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बापू को 'चतुर बनिया' कहने पर कांग्रेस को क्यों विरोध करना चाहिए?

बापू की जाति बताने का जितना दुख कांग्रेस को हो रहा है उतना शायद बापू को खुद नहीं था

Vivek Anand Updated On: Jun 11, 2017 05:50 PM IST

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बापू को 'चतुर बनिया' कहने पर कांग्रेस को क्यों विरोध करना चाहिए?

अगर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने बापू को चतुर बनिया के बजाए चतुर गुजराती कहा होता, तो क्या इतना विवाद होता? हालांकि गुजराती समुदाय से होने का अर्थ भी तकरीबन वही निकाला जाता है जो बनिया जाति से तथाकथित तौर पर चिपका है.

गाहे बगाहे इस जाति का नाम कारोबारी चालाकी और कंजूसी को व्यावसायिक कामयाबी से जोड़कर सकारात्मक लहजे में इस्तेमाल होता आया है. इसमें एक जाति की आलोचना से ज्यादा हल्के फुल्के स्तर में इसके सामाजिक और व्यावहारिक गुणों की प्रशंसा ही होती है.

ऐसे उदाहरण नहीं मिलते कि जाति के बतौर ऐसी किसी तुलना को इस समुदाय ने आलोचनात्मक स्तर पर लेते हुए इसका विरोध जताया हो. लेकिन अमित शाह के बयान के मायने इसलिए अलग हो गए हैं क्योंकि इसे राष्ट्रपिता के अपमान के तौर पर देखा जा रहा है. सवाल जाति का जिक्र किए जाने से ज्यादा उनकी मंशा पर है.

अमित शाह ने चतुर बनिया की जगह चतुर गुजराती कहा होता तो शायद इतनी चर्चा ना होती

दरअसल अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के रायपुर में बुद्धिजीवियों के एक समूह को संबोधित करते हुए, महात्मा गांधी का जिस बनिया जाति में जन्म हुआ था उसका उल्लेख किया था. उन्होंने कहा था, ‘महात्मा गांधी दूरदर्शी होने के साथ ही बहुत ‘चतुर बनिया’ थे. उन्हें मालूम था कि आगे क्या होने वाला है. उन्होंने आजादी के बाद तुरंत कहा था कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाना चाहिए. यह काम महात्मा गांधी ने नहीं किया. लेकिन अब कुछ लोग कांग्रेस को भंग करने का काम कर रहे हैं.’

amit shah in raipur

उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने ऐसा इसलिए कहा था क्योंकि कांग्रेस की स्थापना विचारधारा के आधार पर नहीं हुई थी. यह एक तरह से आजादी हासिल करने के लिए ‘विशेष उद्देश्य उपक्रम’ सरीखा था.

इस बात की अक्सर चर्चा होती रही है कि महात्मा गांधी का विचार था कि आजादी के बाद कांग्रेस को भंग कर दिया जाए. अमित शाह ने कोई अलग बात नहीं कही थी लेकिन ताजा राजनीतिक विमर्श में इस बात की चर्चा से लेकर तीखी आलोचना इसलिए हो रही है क्योंकि ये बीजेपी के अध्यक्ष का बयान है. फिर चाहे वो बयान किसी भी संदर्भ में दिया गया हो.

एक सोच के खांचे में ये बिल्कुल फिट बैठता है कि बिना संदर्भ की फिक्र किए अमित शाह को इस गैरजरूरी बयान के लिए आड़े हाथों लिया जाए. दूसरी तरह की सोच के लिए बिल्कुल सीमित जगह है, जिस पर चर्चा करना भी खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि मामला राष्ट्रपिता के सम्मान का बना दिया गया है.

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अगर अमित शाह ने चतुर बनिया की जगह चतुर गुजराती कहा होता तो शायद इतना बवाल नहीं होता. क्योंकि एक तो एक समुदाय के तौर पर गुजराती को कामयाब कारोबारी का दर्जा हासिल है इसलिए इसे लोग अन्यथा नहीं लेते और दूसरी अमित शाह खुद इस समुदाय से आते हैं, सो उन्हें इस पर बोलने का स्वाभाविक तौर पर हक हासिल है.

इसी बात से ये भी समझा जा सकता है कि चूंकी अमित शाह ने बापू का जिक्र करते हुए बयान दिया है, जिस पर बोलने का स्वाभाविक हक सिर्फ कांग्रेस को हासिल है. इसका खामियाजा अमित शाह को तो भुगतना ही होगा. भले ही वो अब कितनी भी बार इसका संदर्भ समझने की गुजारिश करते रहें.

अमित शाह के बयान पर महात्मा गांधी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी ने बड़ा सधा हुआ जवाब दिया. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपिता अपने कार्टूनों पर हंसा करते थे और ‘चतुर बनिया’ टिप्पणी के ‘बदमजा’ होने और इसके पीछे छिपी गलत मंशा को लेकर उन्हें हंसी आ गई होती.

महात्मा गांधी चतुर बनिया से कहीं अधिक थे

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी ने इस मामले पर ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि ‘ब्रिटिश शेरों’ और देश में ‘सांप्रदायिक जहर वाले सांपों’ पर जीत हासिल करने वाला शख्स ‘चतुर बनिया’ से कहीं अधिक था.

राजमोहन गांधी फिलहाल अमेरिका में हैं. जीवनीकार और अमेरिका के इलिनॉय विश्वविद्यालय में शोध प्रोफेसर गांधी ने ई-मेल के जरिए भेजे गए जवाब में कहा, 'जिस व्यक्ति ने ब्रिटिश शेरों और सांप्रदायिक जहर वाले सांपों पर जीत हासिल की, वह चतुर बनिया से कहीं अधिक था. अमित शाह जैसे लोगों के विपरीत आज उनका लक्ष्य निर्दोष और कमजोर लोगों का शिकार कर रही शक्तियों को पराजित करना होता.'

दरअसल कांग्रेस की राजनीति ने बापू की छवि का इतना दोहन किया है कि बीजेपी और संघ उससे आगे की सोच ही नहीं सकते. वर्षों से बीजेपी और संघ की राजनीति ने कभी इसकी परवाह भी नहीं की. शायद इसलिए बीजेपी और संघ की आज की राजनीति में बापू से ज्यादा बाबा साहेब अंबेडकर प्रासंगिक हो गए हैं.

बीजेपी खुद संघ और हिंदू वाहिनी जैसे अपने सहयोगियों की चपेट में आती रही है

बीजेपी खुद संघ और हिंदू वाहिनी जैसे अपने सहयोगियों की चपेट में आती रही है

अगर अमित शाह की गलत मंशा जाहिर होती है तो वो इसी राजनीति से समझी जा सकती है. सवाल है कि बापू पर ठसक से अपना हक जताने वाली कांग्रेस उनके जीवनमूल्यों, आदर्शों और देश की आम जनता के लिए उनकी सोच को कितना आगे बढ़ा रही है?

विपक्षी दलों ने एकस्वर में इस बयान की आलोचना की है. कांग्रेस के रणदीप सुरजेवाला, सीपीएम के प्रकाश करात से लेकर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है. अमित शाह से लेकर पीएम मोदी तक से माफी मांगने की मांग उठ रही है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने पूछा, ‘जातिवाद से लड़ने के बजाय उन्होंने राष्ट्रपिता की ही जाति बताना शुरू कर दिया. इससे सत्तारूढ़ दल और उसके अध्यक्ष का चरित्र और विचारधारा का पता चलता है. ऐसे लोग देश को कहां ले जाएंगे.’

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हालांकि बापू की जाति बताने का जितना दुख कांग्रेस को हो रहा है उतना शायद बापू को खुद नहीं था. महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा ‘माई एक्सपेरिमेंट विद ट्रूथ’ में खुद को बनिया बताया था. किताब के 12वें चैप्टर में अपने इंग्लैंड प्रवास के बारे में उन्होंने लिखा है, मेरी जाति के लोग मेरे विदेश जाने को लेकर विरोध कर रहे थे. एक भी मोध बनिया अब तक इंग्लैंड नहीं गया था.’

किताब के एक और हिस्से में बापू अपनी जाति का जिक्र करते हैं. बापू ने लिखा है, इसलिए मैंने अपनी पत्नी और बच्चों के पहनावे को तय किया. मैं ये कैसे पसंद करता कि उन्हें काठियावाड बनिया के तौर पर पहचाना जाए.’

टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक और किस्से का जिक्र किया है जिसमें बापू ने बेहिचक अपनी जाति का उल्लेख किया था. इस किस्से के मुताबिक पालमपुर के नवाब मुहम्मद तल्ले खान और महात्मा गांधी के बीच गहरी दोस्ती थी. एक किस्सा ये है कि गांधी जी जब भी साबरमती से दिल्ली आना-जाना करते,  नवाब को जानकारी दे दी जाती. दिल्ली से अहमदाबाद के रेल रूट पर उनकी ट्रेन जब भी पालमपुर से गुजरती नवाब मुहम्मद तल्ले खान अमीरगढ़ रेलवे स्टेशन पहुंच जाते और कुछ दूरी तक उनके साथ सफर करते.

जब महात्मा गांधी के जवाब पर हंसने लगे सभी

1931 में एक ऐसा ही वाकया है. नवाब साहब को तार मिला कि गांधी जी दिल्ली मेल से लौट रहे हैं. नवाब साहब बकरी का दूध और कुछ फल लेकर अमीरगढ़ रेलवे स्टेशन पहुंच गए.

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नवाब साहब बापू के कूपे में सवार हुए लेकिन किस्मत से उस दिन सोमवार पड़ गया था. इस दिन गांधी जी मौन धारण करते थे और बात करने के लिए स्लेट और चॉक का इस्तेमाल करते थे. फल और दूध गांधी जी को देकर नवाब ने स्लेट उठाई और तीन सवाल लिखे-

पहला सवाल था- आपकी सेहत कैसी है?

दूसरा सवाल था- आप साबरमती में कितने दिन रुकेंगे ?

तीसरा सवाल था-  बच्चों के खेलने वाले नोटों पर आपकी तस्वीर छपने लगी है. असल नोट पर आपकी तस्वीर कब छपेगी?

इस पर महात्मा गांधी ने स्लेट उठाई और जवाब लिखा.

पहले सवाल का उन्होंने जवाब लिखा-  बेहतर होता आप ट्रेन में मेरे साथ चल रहे आम लोगों का हाल भी पूछ लेते.

दूसरे सवाल का जवाब लिखा- मैं साबरमती आश्रम में तब तक रहूंगा जब तक अंग्रेज रहने देंगे.

तीसरे सवाल का जवाब उन्होंने नहीं दिया. उन्होंने वो सवाल ही मिटा दिया. जब नवाब ने जानना चाहा कि उनके तीसरे सवाल का क्या हुआ तो गांधी जी ने लिखा- आपने मुझे दूध और फल दिए. यानी दो चीजें दी. फिर आप मुझसे तीन जवाबों की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. मैं भी बनिया हूं, आप मुझे बेवकूफ नहीं बना सकते.

इसके बाद खुलकर ठहाके लगे.

बापू ने बहुत ही हल्के-फुल्के अंदाज में ये बात कही थी. अपनी जाति के व्यावहारिक गुण की ओर मजाकिया लहजे में इशारा किया था.

अमित शाह का बयान भी हल्के-फुल्के अंदाज में लिया जा सकता था. लेकिन आरोप-प्रत्यारोप के घोर संवेदनहीन दौर में इसकी अपेक्षा रखना बेमानी है. कांग्रेस के लिए और भी...क्योंकि पार्टी अपने बेहद तकलीफदेह दौर में है.

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