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बिहार में अभी और राजनीतिक भूकंप आने बाकी हैं!

नीतीश कुमार से नाराज राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता उपेंद्र कुशवाहा छोड़ सकते हैं एनडीए का साथ

Kanhaiya Bhelari Kanhaiya Bhelari Updated On: Jul 31, 2017 10:53 PM IST

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बिहार में अभी और राजनीतिक भूकंप आने बाकी हैं!

राजनीतिक मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी पर अगर भरोसा करें तो अगले कुछ दिनों में बिहार में एक और राजनीतिक भूकंप आने की आशंका है. वैसे खगोलशास्त्री मानते भी हैं कि बड़े भूकंप के बाद आफटरशॉक आते ही रहते हैं.

भारत सरकार में मानव संसाधन राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा किसी भी क्षण इस्तीफा दे सकते हैं. इस सवाल पर वे अभी चुप्पी साधे हुए हैं. गौरतलब है कि इनकी भी चुप्पी नीतीश कुमार की चुप्पी की तरह ही बहुत रहस्यमयी है. यह चुप्पी जब टूटेगी तो समझिए भूकंप के झटके आने तय हैं.

क्या होगा अब?

मंत्री के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग बताते हैं कि 27 जुलाई को पटना में आया राजनीतिक भूकंप कुशवाहा को मानसिक और राजनीतिक रूप से काफी क्षति पहुंचा है. बेचैन हैं. मन की बेदना को काबू में रखने के लिए शायद एक ही गीत गुनगुनाते होंगे ‘क्या से क्या हो गया एनडीए तेरे प्यार में’.

वैसे, महागठबंधन में भूकंप आने से पहले कई बार सार्वजनिक रूप से बयान भी दे चुके हैं कि ‘नीतीश कुमार जिस नाव पर चढ़ते हैं वो डूब जाती है.' राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले इस तथ्य से अच्छी तरह अवगत हैं कि उपेंद्र कुशवाहा का सपना है-बिहार का सीएम बनना.

nitish modi pic

राजनीतिक भूकंप के बाद उपजे राजनीतिक समीकरण में एनडीए में रहकर सपने को मूर्त रूप देना उन्हें असंभव ही नहीं बल्कि नामुमकिन नजर आ रहा है. क्योंकि वहां तो अब वैकेंसी ही नहीं है. थोड़ी-बहुत पूछ थी वो भी घोर विरोधी के आगमन से खत्म होने के कागार पर है.

कैसे कम होगी कुशवाहा की बेचैनी?

कुशवाहा के एक नजदीकी सूत्र के मुताबिक, 2015 विधानसभा चुनाव के समय उपेंद्र कुशवाहा ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से खुद को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट करने की बात की थी.

अमित शाह तैयार भी हो गए थे. इसमें एक शर्त यह थी कि राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) का बीजेपी में विलय हो जाए. कुशवाहा तैयार नहीं हुए और बात बिगड़ गई. अब तो नीतीश कुमार की एनडीए में शामिल होने से मामला ही खत्म हो गया.

कुशवाहा को लगने लगा है कि अगर लालू प्रसाद के साथ मिलकर अलायंस बनाए तो उनका सपना पूरा हो सकता है. आरजेडी अध्यक्ष ने भी नीतीश कुमार को घेरने की रणनीति पर गंभीरता से काम करना शरू कर दिया है. कांग्रेस, बीएसपी और एसपी की तरफ से सकारात्मक संकेत मिल भी गया है.

खबरों के मुताबिक लालू प्रसाद केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी को अपने पक्ष में लाने के लिए लागातार प्रयास कर रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि देर-सबेर लालू प्रसाद नीतीश कुमार को 2019 लोकसभा और 2020 विधानसभा में शिकस्त देने की गरज से कुशवाहा को अपना छोटा भाई बनाकर उन्हें नेतृत्व का ताज सौंप सकते हैं.

क्या है लालू की रणनीति?

आरजेडी सुप्रीमो समझते हैं कि अपनी बदनाम छवि के कारण लाख माथापच्ची के बाद भी वो यादव और मुसलमानों के अलावा दूसरी जातियों का वोट अपने पक्ष में नहीं ला सकते हैं. कोइरी, जिसकी जनसंख्या कुर्मी से काफी अधिक है, आक्रामक होकर नीतीश के खिलाफ तभी मतदान करेगा जब उसके जमात का कोई आदमी सीएम का घोषित दावेदार हो.

राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि अगर लालू प्रसाद आरजेडी, कांग्रेस, बीएसपी, एसपी, एनसीपी, हम और आरएलएसपी को मिलाकर महागठबंधन का निर्माण करने में सफल हो जाते हैं तो भविष्य में होने वाले चुनावी महाभारत काफी रोचक होंगे.

क्या है बिहार का कठोर सत्य?

यह कठोर सत्य है कि बिहार में ‘ब्लड इज थीकर दैन वाटर’. उपेंद्र कुशवाहा का अतीत कहता है कि वो लड़ाकू हैं याचक नहीं. अपना इतिहास वे खुद लिखते हैं. एकबार उन्होनें इस लेखक से कहा भी था ‘मै कई लोगों की तरह राजनीति में अनुकंपा के आधार पर नहीं आया हूं. राजनीति में जनता की सेवा के लिए आया हूं. उनके आर्शीवाद के दम पर सरजमीं पर टीका हूं. जमीर से समझौता न किया न करूंगा. पद का लोभ कभी नहीं रहा. न रहेगा. इस्तीफा हमेशा जेबी में रखता हूं’.

जनदाहा कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और मंत्री उपेंद्र कुशवाहा पहले भी कई बार भारी भरकम सांगठनिक एवं सियासी पदों से इस्तीफा दे चुके हैं. जब भी उन्हें लगता है कि सरकार के अगुआ उनको तवज्जो नहीं दे रहे हैं वे इस्तीफा देने से नहीं हिचकते हैं.

कैसा है कुशवाहा का करियर?

1985 में लोकदल से जुड़कर राजनीतिक बैटिंग शुरू करने वाले कुशवाहा समता पार्टी के फाउंडर सदस्य रह चुके हैं. कुछ महीनों के लिए बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता भी थे.

गुदड़ी के लाल कर्पूरी ठाकूर की छत्रछाया में राजनीति का ककहरा सीखने वाले कुशवाहा अपने 32 साल के राजनीतिक पारी में कम से कम दो बार नीतीश कुमार के साथ जुटने और उनसे टूटने का काम किया है.

टूटने के बाद जब भी जुटे तो नीतीश कुमार ने कुशवाहा को बड़ी जिम्मेवारी दी. फोकट या नेपोटिज्म में नहीं बल्कि साफ तौर पर उनकी काबिलियत का मूल्यांकन करके.

नीतीश से क्यों नाराज हैं कुशवाहा?

अंतिम बार नीतीश कुमार ने अगस्त 2010 में कुशवाहा को 6 साल के लिए राज्यसभा भेजा था. राजगीर में हुए 2013 की जनता दल यू के राष्ट्रीय अधिवेशन में सीएम नीतीश कुमार ने अपने भाषण में कुशवाहा पर कुछ कटाक्ष कर दिया.

नाराज उपेंद्र कुशवाहा ने दिल्ली जाकर सांसदी से त्यागपत्र दे दिया, जबकि उनका टर्म पूरा होने में 3 साल बाकी था. त्याागपत्र के तत्काल बाद मार्च 2013 में उपेंद्र कुशवाहा ने नई राजनीतिक आउटफिट राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का गठन करके नीतीश कुमार के खिलाफ बिगुल फूंका.

2014 लोकसभा चुनाव में एनडीए के साथ गठबंधन करके बिहार के सीएम को हराया भी. लेकिन इस जीत की उम्र काफी छोटी थी. अगले ही साल 2015 में विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने एनडीए को चुनावी संग्राम में बुरी तरह पराजित कर दिया.

57 साल के उपेंद्र कुशवाहा का सपना है कि कम से कम एक बार नीतीश कुमार को चुनावी समर में पछाड़कर बिहार का ताज धारण करें. इस सपने को पूरा करने के लिए मानव संसाधन राज्य मंत्री कोई भी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं. फिलहाल मंत्री महोदय अक्टूबर में पटना के गांधी मैदान में होने वाली आरएलएसपी की रैली को महासफल बनाने में तन, मन और धन से लगे हुए हैं.

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