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बिहार पॉलिटिक्स: बीजेपी-आरजेडी के सहारे आगे बढ़ो, फिर दोनों को आंखें दिखाओ

बिहार में बाकी दल बारी-बारी से बीजेपी और आरजेडी का सहारा लेकर आगे बढ़ जाते हैं. कामयाबी मिलने के बाद दोनों को आंखें दिखाते हैं

Updated On: Jun 08, 2018 04:31 PM IST

Arun Ashesh

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बिहार पॉलिटिक्स: बीजेपी-आरजेडी के सहारे आगे बढ़ो, फिर दोनों को आंखें दिखाओ

बिहार में बीजेपी और आरजेडी एक दूसरे के घोर विरोधी हैं. लेकिन दोनों में एक मोर्चे पर जबरदस्त समानता है. बाकी दल बारी-बारी से इन दोनों दलों का सहारा लेकर आगे बढ़ जाते हैं. कामयाबी मिलने के बाद दोनों को आंखें दिखाते हैं. यह सिलसिला राजनीति में मंडल और मंदिर के बड़ा चुनावी मुद्दा बन जाने के दौर से शुरु हुआ और आजतक जारी है.

इस समय बीजेपी को जेडीयू, एलजेपी और आरएलएसपी आंखें दिखा रही हैं. उधर, आरजेडी को संदेश दिया जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा को अगला सीएम घोषित करो तो आरएलएसपी महागठबंधन में शामिल हो सकती है. केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा खुद चुप हैं. उनकी पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नागमणि इस संदेश के वाहक बने हुए हैं. जहां तक बीजेपी का सवाल है, वह सीएम के पचड़े में नहीं पड़ रही है. डिप्टी सीएम बार-बार कह रहे हैं कि नीतीश कुमार ही एनडीए के अगले सीएम होंगे.

कांग्रेस की जगह ले चुकी है बीजेपी

1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता से निकलकर विपक्ष में बैठ गई थी. पांच साल बाद हुए चुनाव में कांग्रेस का विपक्ष का दर्जा भी खत्म हो गया. बीजेपी मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई. 1995 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन जनता दल 167 सीट लेकर अजेय बनकर उभरा. तब बिहार का विभाजन नहीं हुआ था. शरद यादव और रामविलास पासवान सरीखे नेता जनता दल के अंग थे. कांग्रेस 71 से घटकर 29 पर आ गई थी. बीजेपी के 41 विधायक जीतकर आए थे. वैसे, तो 1990 में बीजेपी 39 सीटों पर जीती थी. लेकिन, उसके 13 विधायक संपूर्ण क्रांति दल बनाकर सत्तारूढ़ जनता दल में शामिल हो गए थे. इस तरह बीजेपी सिर्फ 26 विधायकों के साथ विधानसभा चुनाव में गई थी.

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उस संख्या के आधार पर देखें तो उसे शुद्ध रूप से 15 विधायकों का लाभ मिला. जबकि कांग्रेस 42 सीट गंवाकर तीसरे नंबर की पार्टी बन गई. बीजेपी के वोट बैंक में भी करीब दो फीसदी का इजाफा हुआ था. मंडल मंदिर के बाद 1995 में बीजेपी पहली बार अपने दम पर विधानसभा का चुनाव लड़ रही थी. 1990 में कांग्रेस विरोध के नाम पर जनता दल से उसका समझौता हुआ था. समझौता पूर्ण नहीं था. कुछ सीटों पर दोस्ताना मुकाबला भी था.

टर्निंग पॉइंट था 1995 का विधानसभा चुनाव

उसी चुनाव में यह धारणा बनी कि अलग-अलग रहकर लालू प्रसाद को परास्त नहीं किया जा सकता है. 310 सीट पर लड़कर सिर्फ सात सीटों पर जीत हासिल करने वाली समता पार्टी ने बीजेपी के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया. संयोग से 10 सीटों पर उपचुनाव हुआ. बीजेपी-समता साझे में चुनाव लड़े. चार सीटों पर इस नए बने गठबंधन को कामयाबी मिल गई. तय पाया गया कि अगले चुनाव साझे में लड़े जाएं. लोकसभा चुनावों में भी बीजेपी-समता की दोस्ती कायम रही. बाद में इस गठबंधन में शरद यादव और रामविलास पासवान शामिल हुए. 1997 में लालू प्रसाद ने आरजेडी का गठन कर लिया. मूल जनता दल का नेतृत्व शरद यादव के पास रह गया. समता पार्टी के जनता दल में विलय के बाद जेडीयू के नाम से नई पार्टी बनी. 2014 के लोकसभा और 2015 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दे तो बीजेपी और जेडीयू हमेशा साझे में चुनाव लड़े.

लगातार बढ़ता गया बीजेपी का ग्राफ

लोकसभा के साथ विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी का ग्राफ बढ़ता गया. 2000 में आरजेडी के बाद बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी थी. आरजेडी के 124 और बीजेपी के 67 विधायक जीते थे. समता पार्टी के 34 और जदयू के 21 विधायक जीते थे. उस समय बीजेपी ने एनडीए में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी नीतीश के नेतृत्व को स्वीकार किया. नीतीश सात दिनों के लिए सीएम बने. बहुमत नहीं मिलने के कारण सरकार चल नहीं पाई. कांग्रेस, जेएमए, वाम और निर्दलीय विधायकों की मदद से आरजेडी की सरकार बनी. वह सरकार पूरे पांच साल तक चली.

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गोधरा कांड के बाद रामविलास पासवान एनडीए और जेडीयू से अलग हो गए. एलजेपी के नाम से नई पार्टी बनाई. 2004 के लोकसभा चुनाव में पासवान ने आरजेडी का सहारा लिया. यूपीए को अच्छी कामयाबी मिली. यूपीए वन की सरकार में वे केंद्रीय मंत्री बने. 2000 में झारखंड के निर्माण के साथ विधानसभा के सदस्यों का बंटवारा हो गया. जेडीयू की मदद से झारखंड में बीजेपी की पहली सरकार बनी. दक्षिण बिहार में बीजेपी पहले से मजबूत थी. लिहाजा, बिहार विभाजन के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में (2005) बीजेपी की सीटें स्वाभाविक तौर पर कम हुई. वोट परसेंटेज भी कम हुआ. हालांकि बाद के चुनावों में दोनों में इजाफा हुआ.

2005 में हुए दो चुनाव, सीएम बने नीतीश

बीजेपी और आरजेडी के सहारे वैतरणी पार करने की कथा 2005 में अधिक तल्खी से साबित हुई. फरवरी के चुनाव में 75 सीट जीतकर आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनी. यूपीए गठबंधन में आरजेडी के एलजेपी, कांग्रेस और सीपीआई-सीपीएम शामिल थे. एलजेपी के 29 और कांग्रेस के 10 विधायक जीते थे.

रामविलास पासवान ने यह कहकर आरजेडी की सरकार बनने से रोक दिया कि वे किसी मुस्लिम के सीएम बनाने पर ही आरजेडी को अपनी पार्टी का समर्थन देंगे. खैर, पासवान की जिद का असर एलजेपी विधायक दल पर पड़ा. बड़ी संख्या में उनके विधायक एनडीए के पक्ष में खड़े हो गए. केंद्र में यूपीए वन की सरकार थी. विधायकों की छीना-झपटी के बीच राज्य में प्रेसीडेंट रूल लगा दिया गया. अक्तूबर-नवंबर में दूसरी बार विधानसभा का चुनाव हुआ. एनडीए अपने दम पर पूर्ण बहुमत में आया. जीतनराम मांझी के छोटे कार्यकाल को छोड़ दें तो नीतीश तब से लगातार सीएम हैं.

अकेले लड़ने से डरते हैं सभी दल

यह ठीक है कि चुनाव से पहले अधिक सीटों पर जीत के लिए सभी दल अपने बड़े जनाधार का दावा करते हैं. लेकिन, सच यह है कि अकेले मैदान में जाने से सबके पेट का पानी हिलने लगता है. इसकी वजह भी है. देखिए कि अकेले लड़ने पर किसको क्या मिला है- नीतीश कुमार दो बार अकेले लड़े. हालांकि, उसमें भी वाम दलों से सांकेतिक तौर पर गठबंधन किया था. 1995 में उनकी समता पार्टी 310 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ी. सात पर जीती. 7.06 फीसदी वोट आया.

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करीब नौ साल मुख्यमंत्री रहने के बाद 2014 में उन्होंने एक बार फिर अकेले लड़ने का फैसला किया. उस चुनाव में 38 सीटों पर जेडीयू के उम्मीदवार खड़े थे. दो सीटें सीपीआई के लिए छोड़ दी थी. दो पर जीत हुई. वोट परसेंटेज जरूर बढ़ा. यह 15.80 फीसद पर पहुंच गया. अक्तूबर 2005 में एलजेपी 210 सीटों पर लड़ी. 10 पर जीत हुई. 2010 में कांग्रेस अचानक जोश में आ गई थी. वह सभी 243 सीटों पर लड़ी. पार्टी के इतिहास में उसे सबसे खराब परिणम हासिल हुआ. महज चार विधायक जीत कर आए. आरएलएसपी नई पार्टी है. वह कभी अकेले चुनाव नहीं लड़ी. लोकसभा में एनडीए गठबंधन के तौर पर उसे तीन सीटें दी गई थीं. तीनों पर जीत हुई. 2015 का विधानसभा चुनाव परिणाम उसके हक में नहीं गया.

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