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जीजेएम में गुटबाजी बनी दार्जिलिंग हिल्स में शांति बहाली की राह में रोड़ा

जीजेएम लीडर गुरुंग ने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बातचीत करने की इच्छा जाहिर की थी ताकि दार्जिलिंग और कालिमपोंग जिलों में चल रहे संकट को खत्म किया जा सके

Marcus Dam Updated On: Jan 18, 2018 08:38 AM IST

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जीजेएम में गुटबाजी बनी दार्जिलिंग हिल्स में शांति बहाली की राह में रोड़ा

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के नेता बिमल गुरुंग के बढ़ाए गए दोस्ती के हाथ पर पश्चिम बंगाल सरकार का रेस्पॉन्स रुखा और उपेक्षापूर्ण रहा है. जीजेएम लीडर गुरुंग ने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बातचीत करने की इच्छा जाहिर की थी ताकि दार्जिलिंग और कालिमपोंग जिलों में चल रहे संकट को खत्म किया जा सके.

इस कदम से राज्य के पहाड़ी इलाके में एक बार फिर से हलचल पैदा हो गई. लेकिन, केंद्र के राज्य सरकार के साथ स्थानीय नेताओं के मिल-बैठकर मसलों को दूर करने की कोशिशें सफल होती फिलहाल नहीं दिख रही हैं. पिछले साल से राज्य के पहाड़ी इलाकों में गोरखालैंड को लेकर आंदोलन चल रहा है.

राज्य सरकार के बूते हिल्स पर सत्ताधारी व्यवस्था ने गुरुंग के खिलाफ फिर से मोर्चा खोलने में देरी नहीं की. गुरुंग के कदम को राजनीतिक ड्रामा बताया गया और इसे हिल्स पर हालात सामान्य करने को रोकने वाला कदम कहा गया. इसमें उनपर बीजेपी की कठपुतली की तरह से काम करने का भी आरोप लगा. गुरुंग के सहयोगियों ने भी पटलवार करने में देरी नहीं की. उन्होंने कहा कि असली कठपुतली राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के बिनय तमांग हैं.

तमांग जीजेएम लीडरशिप के एक बड़े हिस्से पर कब्जा रखते हैं साथ ही वह गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) के प्रशासकों के बोर्ड के प्रमुखों में भी हैसियत रखते हैं. दरअसल, जीजेएम पार्टी दो हिस्सों में बंट चुकी है. गुरुंग का राज्य सरकार के साथ बातचीत का प्रस्ताव इनकी आपसी टूट को ही दिखाता है.

गुरुंग के रुख में क्यों आया बदलाव?

दूसरी चीजों के साथ गुरुंग के रुख में बदलाव जीजेएम में गुटबाजी का प्रमाण है. पहले गुरुंग राज्य सरकार के साथ किसी भी तरह की बातचीत के सख्त खिलाफ थे. राज्य सरकार के साथ बातचीत का प्रस्ताव ऐसे वक्त पर आया है जबकि गुरुंग लंबे वक्त से हिल्स में मौजूद नहीं रहे हैं. इसके चलते तमांग को अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका मिला है. लुक-आउट नोटिस के जारी होने के बाद से गुरुंग फरार चल रहे हैं. उनपर राज्य सरकार ने कई तरह के आपराधिक आरोप भी थोप दिए हैं.

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राजनीतिक तौर पर बैकफुट पर धकेल दिए जाने के साथ ही गुरुंग के कदम की टाइमिंग भी खास है. सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार की उस याचिका की सुनवाई करने वाला है जिसमें राज्य सरकार के गुरुंग के खिलाफ एक्शन लेने को रोकने वाले नोटिस को वापस लेने की मांग की गई है.

साथ ही राजनीतिक तौर पर बेहद महत्व रखने वाले एक घटनाक्रम में तमांग ने दार्जिलिंग के तुकवार इलाके का रविवार को दौरा किया. इस इलाके को गुरुंग का गढ़ माना जाता है. कानून से छिपने से पहले तक यहीं से गुरुंग सत्ता को कंट्रोल किया करते थे.

representational image

तमांग और गुरुंग में कौन है बड़ा नेता?

जीजेएम के दो गुटों में बंटने के बाद पहली बार तमांग के तुकवार का दौरा करने से राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई है. तमांग के इस कदम को उनके कॉन्फिडेंस और पार्टी पर कंट्रोल लेने के तौर पर देखा जा रहा है. इस तरह के कयास पूरी तरह से गलत नहीं हैं, खासतौर पर तब जबकि जीजेएम के कंट्रोल वाली तीनों पहाड़ी नगरपालिकाएं उनके कैंप के लोगों के हाथ में हैं.

दोनों लोगों में से किसकी लोकप्रियता ज्यादा है इस बात का फैसला केवल चुनाव के जरिए हो सकता है, लेकिन इनके आसार हाल-फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं. हालांकि, जीटीए में चुनाव पिछले साल जुलाई में ही होने थे. इसके एक महीने पहले संस्था के चुने हुए सदस्यों ने अलग राज्य की मांग के लिए हो रहे विरोध प्रदर्शनों के समर्थन में एकसाथ इस्तीफा दे दिया था.

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ममता के हिसाब से चुनाव रुक सकते हैं. उन्होंने अपने पत्ते काफी संभलकर खेले हैं. उन्होंने गुरुंग को राज्य के साथ बात करने के लिए मजबूर किया है, हालांकि ममता की शायद उनके खिलाफ आपराधिक आरोप लगाने को लेकर दिलचस्पी नहीं थी. जीजेएम लीडर हालांकि, लगातार दावा कर रहे हैं कि राज्य पुलिस ने उन्हें और उनके समर्थकों को झूठे आरोपों में फंसाया है.

क्यों नहीं हो रही है बातचीत की शुरुआत?

पिछले साल के विरोध-प्रदर्शनों के खिलाफ पुलिस की सख्त कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए गए हैं कि क्या इनका मकसद खास राजनीतिक हितों को अंजाम देना था? लेकिन, यह खारिज नहीं किया जा सकता कि मुख्यमंत्री ने इस विरोध-प्रदर्शन के मुख्य नेताओं को आपस में लड़वाने और अपनी डिमांड्स से भटकाने में कम से कम फिलहाल सफलता हासिल की है.

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के लीडर बिमल गुरुंग अपने समर्थकों के साथ मीटिंग करते हुए.

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के लीडर बिमल गुरुंग अपने समर्थकों के साथ मीटिंग करते हुए.

हालांकि, जमीन पर हालात अभी भी उतने दुरुस्त नहीं दिखाई दे रहे और ममता अभी भी इस इलाके का दौरा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई हैं. उन्हें शायद और लंबा इंतजार करना होगा.

गुरुंग के हालिया प्रस्ताव पर नई दिल्ली ने कोई आधिकारिक कमेंट नहीं किया है. हालांकि हो सकता है कि बंद दरवाजों के पीछे काफी कुछ कहानी रची जा रही हो. लेकिन, इससे संबंधित स्टेकहोल्डर्स के साथ संयुक्त बातचीत की शुरुआत करने के मकसद में मदद नहीं मिल रही है.

बीजेपी की जीजेएम के साथ या गुरुंग में आस्था रखने वाले जीजेएम के एक गुट के साथ नजदीकी इस तरह की बातचीत की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है क्योंकि ममता तमांग और उनके सहयोगिकों के गुट को सपोर्ट कर रही हैं. न केंद्र और न ही राज्य सरकार इस बात को तय कर पा रहे हैं कि हिल्स के सबसे प्रभावी राजनीतिक दल के तौर पर कौन सा गुट इस बातचीत में प्रतिनिधि के तौर पर होगा. जीजेएम का गुटों में बंटना हिल्स में शांति की बहाली की राह में रोड़ा बना हुआ है. फिलहाल यह गतिरोध खत्म होता नहीं दिख रहा.

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