाली साध्वी 2012 में बीजेपी के टिकट पर बलहा (सुरक्षित) सीट से चुनाव जीता. 2014 में उन्हें सांसद का टिकट मिला और वह देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंच गईं.

मूर्तियां तोड़ने की घटनाएं बहुजन समाज को आहत करने वाली हैं. कोई दलित को घोड़े पर नहीं चढ़ने देना चाहता है, कोई उन्हें कोट पैंट नहीं पहनने देना चाहता है...,अगर कोई दलित घोड़े पर सवार होकर शादी करने जाता है तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है....पुरानी व्यवस्थाएं आज भी चल रही हैं. इसका मतलब संविधान का उल्लंघन हो रहा है. संविधान लागू नहीं करवाया जा रहा. सरकार कड़ाई से संविधान लागू करे, जिससे सभी लोगों को बराबरी से जीने का अधिकार मिले. मैं सांसद रहूं या ना रहूं, लेकिन अब इन मसलों पर चुप नहीं बैठने वाली.

(न्यूज 18 के लिए ओम प्रकाश की रिपोर्ट)

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