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बिहार: विकास का नारा, मगर चुनाव के लिए आरक्षण का ही सहारा

हाल के दिनों में नीतीश कुमार ने आरक्षण का दायरा बढ़ाने की वकालत कर इस आधार पर राजनीति करने वालों को चौंका दिया है

Updated On: May 26, 2018 09:23 AM IST

Arun Ashesh

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बिहार: विकास का नारा, मगर चुनाव के लिए आरक्षण का ही सहारा

यह बिहार की राजनीति की त्रासदी है. हरेक राजनीतिक दल के एजेंडे में विकास है. केंद्र और राज्य सरकार से जुड़े राजनीतिक दल विकास योजनाओं को जमीन पर उतारने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों सरकारों के प्रयास से विकास हो भी रहा है. लेकिन, हैरत की बात यह है कि वोट के लिए विकास पर भरोसा नहीं किया जाता है.

उसके लिए जाति और आरक्षण का ही सहारा लिया जाता है. इस मोर्चे पर कोई दल अपवाद नहीं होना चाहता. लिहाजा, अगले लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए अभी से जाति के समीकरण दुरुस्त किए जा रहे हैं. सरकारी के साथ निजी सेवाओं में आरक्षण दिलाने का भरोसा इस गोलबंदी का सबसे बड़ा आधार बन रहा है.

विकास पुरुष को भी जाति का सहारा

सीएम नीतीश कुमार को उनके समर्थक विकास पुरुष का दर्जा देते हैं. उनकी पहचान ऐसे राजनेता के तौर पर स्थापित हुई है, जिन्होंने राजनीति के केंद्र में विकास को ही रखा है. सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मोर्चे पर उनकी कामयाबी नजर भी आ रही है. आलोचना के बावजूद शराबबंदी ने उनका कद बढ़ाया है. शराबबंदी का लक्षित समूह गरीब वर्ग था. इस तबके को इसका लाभ मिला है. इसमें कोई दो राय नहीं कि बंदी के बावजूद राज्य में शराब की अबाध आपूर्ति हो रही है. फिर भी यह गरीबों की पहुंच से दूर है. शराबबंदी ने तस्करों और पुलिसवालों को मालामाल किया है.

nitish kumar

दूसरा पक्ष यह भी है कि इसके चलते असमय बुजुर्ग हो रहे जवानों के चेहरे पर रौनक लौट आई है. कई उजड़े घर नए सिरे से संवर रहे हैं. पढ़ाई के स्तर में गिरावट के बावजूद स्कूलों में छात्र-छात्राओं के दाखिले की रफ्तार कम नहीं हुई है. कोशिश हो रही है कि शिक्षकों की नई बहालियों में काबिल लोगों को तरजीह मिले. आरोप यही लगा था कि पहले हुई शिक्षकों की बहाली में अयोग्य लोग जगह पा गए थे. जो खुद ढंग से नहीं पढ़े हैं, वे दूसरों को कैसे पढ़ाएंगे.

वोट बैंक बढ़ाने में कारगर रहा है यह फार्मूला

नीतीश कुमार ने अपने शासन के पहले दौर में पंचायतों में आरक्षण लागू कर बड़ा कदम उठाया था. इसके तहत पंचायतों में महिलाओं, अनुसूचित जातियों, जनजातियों, महिलाओं और अति पिछड़ों को आरक्षण दिया गया. आरक्षण से पंचायतों का स्वरूप पूरी तरह बदल गया. सरकार के फैसले से सवर्णों में भले ही नाराजगी हुई, मगर समाज के बाकी हिस्से पर इसका व्यापक असर पड़ा. इससे पहले राज्य की पंचायतों में मुखिया का पद कमोवेश वंशानुगत हो चला था. आरक्षण ने इस प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया.

2010 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी-जेडीयू को मिली बड़ी कामयाबी में इस आरक्षण का बड़ा योगदान था. स्कूली बालिकाएं साइकिल, किताब और पोशाक पाकर खुश थीं तो उनकी माताओं को पंचायतों में मिली बराबरी के अधिकार से खुशी हुई. लिहाजा, उस चुनाव में महिलाओं ने जाति के बदले एक वर्ग के तौर पर नीतीश कुमार को वोट दिया.

दायरा बढ़ाने की वकालत

इधर हाल के दिनों में नीतीश कुमार ने आरक्षण का दायरा बढ़ाने की वकालत कर इस आधार पर राजनीति करने वालों को चौंका दिया है. पिछले दिनों नीतीश चंपारण के थारुओं के बीच थे. उन्होंने कहा कि अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का मौजूदा दायरा बढ़ाया जाएगा. इसके लिए उन्होंने 2021 की जनगणना तक इंतजार करने के लिए कहा.

उनके मुताबिक उस जनगणना के बाद आबादी के आधार पर आरक्षण का दायरा बढ़ेगा. हालांकि यह मांग नई नहीं है. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद और उनके उत्तराधिकारी बने तेजस्वी यादव पहले से ही यह मांग करते रहे हैं. अररिया लोकसभा के उपचुनाव में तेजस्वी ने इस मुददे को जोर से उठाया था कि आरक्षण का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर किया जाए.

संयोग है उस उपचुनाव में राजद की जीत भी हो गई. प्रारंभिक आकलन यही है कि राजद को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए नीतीश ने यह घोषणा की है. उन्हें पता है कि राजद आरक्षण के मसले को जोर शोर से उठाएगा. यह ऐसा मसला है, जो समाज के बड़े हिस्से को सीधे तौर पर प्रभावित और गोलबंद करता है. आबादी के अनुसार नीतीश की आरक्षण की मांग का मतलब यह निकाला जा रहा है कि नीतीश कुमार भी राजनेताओं की उसी जमात में शामिल हो गए हैं, जिनकी मान्यता है कि सिर्फ विकास के नाम पर वोट नहीं बटोरे जा सकते हैं. शासन का समदर्शी भाव चुनाव के दिनों में किसी काम नहीं होता है.

नीतीश एससी, एसटी तो मांझी कर रहे सवर्ण को आरक्षण देने की मांग

यह दिलचस्प है कि पिछड़े वर्ग से आने वाले नीतीश कुमार एससी-एसटी के लिए आरक्षण का दायरा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. दूसरी तरफ एससी बिरादरी से आने वाले पूर्व सीएम और हम के अध्यक्ष जीतनराम मांझी इन दिनों अपनी सभाओं और बैठकों में गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग प्रमुखता से उठा रहे हैं.

गरीब सवर्णों को आरक्षण की मांग मांझी का केंद्रीय एजेंडा बन गया है. मांझी ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में कम रकम वाले सरकारी टेंडर में आरक्षण लागू किया था. नीतीश ने अपने कार्यकाल में मांझी कैबिनेट के इस फैसले का बरकरार रखा है. मांझी का दावा है कि आबादी के आधार पर आरक्षण देने की वकालत उन्होंने ही सबसे पहले की थी. मांझी अब एनडीए के बदले महागठबंधन में शामिल हुए हैं और तेजस्वी को उन्होंने अपने से बड़ा नेता मान लिया है.

उपेंद्र कुशवाहा ने नया चैप्टर जोड़ा

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एनडीए में शामिल होने के बाद अपनी पार्टी रालोसपा को लोकसभा चुनाव में मिली सौ फीसदी कामयाबी से उत्साहित केंद्रीय राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने आरक्षण व्यवस्था में एक नया चैप्टर जोड़ दिया है. वह सरकारी सेवाओं के साथ निजी और कारपोरेट सेक्टर में भी मंडल आयोग की सिफारिशों की तरह आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

अब यह उनकी पार्टी की घोषणा पत्र का अंग बन चुका है. कुशवाहा की यह मांग पिछड़ों, अति पिछड़ों और आरक्षण के दायरे में आने वाली अन्य जातियों को लुभा रही है. हिसाब सीधा है-सरकारी नौकरियां बढ़ने के बदले दिन ब दिन कम हो रही हैं और निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं. कुल मिलाकर तस्वीर यही बन रही है कि साल भर भले ही विकास का नारा लगाया जाए, लेकिन वोट के लिए अंततः आरक्षण का ही सहारा लिया जाएगा.

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