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लालू यादव के दोनों बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी के बीच आखिर कब तक रहेगा ‘संघर्ष-विराम’?

परिवार के भीतर हो रही लीपापोती से भले ही फिलहाल सबकुछ ठीक दिखाने की कोशिश हो रही हो, आने वाले दिनों में लालू परिवार के भीतर सत्ता-संघर्ष की संभावना बरकरार है.

Updated On: Jun 12, 2018 01:17 PM IST

Amitesh Amitesh

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लालू यादव के दोनों बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी के बीच आखिर कब तक रहेगा ‘संघर्ष-विराम’?

पटना में बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की मौजूदगी में दोनों बेटों तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव की जो तस्वीर सामने आई, उसमें सब कुछ ठीक-ठाक होते दिखाने की कोशिश ज्यादा लग रही थी. लालू यादव के 71वें जन्मदिन के मौके पर पटना में केक भी कटा, एक-दूसरे को केक खिलाया भी गया.

मां राबड़ी देवी के हाथों से दोनों बेटों को केक खिलाते हुए पहले तस्वीर सामने आई. फिर, दोनों भाइयों ने भी एक-दूसरे को केक खिलाया. फिर परंपरा के मुताबिक, दोनों भाइयों में मनमुटाव और मतभेद का ठीकरा मीडिया के सिर फोड़ दिया गया. दावा किया गया परिवार के भीतर सबकुछ ठीक-ठाक है.

लेकिन, सवाल है कि आखिर इस तरह की सफाई देनी क्यों पड़ रही है? अगर लालू परिवार में सबकुछ ठीक-ठाक है तो फिर रह-रह कर बड़े बेटे तेजप्रताप को कृष्ण और अर्जुन के अवतार का जिक्र क्यों करना पड़ता है? बार-बार तेजप्रताप भी सफाई क्यों देते हैं कि वो तो महज सारथी भर हैं, सत्ता पर बैठने वाला धनुर्धर तो छोटा भाई तेजस्वी है?

लालू परिवार के भीतर का समीकरण

दरअसल, लालू परिवार के भीतर भी सत्ता को लेकर संघर्ष चल रहा है. भले ही अभी तात्कालिक तौर पर संघर्ष विराम दिख रहा हो, लेकिन, आने वाले दिनों में खींचतान और अधिक दिख सकती है. वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेल्लारी भी मानते हैं कि ‘इस वक्त लालू परिवार के भीतर सत्ता की तीन धुरी है. पहला विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और छोटे बेटे तेजस्वी यादव, दूसरा लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव और तीसरा राज्यसभा सांसद और लालू यादव की संतानों में सबसे बड़ी बेटी मीसा भारती.’

उनके मुताबिक, ‘भले ही लालू परिवार में सत्ता संघर्ष कुछ वक्त के लिए ठंडा पड़ गया हो, लेकिन आने वाले दिनों में यह संघर्ष फिर से सामने आ सकता है. लेकिन, हकीकत यही है कि अब तेजस्वी यादव ही अघोषित तौर पर परिवार और पार्टी में युवराज की भूमिका में आ गए हैं, लिहाजा सत्ता-संघर्ष की स्थिति में जीत तेजस्वी यादव की ही होगी.’

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लालू ने तेजस्वी को दी है तरजीह

दरअसल, लालू यादव अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को ही पार्टी की कमान सौंपने का मन बना चुके हैं. अपनी विरासत पर तेजस्वी को बैठाने की लालू की ख्वाहिश का अंदाजा तभी लग गया जब 2015 में महागठबंधन की सरकार बनने के बाद नीतीश कुमार की सरकार में बतौर डिप्टी सीएम लालू ने तेजस्वी यादव को आगे कर दिया. हालांकि उस वक्त बड़े बेटे तेजप्रताप को भी स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया, लेकिन, तेजस्वी को सरकार में नंबर दो की हैसियत देने से संदेश साफ हो गया था.

आगे जब नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होकर बीजेपी का हाथ पकड़ लिया तो उस वक्त भी लालू यादव ने तेजस्वी यादव को ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दे दी. उसके बाद से तेजस्वी यादव की ही पार्टी में सबसे ज्यादा चल रही है. लालू के इस संदेश का असर है कि पार्टी के सभी नेता और कार्यकर्ता इस वक्त तेजस्वी की ही जी-हुजूरी में लगे रहते हैं.

चारा घोटाले के मामले में जब लालू यादव जेल में थे तो उस वक्त भी तेजस्वी ने ही पूरी पार्टी की अघोषित तौर पर कमान संभाल ली थी. तेजस्वी के हिसाब से ही पार्टी में हर तरह का फैसला लिया जा रहा था. हालांकि जेल में रहते हुए भी आरजेडी सुप्रीमो से सियासी मामलों में सलाह ली जाती रही है. लेकिन, लालू की गैर-हाजिरी में भी अररिया लोकसभा और जहानाबाद विधानसभा के उपचुनाव में जीत दर्ज करना और फिर जोकीहाट की जीत ने पार्टी के भीतर तेजस्वी के कद को और बड़ा कर दिया है. इस दौरान पूर्व सीएम जीतनराम मांझी की पार्टी की महागठबंधन में एंट्री कराकर तेजस्वी ने अपने कुनबे की ताकत और बड़ा कर दिया है.

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यहां तक कि लालू की गैर-हाजिरी में अब आरजेडी का प्रतिनिधित्व भी तेजस्वी यादव ही कर रहे हैं. राहुल गांधी से तेजस्वी की मुलाकात हो या फिर कर्नाटक में कुमारस्वामी के शपथ-ग्रहण समारोह में शिरकत करने जाना हर जगह लालू के वारिस के तौर पर अब तेजस्वी की पहचान होने लगी है. यह बात बिहार में पार्टी कार्यकर्ताओं की भी समझ में आ गई है. लेकिन, अब लगता है कि पार्टी में अपनी उपेक्षा और कम होते महत्व की चिंता तेजप्रताप को सताने लगी है.

तेजप्रताप को क्यों नहीं चाहते लालू?

लालू यादव ने तेजस्वी यादव को अपनी राजनीतिक विरासत संभालने का फैसला कर लिया है. लेकिन, इस दौरान लालू ने पहले बड़े बेटे को राजनीति में नहीं लाने का मन बनाया था. 2015 के चुनाव से पहले तेजप्रताप यादव का मन-मिजाज देखते हुए उनके लिए व्यापार की व्यवस्था कराई गई थी.

लेकिन राधा-कृष्ण की भक्ति में लीन रहने वाले तेजप्रताप को पहले भक्ति रस और फिर राजनीतिक रस का चस्का लग गया. फिर क्या था, पिता की आशा और मंशा दोनों के विपरीत आकर सियासत में दांव आजमाने का फैसला कर लिया. नहीं चाहते हुए भी लालू को पारिवारिक दबाव में 2015 में तेजप्रताप को विधानसभा का टिकट देना पड़ा. फिर नई सरकार में तेजप्रताप स्वास्थ्य मंत्री बन गए और फिर वहीं से उनके भी राजनीतिक सफर की शुरुआत हो गई.

तेजप्रताप की शादी से बदल सकते हैं समीकरण

अपने ठेंठ गंवई अंदाज में अपने कार्यकर्ताओं के खास तबके में लोकप्रिय तेजप्रताप ने भले ही छोटे भाई तेजस्वी के लिए सबकुछ त्यागने की बात की हो, लेकिन, अब परिवार के भीतर समीकरण बदलने वाले हैं. आरजेडी सूत्रों के मुताबिक, पार्टी में हाशिए पर चल रहे तेजप्रताप की शादी सियासी परिवार में होने से समीकरण बदल भी सकते हैं.

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तेजप्रताप की शादी सारण जिले के ही रहने वाले बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दारोगा राय की पोती से हुई है. दारोगा राय के बेटे आरजेडी विधायक भी हैं और बिहार सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. बीच-बीच में चंद्रिका राय की बेटी और तेजप्रताप की पत्नी ऐश्वर्या राय के अपने गृह-जिले सारण से लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा भी होने लगी है. ऐसे में तेजप्रताप को नजरअंदाज करना अब ज्यादा आसान नहीं होगा.

दूसरी तरफ, राज्यसभा सांसद मीसा भारती की भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी काफी ज्यादा रही है. मीसा पहले भी 2014 के लोकसभा चुनाव में पाटलिपुत्र से चुनाव लड़ चुकी हैं. 2014 की हार के बावजूद मीसा भारती फिर से 2019 में चुनावी मैदान में ताल ठोक सकती हैं. फिलहाल तो मीसा चुप हैं. लेकिन, तेजप्रताप यादव की नाराजगी और उस पर पार्टी और परिवार के भीतर हो रही लीपापोती से भले ही फिलहाल सबकुछ ठीक दिखाने की कोशिश हो रही हो, आने वाले दिनों में लालू परिवार के भीतर सत्ता –संघर्ष  की संभावना बरकरार है.

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