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कन्हैया कुमार में 'भगवान कृष्ण' की छवि देख रहे हैं वाम दल, बेगूसराय जीत से आएंगे 'अच्छे दिन'

कन्हैया कुमार के चुनावी उम्मीदवार बनने से बिहार में राष्ट्रवादी लोग नारा लगना शुरू कर देंगे कि ‘कन्हैया की जीत से भारत तेरे टुकड़े होंगे‘. इस नारे का पुर्नजन्म महागठबंधन को भारी भी पड़ सकता है

Updated On: Sep 16, 2018 02:05 PM IST

Kanhaiya Bhelari Kanhaiya Bhelari
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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कन्हैया कुमार में 'भगवान कृष्ण' की छवि देख रहे हैं वाम दल, बेगूसराय जीत से आएंगे 'अच्छे दिन'

बिहार की राजनीति में लगभग मरणासन्न अवस्था में आ चुकी वाम दलों के नेताओं को लगने लगा है कि जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार की वंशी वादन से पार्टी का ‘पुर्नजन्म’ हो सकता है. वाम मार्गी शूरवीरों को अचानक दिखने लगा है कि द्वापर के कन्हैया ने जिस प्रकार अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से मृत सुभद्रा पुत्र को जिंदा कर दिया था, उसी प्रकार जेएनयू के कन्हैया लालू यादव के ‘ऑपरेशन’ से ‘अचेत’ कम्युनिष्टों को ‘सचेत’ कर देंगे.

2019 में बेगूसराय लोकसभा सीट से महागठबंधन के साझा कैंडीडेट होंगे

यह तय हो चुका है कि कन्हैया कुमार 2019 में बतौर सीपीआई उम्मीदवार बेगूसराय लोकसभा सीट से महागठबंधन के साझा कैंडीडेट होंगे. सोशल मीडिया के जरिए वाम दलों से जुड़े नेताओं ने कन्हैया कुमार का प्रचार-प्रसार भी करना शुरू कर दिया है. इधर पटना में सीपीआई की राज्य इकाई 25 अक्टूबर को एक रैली आयोजित करने की तैयारी में जी जान से जुट गई है.

रैली को भव्य इवेंट बनाने की जिम्मेवारी कन्हैया कुमार ने अपने उपर ली है.  कम्युनिस्ट सूत्रों की मानें तो जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष आगामी 2 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक देश भर में घूम-घूम कर रैली की सफलता के लिए मास माबलाइजेशन करेंगे. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, सीपीएम के महासचिव सीताराम यचुरी, सीपीआई लिबरेशन महासचिव दीपंकर भटाचार्य, आरजेडी के राजकुमार तेजस्वी यादव और जनता दल यूनाइटेड के बागी नेता शरद यादव को रैली में शिरकत करने के लिए आमंत्रित किया गया है.

वाम दलों ने कन्हैया कुमार को संयुक्त रूप से बेगूसराय लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाने की घोषणा की है

वाम दलों ने कन्हैया कुमार को संयुक्त रूप से बेगूसराय लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाने की घोषणा की है

बहरहाल, संयोग से बिहार में सीपीआई की इंट्री 1956 में बेगूसराय विधानसभा की उपचुनावी जीत से हुई थी. री-इंट्री का प्रयास भी कन्हैया कुमार की छवि की बदौलत ही बेगूसराय से की जा रही है. सीपीआई की जीत पर तब के पटना से प्रकाशित एक चर्चित अंग्रेजी अखबार की प्रतिक्रिया थी ‘रेड स्टार स्पार्कल्ड इन बिहार’. बाद के दौर में राज्य में कम्युनिस्ट विचारधारा का इतना बोलबाला हुआ कि सीपीआई 1969 में हुए विधानसभा चुनाव में 35 सीटें जीतकर सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के खिलाफ प्रमुख विपक्षी पार्टी बनकर उभरी. गांव-गांव लाल झंडा पहुंच गया. बेगूसराय 'लेलिनग्राड' के नाम से पुकारा जाने लगा.

70-80 के दशक में लेफ्ट पार्टियों का बिहार में चुनावी जीत और विस्तार बढ़ता रहा

चुनाव आयोग के वेबसाइट पर उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार सीपीआई ने 1952 बिहार विधानसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लिया था. 1956 के उपचुनाव में अप्रत्याशित जीत के कारण उत्साह से लबरेज लाल सलाम पार्टी ने 1957 के विधानसभा चुनाव में 60 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा और 5.15 प्रतिशत मत प्राप्त करते हुए 7 सीटों पर विजय हासिल की. संगठन में फैलाव और विधानसभा चुनाव में जीत का सिलसिला 70 और 80 के दशक में बढ़ता रहा.

सीपीएम भी अपनी हैसियत के मुताबिक 70 के दशक से ही चुनाव में अच्छा पर्फामेंस दे रही थी. इसके पीछे एक कारण यह भी था कि दोनों वाम दलों के पास क्रमशः सुनील मुखर्जी और गणेश शंकर विद्यार्थी सरीखे सुलझे हुए कद्दावर नेता थे जो विभिन्न राजनीतिक कार्यक्रम के माध्यम से गरीब-गुरबों के हक की लड़ाई लड़ने का काम करते थे.

वाम दल के नेता भी स्वीकारते हैं कि ‘वैसे तो आरक्षण का विरोध कर के दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों ने देश भर में ओबीसी का समर्थन गंवा दिया पर बिहार में इनके पतन की बीज उसी दिन बो दी गई जिस दिन नेतृत्व ने लालू यादव के साथ गलबहियां शुरू कर दिया.’ अपर कास्ट का सबसे दमदार तबका भूमिहार बिहार में दोनों वाम दल के लिए रीढ़ की हड्डी का काम करता था. लाल सलाम और लालू यादव की गठबंधन ने इस मजबूत जाति को नाराज कर दिया. दूसरी तरफ राजनीति के स्वयंभू डॉक्टर और मंडल अवतारी लालू यादव ने सत्ता में बने रहने के लिए बीजेपी के पावर में आने का डर दिखाकर दोनों वाम दलों का जमकर दोहन किया. उन्होंने कई बार वामपंथी विधायकों को तोड़ा और हरकिशन सिंह सुरजीत के खिलाफ अनाप-शनाप बयान भी दिया.

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पिछले कुछ वर्षों में लेफ्ट पार्टियों का बिहार में आधार और वोटबैंक काफी सिकुड़ा है

अपनी गलत नीतियों और कैडरों के बीच जातीय सोच विकसित होने के कारण सीपीआई और सीपीएम ने अपने आप को पूरी तरह से समाप्त कर लिया. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में सीपीआई ने 98 और सीपीएम ने 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारा था. मगर एक भी नहीं जीत सका. 6 दशक के चुनावी राजनीति में पहली बार ऐसा हुआ कि सीपीआई पूरी तरह से साफ हो गई. 2010 चुनाव में ही इतिश्री रेवा खंडे सीपीएम अध्याय समाप्त हो गया था. पिछले विधानसभा चुनाव में सीपीआई को मात्र 1.4 प्रतिशत वोट मिला.

वाद दलों को लगता है कि कन्हैया कुमार तारणहार साबित हो सकते हैं

कई वर्षों से सियासी दुर्दिन झेल रहे वाममार्गियों को अब लगने लगा है कि बेगूसराय के बीहट में जन्मे 31 वर्षीय कन्हैया कुमार उनके तारणहार हैं. ओजस्वी वक्ता कुमार महागठबंधन की सतरंगी जहाज पर बैठाकर जरूर संसद और विधानसभा का दर्शन कराकर उनके बीते दिन को वापस लाएंगे.

हालांकि वैसे लोगों की जमात भी कम नहीं है जो यह कयास लगा रहे हैं कि महाभारत के जंग में कन्हैया कुमार के भागीदार बनने से बिहार के 'लेलिनग्राड' में राष्ट्रवादी लोग नारा लगना शुरू करेंगे कि ‘कन्हैया की जीत से भारत तेरे टुकड़े होंगे‘. इस नारे का पुर्नजन्म महागठबंधन को भारी भी पड़ सकता है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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