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2019 में ही बिहार चुनाव की संभावना टटोल रहे हैं नीतीश कुमार

नीतीश कुमार ने अपने कार्यकताओं को संदेश दे दिया है कि ‘आप लोग महासंग्राम और संग्राम दोनो की तैयारी में जी जान से लग जाइए’.

Updated On: Sep 26, 2017 07:40 PM IST

Kanhaiya Bhelari Kanhaiya Bhelari
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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2019 में ही बिहार चुनाव की संभावना टटोल रहे हैं नीतीश कुमार

बिहार के राजनीतिक गलियारों में अभी दो ही सवालों पर जोर-शोर से बहस चल रही है. पहला- क्या सीएम नीतीश कुमार 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के साथ ही बिहार विधानसभा का चुनाव कराएंगे? और दूसरा- बीजेपी नीतीश कुमार को अगले चुनाव में पहले वाली हिस्सेदारी देगी या नहीं?

पहले सवाल से शुरू करते हैं. भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार सीएम और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने अपने कार्यकताओं को अपने तरीके से संदेश दे दिया है कि वो महासंग्राम और संग्राम दोनों की तैयारी में जी जान से लग जाएं’. राजनीति के इंजीनियर नीतीश कुमार का आकलन है कि सियासी फायदे के लिए यही निर्णय ठीक होगा.

रविवार को अपने निवास 1, अणे मार्ग में नीतीश कुमार ने पार्टी के नेशनल एग्जिक्यूटिव की मैराथन बैठक की. फिर बाद में वरिष्ठ नेताओं के साथ आगे की रणनीति पर विचार विमर्श किया. तय हुआ कि दल के भीतर जितने भी लूप होल हैं उनको नवंबर के अंत तक दुरुस्त कर दिया जाए. पंचायत स्तर पर पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ताओं का मजबूत ढांचा तैयार करने के अलावा गांव-गांव में बूथ स्तर पर कमेटी बनाई जाए.

विपक्ष को करना चाहेंगे कट टू साइज

बिहार में विधानसभा का चुनाव लोकसभा के साथ करवाना सीएम नीतीश कुमार की राजनीतिक और सियासी मजबूरी है. इस मुद्दे पर सरकार में पार्टनर बीजेपी भी सीएम के साथ हैं. ये बात बिल्कुल साफ है कि नीतीश कुमार को मजबूत विपक्ष के सामने सरकार चलाने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

अपने 80 विधायकों के बूते लालू प्रसाद यादव के बेटे और हाउस में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव सीएम को हर कदम पर घेरेंगे. इसकी झलक तेजस्वी ने बीते विधानसभा सत्र के समय दिखा दी है. नीतीश कुमार की मन की बात समझने वाले बताते हैं कि ‘अहम मसला ये है कि तहे दिल से सीएम की इच्छा है कि इस ‘गैर-जिम्मेवार’ विपक्ष को जितना जल्दी हो सके कट टू साइज किया जाए’.

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नीतीश कुमार की राजनीतिक आंखों को दिख रहा है कि विधानसभा चुनाव हुआ तो लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी 2010 वाली हैसियत में आ जाएगी. तब आरजेडी के विधानसभा में मात्र 21 सदस्य हुआ करते थे. नेता प्रतिपक्षी का पद पाने के लिए राजद विधायक अब्दुल बारी सिद्दीकी को नीतीश कुमार का गणेश परिक्रमा करना पड़ा था. बाद के दौर में सत्ता के भूखे राजद विधायकों को नीतीश कुमार ने तोड़कर अपने घर रख लिया था.

संभावना है कि लालू प्रसाद यादव अपनी पत्नी राबड़ी देवी और उत्तराधिकारी पुत्र तेजस्वी प्रसाद यादव के साथ तब तक जेल यात्रा पर रहेंगे. कांग्रेस का बिहार में कोई वजूद नहीं है. 2010 विधानसभा चुनाव में राम विलास पासवान आरजेडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बावजूद खराब स्थिति में थे. अभी पासवान एनडीए खेमे में हैं. ऐसी स्थिति में दसों उंगलियां घी में रहेंगी. वक्त से पहले चुनाव कराने के पीछे इन सब कारणों को भी तौला गया है.

तय हो चुका है नीतीश-मोदी में सबकुछ

नीतीश कुमार की आत्मा की आवाज है कि बिहार को मध्यावधि चुनाव की आग में झोंककर सहयोगी बीजेपी पर भी राजनीतिक रूप से दबाव डाला जा सकता है कि सीटों के सवाल पर उनके साथ सम्मानजनक तोल-मोल करे. 17 वर्षों के मित्रवत भोज में नीतीश कुमार हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रहे हैं. अपनी शर्तों पर वो बीजेपी से 17 वर्षों तक नागिन डांस कराते रहे हैं.

यही वजह है कि लोकसभा के कुल 40 सीटों में 25 और विधानसभा में कुल 243 सीटों में बीजेपी राजनीतिक मजबूरी में उदारता का परिचय देते हुए नीतीश कुमार के लिए लगभग 140 के आसपास सीटें छोड़ती रही है.

पिछले चार सालों में गंगा में बहुत पानी बह चुका है. दिल्ली की तख्त पर कभी नीतीश कुमार के डीएनए में खोट देखने वाला काबिज हो चुका है. घर वापसी के बाद नीतीश कुमार की काट-छांट करने की खबरें सोशल मीडिया में परवान पर हैं. लालू प्रसाद यादव अपने अंदाज में कहते रहते हैं ‘झुंड से गिरे हुए बंदर को कोई दुबारा अपने गिरोह में नहीं रखता है. महागठबंधन छोड़ने के बाद नीतीश कुमार की हैसियत जीरो हो गई है’.

2014 की लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी केवल दो सीटों पर सिमट गई थी. जबकि एनडीए के 31 उम्मीदवारों ने जंग में फतह की. राजनीतिक पतंगबाजों का विश्लेषण है ‘इस बार बीजेपी नीतीश कुमार को उनका औकात बता देगी’. बीजेपी में भी कुछ ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो नीतीश कुमार से पैथोलॉजिकल हेट्रेड के कारण आॅफ द रिकार्ड उटपटांग बयान देते रहते हैं.

लेकिन राजनीति के लाल बुझक्कड़ भली भांति समझते हैं कि हर सियासी मुद्दे के ऊपर या सीटों के सवाल पर लेन-देन की बातचीत नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार- के बीच लगभग तय हो चुका है. बीजेपी के एक वरिष्ठ मंत्री का कहना है कि दोनों योद्धाओं के सामने अब सिर्फ एक ही लक्ष्य है कि किस तरह बिहार से सभी 40 लोकसभा सीटें अपनी झोली में किया जाए.

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