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नोटबंदी: 50 मौतें, सरकार के लिए ‘छोटी’ परेशानी

किसी भी तरह का आर्थिक बदलाव, किसी व्यक्ति के मानवाधिकार से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकता.

Updated On: Nov 20, 2016 05:38 PM IST

FP Staff

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नोटबंदी:  50 मौतें, सरकार के लिए ‘छोटी’ परेशानी

‘भले ही ही दस दोषी छूट जाएं लेकिन एक भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए.’

यह कथन किसी भी कानून का आधार है. यह इस तर्क पर आधारित है कि अगर ऐसी स्थिति हो, जहां आपको किसी अपराध के लिए कुछ लोगों को किसी निर्दोष के साथ दंड देना पड़ रहा हो या उस निर्दोष को बचाने में दोषियों के भी छूट जाने की आशंका हो, तब आपको उस निर्दोष को बचाना चाहिए.

500 और 1000 रुपए की नोटबंदी के संदर्भ में यह सिद्धांत लागू नहीं हुआ. यह किसी भी तरह से गलत नहीं कि सरकार के ऊपर इस सिद्धांत को तोड़ने की जिम्मेदारी डाली जाए, जिसने यह कदम लिया है.

8 नवंबर की मध्यरात्रि को हुए नोटबंदी की घोषणा के बाद, इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर से जुड़ी, अब तक 47 मौतें हो चुकी हैं.

द हफ्फिंगटन पोस्ट और द इंडियन एक्सप्रेस ने हरेक मौत, आत्महत्या और हत्या की विस्तार से रिपोर्ट छापी है.

इसमें कोई शक नहीं, कुछ मौतें जिन्हें नोटबंदी से जोड़ा जा रहा है, वह फिर भी होती अगर नोटबंदी नहीं होती. लेकिन फिर भी यह तथ्य  है कि इनमें से अधिकतर मौतें नहीं होती, अगर नोटबंदी नहीं होती.

अब तक नोटबंदी को लागू हुए लगभग 8 दिन हो चुके हैं. इसका मतलब है कि नोटबंदी से औसतन 4 मौतें हर दिन हो रही हैं.

सरकार की प्रतिक्रिया

note 2000 rs पीटीआई

बुधवार को नोटबंदी के मुद्दे पर राज्यसभा में चर्चा हुई. विपक्षी नेताओं खासकर कांग्रेस के सांसद आनंद शर्मा, बीएसपी सुप्रीमो मायावती और सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने भी नोटबंदी के चलते हुई मौतों की चर्चा की.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मिलकर इसके बारे में कहा.

विपक्ष के दिग्गज नेताओं द्वारा इस मुद्दे को राज्‍य सभा में 6 घंटे की बहस में उठाने के बाद भी सरकार की इन मौतों पर प्रतिक्रिया क्या रही?

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और वेंकैया नायडू ने नोटबंदी पर विपक्ष के सवालों का जबाब तो दिया लेकिन इस कारण हुई मौतों पर बोलने से बचते रहे (उस समय कुल 33 मौतें हो चुकी थीं).

एक बयान से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकार इन मौतों के बारे में क्या सोचती है, जब वेंकैया नायडू ने लोगों की ‘परेशानियों’ को प्रसव पीड़ा कहा.

नायडू ने कहा- ‘जहांं तक लोगों को हो रही परेशानियों का सवाल है, किसी बच्चे को पैदा करना आसान नहीं है. लेकिन एक बार जब बच्चे की पैदाइश हो जाती है, तब मां की खुशी का ठिकाना नहीं होता.’

उन्होंने लोगों की मौतों पर बयान देने की बजाय रचनात्मक होने का रास्ता चुना. नायडू ने कहा कि कैसे स्वच्छ भारत अभियान ‘तन, मन, धन’ की सफाई है और नोटबंदी एक ‘महायज्ञ’ है.

नायडू ने देश की गुलाबी तस्वीर पेश की

नायडू ने अपने भाषण को ऐसे पेश किया कि जैसे कहीं कोई मौत ही नहीं हुई है और देश की गुलाबी तस्वीर पेश की, जहां हर कोई प्रधानमंत्री के फैसले से खुश हैं.

उन्होंने कहा- ‘देश की लंबी खुशहाली के लिए, यह क्षणिक दुःख है’. उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी नेताओं को आम जनता से जुड़ना चाहिए ताकि वे समझ सकें कि क्यों सभी लोग नोटबंदी के फैसले से खुश हैं.

गोयल के भाषण में भी इन मौतों पर कुछ नहीं था. उन्होंने कहा- ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकास यात्रा शुरू हो गई है और यह देश को आगे ले जाएगा.’

‘पूरा देश सरकार के इस फैसले की सराहना कर रहा है... धीरे-धीरे और लगातार, बैंकों में कतारें घट रही हैं. लोग कुछ दिन और परेशानियों का सामना करने के लिए तैयार हैं क्योंकि यह फैसला देशहित में हैं. इसके साथ 500 और 2000 रुपए के नए नोट बैंक में आ गए हैं, लोग खुश हैं.’

क्या लोग खुश हैं?

क्या नायडू और गोयल ये बातें उन लोगों के परिवारों से कहने की कोशिश कर रहे थे जिनकी मौतें लंबी लाइनों में खड़े होने कि वजह से हुई है या उनकी जिनका नोटबंदी के बाद इलाज करने से अस्पतालों ने मना कर दिया. सरकार को भी जमीनी हकीकत मालूम होनी चाहिए.

बिना किसी संदेह के नायडू और गोयल के भाषण, इस साल संसद में दिए गए सबसे निराशाजनक भाषण थे.

नोटबंदी के जुड़ी मौतें ‘परेशानी’, दिक्कत या मुश्किल नहीं है. इसे ‘प्रसव पीड़ा’ से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.

यह दुःख उनके लिए ‘अस्थायी’ नहीं है, जिन्होंने अपनी जिंदगी गंवाई है या अपने किसी प्रिय को खोया है. पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए यह गहरा दुःख है.

नोटबंदी पर बहस गुरुवार को भी जारी रहेगी. नायडू और गोयल ने मौतों के बारे में इसलिए भी कुछ नहीं कहा क्योंकि नोटबंदी पर हो रही आलोचनाओं का जबाब तो वे दे सकते हैं लेकिन इससे हुई मौतों का नहीं.

अगर सरकार ने इस पर कोई बयान दिया होता तो उनके लिए नोटबंदी से देश में सब ठीक हैं, यह कह पाना मुश्किल होता.

लोगों को हुई परेशानी पर भाजपा का बयान

यहां तक कि संसद के बाहर भी सत्ताधारी दल की प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक नहीं है. भाजपा सांसद गोयल शेट्टी ने यह तर्क दिया कि ‘हर साल, लगभग 3,500 लोग रेलवे ट्रैक पर कटकर मरते हैं, पांच लाख लोग रोड दुर्घटना में मरते हैं, बहुत से लोग आतंकी घटनाओं और अन्य घटनाओं में मारे जाते हैं, कोई इसके बारे में नहीं बोलता है.’

यह बेहूदा तर्क है. भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे ने भी कुछ इसी तरह का बयान दिया कि ‘कई बार लोग राशन की कतारों में भी मरते हैं.’

सरकार क्यों है जिम्मेदार

सरकार को जबाब क्यों देना चाहिए? क्यों सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना चाहिए जब कुछ लोग कानून तोड़ते हैं?

पहली बात, बहुत सी मौतें आत्महत्या हैं या लंबी कतारों में देर तक खड़े होने से हुई हैं. यह किसी कानून को तोड़ने की वजह से नहीं हुआ है.

दूसरा, यह कि सरकार ने सार्वजनिक यातायात और अस्पतालों में पुरानी नोटों को 24 नवंबर तक मान्य रखा है, जबकि सच्चाई यह है कि मौतें इसीलिए हुई हैं क्योंकि इन जगहों पर पुरानी नोटों को लेने से मना कर दिया गया था. यह इस तथ्य कि पुष्टि करता है कि यह छूट कितनी प्रभावी है.

हां, सरकार से यह अपेक्षा नहीं कि जा सकती कि वह सभी लोगों को देश के कानून का पालन करने के लिए मजबूर कर सके.

यहां यह सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री ने इस तथ्य के बारे में नहीं सोचा कि अगर अस्पताल जैसी जगहें नोटबंदी से संबंधित कानूनों को नहीं मानेगी तो इसके क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं?

सरकार इतनी भी भोली नहीं है कि वह मान ले कि देश का हर नागरिक कानून का पालन करने वाला है.

किसी की मौत ‘छोटा’ बलिदान नहीं

सामाजिक बदलाव के लिए लिए गए सरकारी फैसलों के कारण पहले भी मौतें हो चुकी हैं, जैसे 1990 में मंडल कमीशन के खिलाफ हुए प्रदर्शन में. आखिर में, कोई भी मूलभूत बदलाव जटिल होता है, अगर यह प्रशासन से जुड़ा हो.

कुछ समय के लिए लोगों को छोटे बलिदान भी करने चाहिए अगर इससे लंबे समय के लिए लाभ मिलने की उम्मीद हो (फिर भी मौत किसी भी तरह से ‘छोटा बलिदान’ नहीं है).

हम इस भयानक धारणा को अगर छूट भी दे दें कि 33 लोगों की मौत किसी बड़े हित के लिए हुई है. फिर भी नोटबंदी कहीं से भी काले धन के ऊपर बहुत बड़ा प्रभाव नहीं डालेगा, जो इसका मुख्य लक्ष्य है.

पी. साईनाथ ने अपने लेख पीपुलएस् आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया,  में लिखा है- ‘बहुत से लेखकों, विश्लेषकों और आधिकारिक रिपोर्टों ने इस तथ्य कि पुष्टि की है कि भारत की ‘काली’ अर्थव्यस्था सोने, बेनामी जमीन के सौदों और विदेशी करेंसी में है.’

उन्होंने यह भी बताया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने 2012 की अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि पहले भी दो बार 1946 और 1978 में नोटबंदी असफल हो चुकी है.

फर्स्टपोस्ट के एक अन्य लेख में भी यह कहा गया है कि नोटबंदी से भले ही कुछ लाभ हैं, लेकिन ‘इस तरह का बड़ा बदलाव एक समानांतर अर्थव्यवस्था के अंत को तय नहीं कर सकता.’

हम और भी उदार होकर अगर सोचें कि नोटबंदी काले धन को समाप्त कर देगी. फिर भी यह एनडीए सरकार की गलत सोच है क्योंकि किसी भी तरह का आर्थिक बदलाव चाहे वह कितना ही जरुरी क्यों न हो, किसी व्यक्ति के मानवाधिकार से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकता.

किसी भी निर्दोष व्यक्ति के जीने का अधिकार सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है.

(एजेंसियों के इनपुट्स के साथ)

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