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मायावती के निशाने पर बीजेपी और कांग्रेस...महागठबंधन अब भी दूर की कौड़ी ही है

कांग्रेस के नेतृत्व को भी एसपी-बीएसपी फिलहाल मानने को तैयार होते नहीं दिख रहे हैं. यही वजह है कि चुनाव से पहले महागठबंधन में शामिल होने को लेकर दोनों अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं.

Updated On: Sep 11, 2018 07:46 PM IST

Amitesh Amitesh

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मायावती के निशाने पर बीजेपी और कांग्रेस...महागठबंधन अब भी दूर की कौड़ी ही है
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बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर एक साथ निशाना साधा है. मायावती ने पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की गलत आर्थिक नीतियों पर ही मोदी सरकार आगे बढ़ रही है, जिसकी वजह से पेट्रोल-डीजल के दाम में इस तरह की बढोत्तरी हुई है.

मायावती ने कहा कि पेट्रोल- डीजल की कीमतों को सरकार के नियंत्रण से बाहर रखने की शुरुआत तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए-2 की सरकार में हुई थी. फिर इसके आगे 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सरकार ने कांग्रेस की इस गलत आर्थिक नीति को ही आगे बढ़ाया है.

गौरतलब है कि बीएसपी ने 10 सितंबर को कांग्रेस की तरफ से बुलाए गए भारत बंद से  अपने-आप को अलग रखा था. उन्होंने इस मुद्दे पर भी बोलते हुए कहा कि उनके विरोध का तरीका अलग है. भारत बंद के दौरान कुछ राज्यों में हिंसा को लेकर भी मायावती ने कहा कि इस तरह की हिंसा का वो समर्थन नहीं करती.

एक तरफ जहां भारत बंद के दौरान कांग्रेस के साथ कई विपक्षी दलों ने एकजुटता दिखाने की कोशिश की थी, वहीं दूसरी तरफ, एसपी-बीएसपी दोनों ने ही अपने-आप को भारत बंद से अलग रखा. अब बंद की सफलता का दावा कर रही कांग्रेस केवल बीजेपी सरकार पर हमलावर है, वहीं विपक्षी दलों के कुनबे से ही कांग्रेस के खिलाफ आवाज निकलना उसके लिए परेशानी पैदा करने वाला है.

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मायावती की तरफ से कांग्रेस सरकार की आर्थिक नीति की आलोचना कर और उसी गलत आर्थिक नीति पर बीजेपी के आगे बढने की बात कर मायावती दोनों से फिलहाल समान दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं. मायावती दलितों के मुद्दे से लेकर आर्थिक नीति तक हर बार बीजेपी पर हमलावर ही रही हैं. विपक्ष में रहते उनकी तरफ से ऐसा बयान आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. लेकिन, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर उनका प्रहार विपक्ष के भीतर के सियासी गुणा-गणित की तरफ इशारा कर रहा है.

मोदी के खिलाफ 2019 में महागठबंधन बनाने की तैयारी हो रही है. इसमें बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के अलावा बाकी सभी दलों को साधने की कोशिश की जा रही है. कांग्रेस की तरफ से बनाई जा रही रणनीति में हर राज्य में कांग्रेस उन क्षेत्रीय दलों से सीट शेयरिंग करना चाह रही है, जहां उन क्षेत्रीय दलों का प्रभाव हो. मसलन बिहार में लालू यादव की पार्टी आरजेडी और उसके सहयोगी, यूपी में एसपी, बीएसपी और आरएलडी और इसी तरह पश्चिम बंगाल में टीएमसी और लेफ्ट पार्टियों के साथ गठबंधन की कोशिश की जा रही है.

हर प्रदेश में अलग-अलग पार्टियों के साथ गठबंधन की तैयारी में लगी कांग्रेस उन राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे-पीछे चलने को भी तैयार है, जहां उसकी ताकत कम है. लेकिन, लगता है उसकी इन कोशिशों पर इतनी जल्दी इमारत तैयार होती नहीं दिख रही है.

मायावती ने भारत बंद के बाद जो झटका कांग्रेस को दिया है, उससे कांग्रेस की चिंता बढ़ने वाली है. दरअसल, मायावती की तरफ से दिए गए बयान का सियासी मतलब सीट शेयरिंग को लेकर निकाला जा रहा है. मायावती अभी से ही यूपी के भीतर लोकसभा चुनाव को लेकर सीट शेयरिंग पर कांग्रेस पर दबाव बनाना चाहती हैं.

अभी मध्यप्रदेश, छत्तीगढ, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना में विधानसभा का चुनाव होना है. ऐसे में मायावती की कोशिश इन राज्यों में खासकर मध्यप्रदेश और राजस्थान में अपना प्रभाव जमाने की है. पहले से भी इन राज्यों में बीएसपी चुनाव जीतती रही है. लेकिन, अब विधानसभा चुनाव में मायावती कांग्रेस के साथ अपनी पार्टी का गठबंधन करना चाहती हैं. उनकी तरफ से पहले भी संकेत दिए गए थे, लेकिन, कांग्रेस इन राज्यों में बीएसपी के साथ गठबंधन को लेकर बहुत उत्साहित नहीं है. सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस अगर गठबंधऩ करती भी है तो बीएसपी को उतनी सीटें देने पर राजी नहीं होगी, जितनी बीएसपी चाहती है. कुछ यही हाल एसपी का भी है. उसके साथ भी कांग्रेस मध्यप्रदेश में गठबंधऩ नहीं करना चाहती.

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अब यही बात एसपी-बीएसपी दोनों को खटक रही है. मायावती का कांग्रेस पर दिया बयान और उससे दूरी बनाने की कोशिश को यूपी में लोकसभा चुनाव से पहले संभावित सीट शेयरिंग के फॉर्मूले पर कांग्रेस को दबाव में लाने की कोशिश दिखाता है.

एसपी की तरफ से भी बीच –बीच में कांग्रेस पर दबाव बनाने की कोशिश होती रहती है. सूत्रों के मुताबिक, एसपी प्रमुख अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ अब गठबंधन को लेकर ज्यादा इच्छुक नहीं है. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बुरे अनुभव के बाद अखिलेश यादव को भी लगने लगता है कि यूपी में कांग्रेस को साथ लेने में कोई फायदा नहीं है.

गोरखपुर और फूलपुर के लोकसभा उपचुनाव में यह दिख चुका है. बुआ और बबुआ की जोड़ी ने एक होकर बीजेपी को हरा दिया, जबकि कांग्रेस अलग होकर चुनाव लड़ी थी. हालाकि कैराना में लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने एसपी-बीएसपी-आरएलडी की उम्मीदवार को समर्थन दिया था.

सूत्रों के मुताबिक, यूपी में एसपी-बीएसपी और आरएलडी के बीच महागठबंधऩ बनने की पूरी संभावना दिख रही है. लेकिन, विपक्षी एकता के नाम पर कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने को इनमें कोई भी तैयार होता नहीं दिख रहा है.

दूसरी तरफ, कांग्रेस के नेतृत्व को भी एसपी-बीएसपी फिलहाल मानने को तैयार होते नहीं दिख रहे हैं. यही वजह है कि चुनाव से पहले महागठबंधन में शामिल होने को लेकर दोनों अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं. बीएसपी सुप्रीमो का बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस पर हमला इसी रणनीति को दिखाता है.

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