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क्या दलित राजनीति को साध पाएगा नीतीश का नया फॉर्मूला

नीतीश कुमार ने अशोक चौधरी के सहारे दलित राजनीति में संतुलन बनाने की कोशिश की है, जिसे नीतीश का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है

Updated On: Mar 01, 2018 05:22 PM IST

Amitesh Amitesh
विशेष संवाददाता, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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क्या दलित राजनीति को साध पाएगा नीतीश का नया फॉर्मूला

जीतनराम मांझी ने पल्टी क्या मारी बिहार की सियासत में गरमा-गरमी शुरू गई. आरजेडी ने इसे मेजर ब्रेकथ्रू के तौर पर प्रचारित करने की कोशिश की. माहौल ऐसा बनाया गया जैसे मांझी के पाला बदलने से बिहार की सियासत में बड़ा बदलाव आ जाएगा.

लेकिन, बिहार की सियासत में इस वक्त सबसे बड़े चाणक्य माने जाने वाले नीतीश कुमार ने देर नहीं की. पलक झपकते ही मांझी की चाल का जवाब देने के लिए अपना दांव चल दिया. आखिरकार हुआ वही जिसके लंबे वक्त से कयास लगाए जा रहे थे.

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और एमएलसी अशोक चौधरी ने अपने चार सहयोगियों के साथ कांग्रेस से अलग होकर जेडीयू का दामन थामने का ऐलान कर दिया. अशोक चौधरी के साथ, दिलीप चौधरी, रामचंद्र भारती और तनवीर अख्तर जेडीयू में शामिल हो गए. ये चारों एमएलसी हैं और इन्होंने विधानपरिषद के सभापति को इस बाबत सहमति पत्र भी दे दिया है.

बिहार विधानपरिषद में कांग्रेस के 6 एमएलसी थे लेकिन, चार एमएलसी के अलग हो जाने के बाद अब महज 2 ही एमएलसी बचे हैं. 6 में 4 एमएलसी यानी दो तिहाई के अलग होने के कारण इन पर दलबदल विरोधी नियम के तहत कार्रवाई भी नहीं हो सकती.

अशोक चौधरी महागठबंधन की सरकार में शिक्षा मंत्री थे और इसी दौरान उनकी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ नजदीकी बढी है. पिछले साल जुलाई में ही महागठबंधन की सरकार गिरने के बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि अशोक चौधरी अपने समर्थकों के साथ जेडीयू में शामिल हो सकते हैं.

ashok choudhary

इस बीच अशोक चौधरी को कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया. फिर भी वो मौके की ताक में थे.

लेकिन, मांझी की काट के तौर पर नीतीश कुमार ने अशोक चौधरी को अपने घर में लाने का फैसला कर लिया. दरअसल, अशोक चौधरी भी दलित समुदाय से हैं. ऐसे में जीतनराम मांझी के एनडीए से अलग होने के कारण परसेप्शन की लड़ाई में हो रहे डैमेज को कंट्रोल करने की कोशिश की गई. वरना अशोक चौधरी उसी दिन जेडीयू में शामिल नहीं होते जिस दिन मांझी की बगावत हुई.

जेडीयू के भीतर भी उदयनारायण चौधरी और श्याम रजक जैसे पार्टी के दलित नेताओं की नाराजगी भी रह-रह कर सामने आती रही है. हालाकि सूत्र बता रहे हैं कि श्याम रजक को मना लिया गया है, लेकिन, विधानसभा के पूर्व स्पीकर उदयनारायण चौधरी अलग रास्ते पर चलने का मन बना चुके हैं. उनका भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर ही आरोप है, पार्टी के भीतर दलितों की उपेक्षा का.

दलित-महादलित राजनीति को साधने की कोशिश में लगे नीतीश कुमार को इस बात का एहसास पहले से ही था, लिहाजा उन्होंने अशोक चौधरी को अपने पाले मे लाने का फैसला कर लिया था. हो सकता है कि अशोक चौधरी को सरकार में शामिल कर उनके चेहरे का फायदा उठाने की कोशिश हो.

अब कांग्रेस में मचेगी खलबली?

विधान परिषद में झटका खाने के बाद कांग्रेस के लिए अब विधानसभा में अपने सभी विधायकों को एकजुट रखने की चुनौती होगी. कांग्रेस के 27 विधायकों में से कई विधायक अशोक चौधरी के पक्ष में खुलकर बोल रहे हैं. बरबीघा से विधायक सुदर्शन का कहना है कि अशोक चौधरी हमारे बड़े भाई की तरह हैं. वो जहां रहेंगे हम उनके साथ रहेंगे. बक्सर के कांग्रेस विधायक मुन्ना तिवारी और औरंगाबाद के विधायक आनंद शंकर ने अशोक चौधरी के समर्थन में बयान दिया है.

अटकलें इस बात की लगाई जा रही हैं कि कई और ऐसे विधायक हैं जो कांग्रेस का साथ छोड़ जेडीयू का दामन थाम सकते हैं. लेकिन, कांग्रेस विधायक दल में टूट के लिए 27 में से दो तिहाई यानी 18 विधायकों की जरूरत होगी, फिलहाल ऐसा आसान नहीं लग रहा है.

दूसरी तरफ, जीतनराम मांझी के महागठबंधन के साथ आने के बाद उत्साहित आरजेडी की तरफ से और दावे किए जा रहे हैं. तेजस्वी यादव ने जेडीयू के कई विधायकों के आरजेडी में आने का दावा किया है.

फिलहाल बिहार की राजनीति करवट ले रही है और छोटे-छोटे दलों के बदलते स्टैंड और संभावित टूट-फूट और पाला बदलने की कोशिश ने इस वक्त बिहार की सियासत में होली से पहले ही हलचल मचा दी है.

क्यों हुए मांझी अलग?

nitish kumar jitanram manjhi

बड़े वोट बैंक का दावा करने वाले जीतन राम मांझी की पार्टी हम को पिछले विधानसभा चुनाव में मिली महज एक सीट की जीत से ही उनकी क्षमता और उनकी मास अपील पर सवाल खड़े हो गए थे.पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी खुद दो-दो सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद एक सीट पर ही जीत दर्ज कर पाए थे.

बावजूद इसके मांझी अपने-आप को पूर्व मुख्यमंत्री के वहम से बाहर निकाल नहीं पा रहे थे. नीतीश कुमार के साथ बिहार में सरकार बना लेने के बाद बीजेपी के लिए भी जीतनराम मांझी का महत्व अब उतना नहीं रह गया था.

ये बात अलग है कि जीतनराम मांझी को ब्रांड मांझी बनाने में बीजेपी का ही सबसे बड़ा योगदान था. पर्दे के पीछे से बीजेपी की शह पर जीतनराम मांझी ने बगावत का बिगुल फूंक दिया था और उस वक्त नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर गए थे.

नीतीश कुमार के बीजेपी से अलग होने का नतीजा ही था जिसके चलते बिहार में बीजेपी के साथ रामबिलास पासवान की पार्टी एलजेपी और उपेंद्र कुशावाहा की पार्टी आरएलएसपी का समझौता हुआ था. मांझी की पार्टी तो लोकसभा चुनाव के बाद बदले हालात में सामने आई जिसके बाद बीजेपी के साथ तीन-तीन दलों का गठबंधन हो गया.

लेकिन, अब हालात पूरी तरह से बदल गए हैं. नीतीश कुमार के फिर से बीजेपी के साथ आने के बाद अब बीजेपी के लिए सबसे बड़े सहयोगी के तौर पर जेडीयू हो गई है. ऐसे में बीजेपी-जेडीयू की पुरानी जोडी फिर से बिहार की सत्ता में है.

ऐसे में एनडीए के घटक दलों एलजेपी, आरएलएसपी और हम के लिए गठबंधन में अपने भविष्य और अपने हक को लेकर संशय बना हुआ है. खींचतान का ही नतीजा है कि मांझी इस वक्त एनडीए से बाहर हो गए हैं, जबकि उपेंद्र कुशवाहा को लेकर भी संशय बना हुआ है.

लेकिन, जीतनराम मांझी के एनडीए से बाहर होकर महागठबंधन का हिस्सा बनने के बाद नीतीश कुमार ने अशोक चौधरी के सहारे दलित राजनीति में संतुलन बनाने की कोशिश की है, जिसे नीतीश का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है.

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