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बिहार: NDA में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला नीतीश कुमार के लिए असली ‘अग्निपरीक्षा’ होगी

बिहार एनडीए में सीट शेयरिंग के फॉर्मूले पर बवाल मचा है. सवाल है कि ये फॉर्मूला आया कहां से?

Updated On: Sep 05, 2018 07:58 AM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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बिहार: NDA में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला नीतीश कुमार के लिए असली ‘अग्निपरीक्षा’ होगी
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बिहार में 2019 लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एनडीए में सीट शेयरिंग को लेकर बवाल मचा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 20-20 फॉर्मूले के तहत सीट बंटवारे की बात की जा रही है. इस फॉर्मूले के हिसाब से कहा जा रहा है कि बिहार की 40 लोकसभा सीटों में बीजेपी 20 पर चुनाव लड़ेगी जबकि उसकी सहयोगी जेडीयू, आरएलएसपी और एलजेपी को बाकी के 20 सीटें दी जाएंगी.

इस फॉर्मूले के मुताबिक जेडीयू को 12 से 14 सीटें मिल रही हैं. लेकिन सवाल है कि ये फॉर्मूला आया कहां से? बिहार में सीट बंटवारे को लेकर सारी बहस इसी फॉर्मूले के अनुसार की जा रही है. लेकिन किसी को पता नहीं है कि बीच बहस में लाने वाला ये फॉमूला किसके दिमाग की उपज है?

अब इसी फॉर्मूले के तहत कुछ जेडीयू नेताओं के हवाले से कहा जा रहा है कि जेडीयू किसी भी कीमत पर 12 से 14 सीटों पर मानने वाली नहीं है. फॉर्मूले के मुताबिक आरएलएसपी को 2 सीटें मिल रही हैं और आएलएसपी के बगावती अरुण कुमार के गुट को 1 सीट. अब आरएलएसपी कह रही है कि 2 सीटों से उसका क्या होगा? ये तो एक उभरती हुई पार्टी का अपमान है. बस एलजेपी खामोश है. जितनी बताई जा रही है शायद उन 6 सीटों से ज्यादा उनको चाहिए भी नहीं.

जेडीयू के नेता कहते हैं हम इस फॉर्मूले को माने ही क्यों? इसका आधार क्या है? जुलाई में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मुलाकात हुई थी. ऐसा कहा जा सकता है कि दोनों नेताओं के बीच आने वाले चुनाव को लेकर सीटों की बात की हुई होगी. लेकिन उस वक्त भी कुछ खुलासा नहीं हुआ था. सीट बंटवारे का मुद्दा एनडीए के सभी घटक दलों के साथ मिल बैठकर होगी. अभी तक बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह न एलजेपी अध्यक्ष रामविलास पासवान से मिले हैं और न ही आरएलएसपी अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा से. फिर सीट शेयरिंग का फॉर्मूला कहां से आ गया?

जेडीयू सीट शेयरिंग के इस फॉर्मूले को सिरे से नकार देती है. जेडीयू के प्रवक्ता अरविंद निषाद कहते हैं, ‘बिहार एनडीए की बैठक के बिना सीट का बंटवारा कैसे हो जाएगा? पूर्व का गठबंधन ये है नहीं. नया गठबंधन हुआ है. इसलिए सीट का बंटवारा नए सिरे से होगा. सीट शेयरिंग के फॉर्मूले वाली खबर भ्रामक है और तथ्यहीन है.’

Namo-Nitish

जेडीयू अपना बेमिसाल इतिहास कैसे भुला दे?

2014 में स्थितियां अलग थीं. बीजेपी-जेडीयू ने अलग होकर चुनाव लड़ा था. जेडीयू को करारा झटका लगा था और उसे सिर्फ 2 सीटें हासिल हुई थीं. जबकि बीजेपी को 22 सीटें मिली थीं. हालांकि इसके पहले 2009 के चुनाव में जेडीयू की वजह से बिहार में एनडीए को जबरदस्त कामयाबी मिली थी. 2009 के चुनाव में जेडीयू 25 और बीजेपी 15 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. जेडीयू को 20 सीटों पर जीत मिली थी और बीजेपी 12 सीटें हासिल करने में कामयाब हुई थी. एनडीए को कुल मिलाकर 32 सीटें हासिल हुई थीं.

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बाकी राज्यों की तुलना में एनडीए का ये सबसे अच्छा प्रदर्शन था, जिसका सारा श्रेय नीतीश कुमार को मिला था. मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से लिखा गया कि ये जीत नीतीश के अच्छे कामों की बदौलत मिली. लालू विरोध राजनीति के लिए एकसाथ आने के वक्त से ही बिहार में जेडीयू बड़े भाई और बीजेपी छोटे भाई की भूमिका में रही है. लेकिन 2014 में स्थितियां उलट गई.

पिछले साल जुलाई में बीजेपी के साथ दोबारा आने के बाद जेडीयू ने पूरी संवेदनशीलता के साथ साझेदारी निभाई है. लेकिन वो अपना बेमिसाल इतिहास भुलाने को तैयार नहीं है. और भुलाए भी क्यों? लेकिन जैसी परिस्थितियां हैं उसमें बीजेपी और जेडीयू साथ बने रहने के लिए दोनों को कुर्बानी देनी होगी. सवाल है कि बड़ी कुर्बानी कौन देगा?

एलजेपी 2014 के चुनाव में एनडीए की साझीदार पार्टी थी. चुनाव के ऐन पहले माहौल को भांपते हुए रामविलास पासवान ने अपने बेटे चिराग पासवान की बात मानते हुए एनडीए में शामिल होने को राजी हुए थे. एलजेपी को 6 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. वही एलजेपी 2009 का चुनाव आरजेडी और समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर फोर्थ फ्रंट की छत्रछाया में लड़ी थी. एलजेपी को एक सीट भी नसीब नहीं हुई थी. 2014 का चुनाव एलजेपी के लिए शानदार रहा. अब वो इस बात पर विचार कर रही है कि इस टैली को 2019 में कैसे रिपीट किया जाए.

upendra kushwaha

सीट शेयरिंग फॉर्मूले में आरएलएसपी का क्या रुख होगा?

सीट शेयरिंग को लेकर बवाल का एक केंद्रबिंदु आरएलएसपी है. 2019 के चुनावों की सुगबुगाहट के साथ ही आरएलएसपी दवाब बनाए हुए है. पिछले दिनों उपेन्द्र कुशवाहा के खीर वाले बयान के बाद एक बार फिर चर्चा चल निकली कि एनडीए से अलग होकर वो महागठबंधन में अपनी राह तलाश रहे हैं. एक तरह से सभी लोगों ने मान लिया है कि आरएलएसपी 2 सीटों पर नहीं मानेगी और आखिर में महागठबंधन में शामिल होकर चुनाव लड़ेगी.

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तेजस्वी यादव कई मौकों पर उनके स्वागत में बिछे भी दिखे हैं. लेकिन आरएलएसपी ने हर बार महागठबंधन में शामिल होने से इनकार किया है. आरएलएसपी के बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ सुबोध कुमार कहते हैं, आरएलएसपी को एनडीए से बाहर जाने की बात कैसे की जा सकती है? हमारा चुनाव पूर्व का गठबंधन है. जो लोग (जेडीयू) चुनाव के बाद गठबंधन में शामिल हुए उनको छोड़कर हमारी तरफ अंगुलियां उठाई जा रही हैं कि हम गठबंधन से बाहर हो जाएंगे. हमारे लिए ऐसी बात कहना ठीक नहीं है.’

बिहार में एनडीए के भीतर सीट शेयरिंग का मसला पेंचीदा है. फिलहाल फॉर्मूला पर फॉर्मूला दिया जा रहा है. एक फॉर्मूला ये भी तैर गया है कि बीजेपी और जेडीयू आपस में 20-20 सीटें बांट ले. और बीजेपी अपने कोटे से आरएलएसपी को 2 सीटें दे दे और जेडीयू अपने हिस्से से एलजेपी को 5-6 सीटें देकर मना ले.

एक फॉमूला ये भी दिया जा रहा है कि बीजेपी अपने हिस्से से 4 जीती हुई सीटें छोड़ दे और 18 सीटों पर चुनाव लड़े. जेडीयू 14 सीटों, एलजेपी 6 और आरएलएसपी 2 सीटों पर राजी हो जाए. एक फॉर्मूले में कहा गया है कि आरएलएसपी अगर एनडीए से बाहर हो जाती है तो ऐसे में बीजेपी 20, जेडीयू 14 और एलजेपी 6 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है. फॉर्मूले बहुत हैं. लेकिन सब हवा मे तैर रहे हैं. किस फॉर्मूले पर बात बनेगी, ये देखना दिलचस्प होगा.

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